एक्सक्लूसिव राजकाज

खतरनाक खुलासा: आज आग लग जाती तो खाक हो जाता सीएम सचिवालय!!

आज आपको हम रूबरू करवा रहे हैं, एक ऐसे खुलासे से जिसकी खबरें प्रदेश में आज न किसी आला अफसर को होगी न सरकार के किसी मंत्री-संत्री को और न ही किसी मीडिया कर्मी को।
 सचिवालय में आज रविवार की छुट्टी थी। यह संवाददाता सचिवालय की पास से गुजरते हुए यूंही सचिवालय के अंदर से एक चक्कर लगाने की  सोचता है। और देखता क्या है कि सचिवालय के एक भवन के सामने सचिवालय के सारे सुरक्षाकर्मी एकजुट हैं और जमीन में एक ढेर पर आग लगी हुई है। आधे दर्जन आग बुझाने वाले यंत्रों के साथ सचिवालय सुरक्षा कर्मी आग पर काबू काबू पानी की कोशिश कर रहे हैं।
पास जाकर पता चला कि सचिवालय के सुरक्षा कर्मियों को आपदा प्रबंधन तथा न्यूनीकरण केंद्र के अधिकारी-कर्मचारी आग पर काबू पाने तथा आग लगने पर फंसे हुए लोगों को ढूंढने और खोज निकालने के लिए प्रशिक्षण प्रदान कर रहे हैं।
कौतुहलवश यह संवाददाता भी इस टीम के साथ हो लिया। पहले दौर में सचिवालय के सुरक्षाकर्मियों को सिलेंडर से लगी आग तथा अन्य ठोस वस्तुओं में लगी आग पर काबू पाने के तरीके सिखाए गए। इसमें अलग-अलग अग्नि शमन का इस्तेमाल सिखाया गया।
 चौंकाने वाला पहलू इसके बाद सामने आया। जब यह दस्ता मुख्यमंत्री सचिवालय की तरफ बढ़ा। मुख्य सुरक्षा अधिकारी पीसी खंतवाल तथा आपदा विभाग के अधिकारी केएन पांडे ने बिल्डिंग पर लगी आग को बुझाने के तरीके सिखाते हुए आग बुझाने वाले हौज पाइप का इस्तेमाल करना चाहा तो हौज पाइप का बॉक्स खुलने पर पता चला कि बॉक्स में हौजपाइप तो था लेकिन उस पर फिट होने वाली नोजल गायब थी।तत्काल फोन  करके हौजपाइप की व्यवस्था देखने वाले कर्मचारियों को बुलाया गया तो एक आउटसोर्सिंग का कर्मचारी 10 मिनट बाद वहां पर हाजिर हुआ और फिर 15 मिनट बाद ढूंढ कर कहीं से हौजपाइप का नोजल लेकर आया। जब हौजपाइप का नोजल फिट करके पानी चलाने के लिए कहा गया तो पता चला कि पानी चलाने वाली मोटर ही खराब है।
जब पीडब्ल्यूडी विभाग के जेई संजीव कुमार से इस संवाददाता ने मोटर खराब होने के बारे में पूछा तथा यह ताकीद की यदि आज आग लग जाती तो फिर क्या होता! जवाब में जेई ने लाचारी में कंधे झटक दिए।
जेई ने अपनी बात दूसरे जेई संदीप वर्मा पर डालते हुए कहा यह तो इलेक्ट्रिकल की जिम्मेदारी है। सिविल के जेई दूसरे हैं। वही पानी से संबंधित काम देखते हैं। सिविल के जेई को फोन किया गया तो उन्होंने इस संबंध में कोई भी जानकारी होने से साफ मना कर दिया।
