पहाड़ों की हकीकत

जरूर पढें ! जहाँ जरूरत वहां सड़क नही।जहां सड़क वहां जरूरत नहीं !!

रतन सिंह असवाल 
 उत्तरकाशी जिले के अधिकतर युवा आजकल सेब के पेड़ों की टहनियों की कटाई मे व्यस्त है.. ताकि इस बार पिछली फसल से अधिक सेब का उत्पादन किया जा सके। वहीं दूसरी तरफ हमारे अन्य पहाड़ी  जिले के अधिकतर युवा सीढ़ीदार बंजर खेतों मे बनी क्रिकेट की पिचों पर मुर्गा और बकरा टूर्नामेंट खेलते सहज देखे जा सकते हैं।
 
15 करोड़ रुपये का सालाना सेब उत्पादन करने वाला, उत्तराखण्ड के सीमांत जनपद उत्तरकाशी की मोरी तहसील का कलीच गांव, मुख्य मार्ग से लगभग 6 किमी की पैदल खड़ी और दुर्गम चढ़ाई, लेकिन आजादी के 70 और राज्य गठन के 17 वर्षों के बाद भी सड़क से नही जुड़ पाया है । देखा गया है कि राज्य गठन के बाद जहां सड़कें बननी चाहिए थी, वहां तो नहीं बनी लेकिन आबादी शून्य हो चुके गाँवों में सड़कों के जाल बिछाए जा रहे हैं।
 पलायन का दंश झेल रहे, और दिनों-दिन भुतहा होते गांवों के इस प्रदेश में इन विषम परिस्थितियों में भी कलीच गांव की आबादी लगभग 500 से अधिक है। कलीच के लगभग 9 किमी की पैदल दुर्गम चढ़ाई को पार करने के बाद पड़ता है थुनारा गांव, जिसकी जनसंख्या 600 के आसपास है ।
 
कलीच और थुनारा, ये दोनों गांव मिलकर 30 करोड़ से भी अधिक का सेब उत्पादन करते हैं । यदि इन गांवों को सड़क मार्ग से जोड़ दिया जाता है तो जो सेब समय पर सड़क तक नहीं पहुचने के कारण बग़ान मे ही नष्ट हो जाता है। उसका भी राजस्व सेब उत्पादकों को मिल सकता है और अनुमान के अनुसार यह 40 से 45 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है ।
 मुख्य मार्ग से सड़क कलीच और थुनारा दोनों गांवों के लिए प्रस्तावित है । लगभग 15 किमी लंबी यह सड़क दोनों गांवों के काश्तकारों के लिये वरदान साबित हो सकती है । पलायन एक चिंतन अभियान दल के सदस्यों के प्रयासों से इस गांव के लिए प्रस्तवित सड़क हेतु वन एवं पर्यावरण मंत्रालय भारत सरकार से सैंद्धांतिक स्वीकृति तो मिल गई लेकिन राज्य का लोक निर्माण विभाग वित्त का अभाव बता इसकी अगली प्रक्रिया को पूरी करने से अपना पल्ला झाड़ रहा है ।
 गौरतलब है कि कलीच गांव के स्थानीय निवासियों से प्राप्त जानकारी के अनुसार इसी महीने 12 की रात को एक गर्भवती महिला को समय से इलाज नहीं मिल पाने के कारण उसके अजन्मे बच्चे ने दुनिया देखने से पहले ही मूंद ली।
इसी गांव से मेरे मित्र श्री कल्याण सिंह ने मुझे बताया कि  पिछले चार माह में तीन अन्य बुजुर्ग समय पर इलाज न मिलने के कारण पिछले गांव से सड़क तक जाने वाले पैदल मार्ग पर बीच में ही डंडी मे दम तोड़ चुके हैं । पंद्रह किलोमीटर का यह दुर्गम चढ़ाई वाला रास्ता घने जंगल से होकर गुजरता है । जिसकी पतली पतली फ़िसलन भरी पगडण्डियां पैदल चलने वाले लोगों का भाग्य और जीवन रेखा की लंबाई निर्धारित करती हैं ।
 
गांव मे निर्मित आलीशान घर इन अति दुर्गम गांवों के निवासियों की जीवटता का परिचय देते हैं। ये बताते हैं कि इन विषम परिस्थितियों में भी इन लोगों ने जीवन और जरूरतों की जंग को टक्कर देकर जीत हासिल की है लेकिन अफ़सोस ! अपने प्रदेश के सरकारी सिस्टम की उपेक्षा के चलते ये लोग आज भी सड़क जैसी मूलभूत आवश्यकता से वंचित हैं । इस क्षेत्र के लोगों के लिये सेब आर्थिकी का मुख्य जरिया तथा आय का मुख्य स्रोत है और सड़क उनके फ़ल उत्पाद को मण्डी तक पहुंचाने की मूलभूत आवश्यकता।  यदि प्रदेश सरकार इसी तरह इन काश्तकारों की आवश्यकताओं को नजरअंदाज करती रही तो नि:संदेह ये लोग भी धीरे-धीरे अपने मूल स्थानों को छोड़कर मैदानी क्षेत्रों की तरफ़ पलायन करना शुरू कर देंगे। आशा है इसके होने वाले दुष्परिणाम आप और सरकार दोनों ही अच्छी तरह से समझते हैं ।
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