खुलासा

खुलासा: पहले डीएफओ की जांच कराई! फिर शासन में दबाई!

 कृष्णा बिष्ट
 हमारे प्रिय पाठकों को याद होगा कि पर्वतजन ने सितंबर माह में चंपावत के भ्रष्ट डीएफओ अशोक कुमार गुप्ता की कमीशनखोरी का खुलासा किया था। पर्वतजन न्यूज़ पोर्टल ने एक ऑडियो भी प्रकाशित किया था। इसमें डीएफओ अशोक कुमार गुप्ता एक लीसा ठेकेदार से भुगतान के एवज में प्रति टिन के हिसाब से ₹3 का कमीशन लेने का दबाव बना रहा है। खबर प्रकाशित होने के बाद गुप्ता को देहरादून मुख्यालय में अटैच कर दिया गया था तथा इसकी जांच साफ छवि के लिए चर्चित वनाधिकारी संजीव चतुर्वेदी को सौंपी गई थी।
 जांच मिलते ही चतुर्वेदी तत्काल चंपावत भी गए और समस्त दस्तावेजों और अन्य सूत्रों से जांच रिपोर्ट तैयार करके 10 अक्टूबर को शासन को भी सौंप दी। शासन में दफन इस रिपोर्ट को 20 दिन होने को है, किंतु अभी तक इस फाइल का फीता तक नहीं खुला है। गौरतलब है कि अब तक निवर्तमान मुख्य सचिव एस रामास्वामी के पास ही वन महकमे का भी दायित्व था। उनके पास वन विभाग काफी लंबे समय तक रहा और उनकी कलम से कई भ्रष्ट प्रभागीय वनाधिकारियों को जीवनदान मिलता रहा है। यह फाइल भी रामास्वामी ने दबा दी थी। अब रामास्वामी की विदाई के बाद यह उम्मीद की जा रही है कि नए प्रमुख वन सचिव अथवा मुख्य सचिव ए के गुप्ता वाली जांच रिपोर्ट पर कार्यवाही को आगे बढ़ाएंगे।
 बहरहाल अभी तक  रामास्वामी  के रिटायर होने के बाद से वन महकमा किसी को नहीं दिया गया है।इसलिए ऐसा लगता है कि इस रिपोर्ट पर एक सप्ताह तक और कार्यवाही होनी मुमकिन नहीं है।
एके गुप्ता के खिलाफ लीसा टेंडर से लेकर वन महकमे की तमाम कामों में मनमानी और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं। उन्हें कई बार उच्चाधिकारियों ने कार्यवाही की चेतावनी भी दी थी, किंतु रामास्वामी का वरद हस्त होने के चलते उनके खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं हो सकी। अब उम्मीद जताई जा रही है कि कार्यवाही आगे बढ़ेगी।
संजीव चतुर्वेदी वन विभाग के साफ छवि के अफसरों में से हैं, जिन्होंने उत्तराखंड को अपेक्षाकृत साफ-सुथरा राज्य समझते हुए ही हरियाणा के अंदर से अपना काडर उत्तराखंड करवाया था। किंतु उत्तराखंड की पूर्व कांग्रेस सरकार ने संजीव चतुर्वेदी को कुछ काम काज देने के बजाय उन्हें खाली बैठे रखा। जब यह मामला मीडिया में उठा तो उन्हें कुमाऊं के एक रिसर्च डिवीजन में बिठा दिया गया।
 संजीव चतुर्वेदी ने उत्तराखंड आने पर अपने प्रिय विषय विजिलेंस महकमा दिए जाने का अनुरोध किया था। इस पर पिछली सरकार ने कान तक नहीं धरे। उम्मीद की जा रही थी कि जीरो टॉलरेंस की सरकार के आने के बाद संजीव चतुर्वेदी जैसे अफसरों को उनके मनमुताबिक काम दिया जाएगा। वर्तमान सरकार ने उन्हें भ्रष्ट डीएफओ की जांच करने का पहला काम सौंपा था तो उनकी जांच रिपोर्ट भी आला अफसरों ने शासन में दबा दी।
हालांकि जब पर्वतजन को शासन व वन विभाग के सूत्रों से पता चला  संजीव चतुर्वेदी ने ए.के. गुप्ता की जाँच रिपोर्ट 10 अक्टूबर को शासन को सौंप दी थी, तो इस विषय मे  संजीव चतुर्वेदी से फ़ोन पर सम्पर्क करने की कोशिश की गई  किन्तु संजीव चतुर्वेदी ने फ़ोन नहीं उठाया।कई बार फ़ोन करने के बाद जब दुबारा उनको लैंडलाइन पर फ़ोन किया गया तो उन्होने इस सम्बन्ध मे किसी भी तरह की जानकारी देने से साफ़ इन्कार कर दिया। देखना यह है कि नए मुख्य सचिव क्या निर्णय लेते हैं!

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