 जब जेई संदीप कुमार से पूछा गया कि मोटर खराब होने के क्या कारण है तो जेई का कहना था कि उनके पास तीन का स्टाफ है और उनकी जिम्मेदारी विधानसभा सचिवालय, विधायक निवास आदि सभी मुख्य सरकारी भवन हैं। जेई  कुमार ने कहा कि वह इतना भी कर रहे हैं तो वह भी बहुत ज्यादा है। सरकार के पास उनका पहले से ही ढाई करोड़  तथा 45 लाख रुपए की बकाया राशि शेष है। सरकार यदि उन का भुगतान ही नहीं करेगी तो वे अपनी जेब से ठेकेदार को कब तक भुगतान करते रहेंगे।इन्होने सचिवालय प्रशासन को लिखित मे दे रखा है कि वे बिना पैसे के आगे काम नही कर सकते ।
 यह तो हुई आग लगने पर पानी से आज बुझाने वाले यंत्रों की बात! हकीकत यह भी है कि आग लगने अथवा भूकंप आने पर उतने लोग नहीं मरते, जितनी उससे पहले ही होने वाली भगदड़ अथवा बाहर  निकलने के लिए जगह की कमी के कारण आहत होते हैं।
 इस संवाददाता ने मुख्यमंत्री वाली बिल्डिंग का जायजा लिया तो अंदर का नजारा और भी चौंकाने वाला था। मुख्यमंत्री बिल्डिंग से बाहर निकलने का सिर्फ एक ही रास्ता है, जबकि बिल्डिंग के अंदर मुख्य द्वार से प्रवेश करने के बाद ऊपर के फ्लोर जाने के लिए तीन अलग-अलग दिशाओं से सीढ़ियां हैं।
 चतुर्थ तल पर मुख्यमंत्री से मिलने जाने के लिए सिर्फ एक दरवाजा है। किंतु निकासी के दरवाजे पर ताला लगा रहता है। यही नहीं सीढ़ियों पर फाइलों का अंबार लगा हुआ है। तथा जगह-जगह पर सीढ़ियों पर अलमारियां रखी हुई हैं। भूकंप आने की स्थिति में यह अलमारियां और फाइलें बड़ी दुर्घटना का सबब बन सकती है।
 
इससे बड़ी मुख्यमंत्री की असुरक्षा और क्या होगी कि मुख्यमंत्री के कक्ष में जाने के लिए एक संकरा सा दरवाजा है। किंतु निकासी के दरवाजे पर ताला लगा हुआ है और सीढ़ियों पर जगह-जगह फाइलों के अंबार और अलमारियां अटी पड़ी हैं।
 मुख्यमंत्री की बिल्डिंग के अंदर लगभग 500 कर्मचारी अधिकारी कार्यरत रहते हैं। भूकंप अथवा आगजनी की स्थिति में निकासी के लिए मात्र एक दरवाजा होने से भगदड़ होने की स्थिति में बड़ी दुर्घटना हो सकती है। सचिवालय में सभी तरह के रख-रखाव की जिम्मेदारी पीडब्ल्यूडी विभाग को दी गई है।
 PWD ने आग लगने पर सुरक्षा संबंधी इंतजामों के लिए कोई भी तैयारी नहीं कर रखी है। जिसके पास इलेक्ट्रिसिटी की जिम्मेदारी है, उसे यह नहीं पता कि आग लगने पर शटडाउन कैसे लेना है अथवा आग कैसे बुझानी है। जिसके पास पानी की जिम्मेदारी है उसे नहीं पता कि मोटर हवा ले ले तो उसे ठीक कैसे करना है! अथवा आग लगने पर हौज पाइप का इस्तेमाल कैसे करना है!
