एक्सक्लूसिव सियासत

अकेले पड़े सीएम : हर मोर्चे पर जूझ रहे अकेले। 

उत्तराखंड सरकार आजकल  विश्वविद्यालय में फीस बढ़ोतरी और आबकारी नीति को लेकर रक्षात्मक मुद्रा में है।

 विपक्ष के तेवर हमलावर हैं लेकिन सरकार तथा संगठन की ओर से पलटवार की धार गायब है। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत  अकेले इस मोर्चे पर जूझ रहे हैं। अकेले और अलग थलग पड़ने के कारण उनका कुछ भी कहना पलटवार की तरह नहीं बल्कि सफाई और स्पष्टीकरण जैसा लग रहा है। इसका फायदा सरकार से बाहर किंतु राज्य की सत्ता पर नजर रखने वाले क्षत्रप उठा रहे हैं और उन की रणनीति अकेले पड़े मुख्यमंत्री को अलग-थलग करने की है।

उत्तराखंड में भाजपा सरकार का एक साल पूरा होते-होते राज्य की सत्ता पर अपना अधिकार चाहने वाले क्षत्रपों का सब्र छलकने लगा है।
प्रचंड बहुमत की सरकार में असंतोष और अस्थिरता के हथियार नाकाम हो जाने के बाद महत्वाकांक्षी क्षत्रपों ने हथियार और हमलों के तरीके बदल दिए हैं।
आइए समझते हैं यह कैसे हो रहा है !
 मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के नेतृत्व को सबसे पहले कुंवर प्रणव सिंह चैंपियन के द्वारा चैलेंज किया गया। उस समय भाजपा के ही नेताओं ने चैंपियन को पूरा बैकअप दिया और उनके गुस्से को धार देने का काम किया। इसमें काफी हद तक असंतुष्ट गुट कामयाब भी दिखा और सरकार से नाराजगी की बात पहली बार भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह तक पहुंची।
 इसके बाद असंतुष्ट गुट ने विजय बहुगुणा की सुप्त महत्वाकांक्षाओं को रिचार्ज किया गया और उन्हें राज्यसभा के दावेदार के रूप में पेश किया गया। लेकिन भाजपा की पहले ही तय हो चुकी रणनीति के तहत विजय बहुगुणा नेपथ्य में चले गए।
अब असंतुष्ट रणनीतिकारों ने त्रिवेंद्र सिंह रावत से नाराज जनप्रतिनिधियों का मनोबल बढ़ा कर उन्हें और भी अधिक उग्र होने के लिए उकसाने की रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया है।
 पिछले दिन जब राज्य निर्वाचन आयुक्त ने सरकार को निकाय चुनाव पर कटघरे में खड़ा किया तो इन्हीं नेताओं ने निर्वाचन आयुक्त को बाकायदा फोन करके उनकी हौसला अफजाई की।
 आबकारी नीति पर मीडिया ने सरकार को घेरा तो भाजपा के एक बड़े नेता ने बाकायदा पता करके खबर प्रकाशित करने वाले पत्रकारों की हौसला अफजाई की।
 आग पर पानी डालने के बजाय विरोध की चिंगारियों को हवा दिए जाने के कारण परिणाम यह हो रहा है कि जो दिग्गज सरकार को मुसीबत से उबार सकते हैं, उन्होंने खामोशी अख्तियार कर ली है। अथवा बेमन से बिना होमवर्क के सरकार का पक्ष रख रहे हैं।
 संवाद के इस गैप को देखते हुए भाजपा के वह नेता तथा विधायक जो भविष्य में राज्यमंत्री अथवा दायित्वधारी बनने की चाह रखते हैं, वह मुख्यमंत्री को सपोर्ट करने के लिए सोशल मीडिया के माध्यम से सरकार का पक्ष रखने के लिए आगे तो आ रहे हैं लेकिन जानकारी के अभाव और कुतर्कों के कारण उनकी किरकिरी भी हो रही है।
 उदाहरण के तौर पर भाजपा विधायक महेंद्र भट्ट ने आबकारी नीति पर सरकार को घिरा देखकर डिपार्टमेंटल स्टोर का टर्नओवर पचास लाख किए जाने का यह कहते हुए समर्थन कर डाला कि पिछले साल तक इसका टर्न ओवर 5 करोड़ था इसलिए माफिया हावी था।
जबकि हकीकत यह है कि इससे पहले डिपार्टमेंटल स्टोर के लिए टर्नओवर की कोई शर्त नहीं थी इस वर्ष की आबकारी नीति में टर्नओवर की शर्त पांच करोड़ किए जाने का प्रावधान किया गया था जिसे सरकार ने 2 दिन पहले घटाकर 50 लाख कर दिया है।
 जब विधायक जी की खिंचाई हुई तो उन्होंने पोस्ट ही डिलीट कर दी और फिर एक ऐसी पोस्ट डाली कि जिसका आशय यह है कि जो परचून की दुकान में शराब की दुकान खोले जाने का विरोधी है वह भाजपा का विरोधी है।