 सचिवालय के सुरक्षा कर्मियों को भी इस के लिए प्रशिक्षित नही किया गया है और न ही सुरक्षाकर्मियों को ऐसी कोई जिम्मेदारी सौंपी गई है। कई बार सचिवालय प्रशासन को उत्तर प्रदेश की तर्ज पर यहां भी अलग से अग्निशमन दस्ता गठित करने की मांग कर दी गई है। किंतु हर बार बजट का रोना रोकर यह मांग दबा दी जाती है। पिछली सरकार में सचिवालय प्रशासन मंत्री नवप्रभात ने बाकायदा एक मीटिंग की मिनिट्स में यह बातें की थी कि सचिवालय के लिए अलग से अग्निशमन दस्ता गठित किया जाएगा, किंतु फिर यह बात आई-गई हो गई।
 सचिवालय प्रशासन की यदि इच्छा हो तो वह सचिवालय में कार्यरत सुरक्षाकर्मियों में से ही कुछ जागरुक तथा थोड़ी बहुत जानकारी रखने वाले सुरक्षाकर्मियों के बीच में से ही एक अग्निशमन दस्ता गठित कर सकता है। जिसकी आगजनी या भूकंप आने पर आवश्यक कार्यवाही करने की जिम्मेदारी तय हो जाए। किंतु ऐसा लगता है कि राज्य बनने के बाद किसी ने भी इस दिशा में गंभीरता से सोचा ही नहीं।
 मुख्यमंत्री जब सड़कों पर गुजरते हैं तो पहले ही ट्रैफिक रोक दिया जाता है। गाड़ियों की आगे-पीछे लंबी प्लीट चलती है और अच्छे खासे सुरक्षाकर्मी सेवा में तैनात रहते हैं। किंतु जहां पर मुख्यमंत्री सर्वाधिक समय व्यतीत करते हैं, वहां पर किसी भी अनहोनी की दशा में कोई सुरक्षा उपाय न होने से ऐसा प्रतीत होता है कि मुख्यमंत्री की सुरक्षा में किया जा रहा सारा इंतजाम केवल उनकी पद और प्रतिष्ठा का प्रदर्शन करने मात्र के लिए है। वाकई में कोई भी मुख्यमंत्री अथवा सचिवालय की सुरक्षा के प्रति गंभीर नहीं है।
 मुख्यमंत्री वाली इस चार मंजिला बिल्डिंग में गृह, गोपन, कार्मिक से लेकर तमाम महत्वपूर्ण विभागों से संबंधित हजारों फाइलें हैं। इस भवन की बनावट ऐसी है कि मात्र एक बिजली की तार यदि शॉर्ट सर्किट से आग पकड़ ले तो यही आग पर्दों से लेकर कंप्यूटर, कारपेट तथा प्लास्टिक की कुर्सियों से होते हुए फाइलों तक पहुंचकर पूरी बिल्डिंग को कुछ ही देर में राख के ढेर में बदलने में सक्षम है। एक और बदइंतजामी देखिए कि सचिवालय में इस तरह की सारी व्यवस्थाएं देखने का काम सचिवालय प्रशासन का है किंतु उन व्यवस्थाओं को उपलब्ध कराने की  जिम्मेदारी राज्य संपत्ति विभाग की है। सचिवालय प्रशासन विभाग यदि इन सारी व्यवस्थाओं के लिए राज्य संपत्ति विभाग को धन आवंटित कर सकता है तो वह खुद ही यह सभी काम अपने हाथ में क्यों नहीं ले लेता! यह भी एक गंभीर प्रश्न है।
 सचिवालय सुरक्षा कर्मियों के प्रशिक्षण का आज दूसरा दिन था। आपदा सचिव अमित सिंह नेगी भी ऐसे प्रशिक्षणों को आवश्यक मानते हैं।  अपर सचिव आपदा सविन बंसल का भी यह मानना है कि भूकंप अथवा आगजनी के समय पर आवश्यक सहायता के लिए सचिवालय के सुरक्षा कर्मियों को भी खोज एवं राहत बचाव कार्य में दक्ष होना चाहिए। मुख्य  सुरक्षा अधिकारी PC खन्तवाल कहते हैं कि जल्दी ही सुरक्षाकर्मियों को कुछ एडवांस प्रशिक्षण भी दिए जाने हैं। ताकि किसी अनहोनी की स्थिति में ऊपर की मंजिलों से व्यक्तियों को सकुशल नीचे उतारा जा सके। प्रशिक्षण शिविर के पहले दिन सुरक्षाकर्मियों को आसपास के संसाधनों से स्ट्रेचर बनाने का प्रशिक्षण दिया गया। तिकोनी पट्टी बनाने तथा फर्स्ट ऐड का भी प्रशिक्षण दिया गया। सुरक्षाकर्मियों ने बड़े मनोयोग और उत्साह से इस दो दिवसीय शिविर में भाग लिया और वह इस तरह के शिविर से काफी उत्साहित हैं। सुरक्षा कर्मियों के लिए यहां राज्य गठन से लेकर अब तक पहला प्रशिक्षण शिविर आयोजित किया गया था।

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