 सरकार में सहयोगी मंत्रियों को यह लगता है कि यदि उनके मंत्रालयों के अच्छे कार्यों का क्रेडिट मुख्यमंत्री को जा रहा है तो बुरे कार्यों का खामियाजा भी उन्हें ही भुगतना चाहिए।
 इसके पीछे सुप्रीम कोर्ट का एक आदेश भी बड़ा कारण बना है। सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के अनुसार सरकार के विज्ञापनों में केवल मुख्यमंत्री की फोटो ही अनुमन्य की गई है। मंत्री की फोटो अपरिहार्य परिस्थितियों में केवल इस शर्त पर अनुमन्य की गई है कि यदि बहुत जरूरी हो तो भी मुख्यमंत्री या मंत्री में से एक  की ही फोटो विज्ञापन में प्रकाशित की जाएगी।
 इससे मंत्रीगण अखबारों के विज्ञापनों से भी बाहर हो गए हैं। पिछले दिनों पशुपालन मंत्री रेखा आर्य ने विभाग के एक विज्ञापन में मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री की फोटो के साथ अपनी फोटो भी लगा दी थी। शासन ने इसका कड़ा संज्ञान लिया था। कुछ विभागों ने शासन और सुप्रीम कोर्ट के डंडे से बचने के लिए ऐसी तिकड़म निकाली कि दोनों काम हो जाएं।
 जैसे कि एक माह पहले पर्यटन विभाग के एक विज्ञापन कुछ ऐसे प्रकाशित किए गए कि अखबारों के गढ़वाल संस्करण में मुख्यमंत्री का फोटो प्रकाशित किया गया तो कुमाऊ संस्करण में पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज का फोटो लगाया गया। पिछले दिनों आबकारी नीति में हुए संशोधन की जानकारी देने के लिए पहले तो सरकार के प्रवक्ता मदन कौशिक मीडिया से मुखातिब हुए तो दूसरे दिन स्पष्टीकरण के लिए मुख्यमंत्री को आगे आना पड़ा। इस अहम वक्त पर आबकारी मंत्री प्रकाश पंत की गैरमौजूदगी चर्चा का विषय बन गई है।
 सतपाल महाराज की नाराजगी कई मौकों पर दिख गई है। ऐसे में उनसे सरकार के पक्ष में मोर्चा लेने की अपेक्षा के मायने ही नहीं रह जाते।
 कद्दावर कैबिनेट मंत्री यशपाल आर्य जी इस अवसर पर नदारद हैं। शिक्षा मंत्री अपने ही मंत्रालय के बयानों के कारण विवादों में आते रहते हैं तो हरक सिंह रावत से अपने पक्ष में दो शब्द कहने की अपेक्षा संभवतः मुख्यमंत्री भी नहीं करते।
 ऐसे में ले देकर मुख्यमंत्री के पास भाजपा अध्यक्ष अजय भट्ट के अलावा मदन कौशिक और धन सिंह रावत ही दो चेहरे बच जाते हैं।
 मदन कौशिक पिछली भाजपा सरकार में आबकारी मंत्री भी रह चुके हैं तो धन सिंह रावत उच्च शिक्षा मंत्री हैं। महंत इंद्रेश यूनिवर्सिटी की फीस बढ़ाए जाने पर मुख्यमंत्री को ही मोर्चे पर डटना पड़ा तो आबकारी के मसले पर भी मुख्यमंत्री ही अकेले बच गए।
 हकीकत यह है कि कैबिनेट में फीस रेगुलराइजेशन के बिल में विश्व विद्यालय की फीस बढ़ोतरी का कोई जिक्र भी नहीं है। ऐसे में सरकार पहले ही विश्वविद्यालयों की फीस बढ़ाने को लेकर पहले ही अपना दामन झाड़ कर विश्वविद्यालय के खिलाफ कार्रवाई करते हूए फीस वृद्धि वापस लेने का निर्देश दे सकती थी। किंतु सरकार में किसी ने भी इस बिल के पांच छह पन्नों पर भी एक नजर डालना मुनासिब नहीं समझा। नतीजा यह हुआ कि मीडिया से लेकर जनता में यह बात फैला दी गई कि सरकार विश्वविद्यालयों को फीस बढ़ाने की खुली छूट देने वाला एक्ट बनाने जा रही है। जबकि यह निर्णय महंत इंद्रेश यूनिवर्सिटी ने अपनी मर्जी से किया था। सरकार ने जब तक कदम उठाए तब तक नुकसान हो चुका था।
 सरकार की साख पर उठ रहे गंभीर सवालों के दौर में अकेले पड़े मुख्यमंत्री को न तो भाजपा संगठन का साथ मिल रहा है ना सरकार में सहयोगी मंत्रियों का ऊपर से कोढ़ में खाज यह कि मुख्यमंत्री से वरिष्ठ भाजपा के वे नेता भी विरोध की आग को और भड़काने का काम कर रहे हैं जिनकी नजर सीएम की कुर्सी पर है। ऐसे में खराब होती छवि को बचाने की छटपटाहट में मुख्यमंत्री अकेले और अलग थलग से पड़ते जा रहे हैं।

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