राजनीति

अब मंत्री बनाम् मुख्यमंत्री!

एक  साल का कार्यकाल पूरा होने से पहले सरकार जब तक अपनी उपलब्धियां जनता के सामने रखती, मंत्रियों और मुख्यमंत्री के बीच मचा घमासान सार्वजनिक होने लगा है।
वित्त मंत्री प्रकाश पंत द्वारा बेहतर बजट की आस में सोशल मीडिया पर लोगों से राय क्या ली गई, मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने अगले ही दिन ऐलान कर दिया कि उत्तराखंड के ६ अलग-अलग स्थानों पर जाकर वे जनता की राय लेंगे।

वित्त मंत्री प्रकाश पंत ने त्रिवेंद्र रावत के इस रवैये पर कोई प्रतिक्रिया सार्वजनिक रूप से तो नहीं दी, किंतु प्रकाश पंत के समर्थक इस बात को पुरजोर तरीके से उठाने में लगे हैं कि वित्त मंत्री के विभाग में हस्तक्षेप करने का आखिर क्या औचित्य है और जब बजट वित्त मंत्री ने बनाना है, पेश करना है तो फिर मुख्यमंत्री को अलग से रायशुमारी की क्या आवश्यकता पड़ी?


वित्त मंत्री प्रकाश पंत के साथ उपजे इस शीतयुद्ध के बीच एक और प्रकरण तब सामने आया, जब ऋषिकेश में पर्यटन मंत्री के साथ उस प्रेस कांफ्रेंस में आईएएस मीनाक्षी सुंदरम मौजूद थे, जिसमें त्रिवेंद्र रावत द्वारा घोषणा करने से पहले सतपााल महाराज ने आईडीपीएल की सैकड़ों एकड़ भूमि पर विश्वस्तरीय कन्वेंशन सेंटर बनाने की घोषणा कर डाली। त्रिवेंद्र रावत सतपाल महाराज को तो इस मसले पर कुछ नहीं बोल पाए।

अगले दिन उन्होंने मीडिया को बताया कि यदि वे आईडीपीएल की भूमि के लिए प्रयास नहीं करते तो यह जमीन हरियाणा सरकार के कब्जे में चली जाती। महाराज द्वारा की गई प्रेस कांफ्रेंस का गुस्सा आईएएस मीनाक्षी सुंदरम पर निकला और सुंदरम से सतपाल महाराज वाले विभाग हटा लिए गए।
वन मंत्री हरक सिंह रावत ने कोटद्वार में एक नया बयान जारी किया है। जिसमें उन्होंने उत्तराखंड में उनके हस्ताक्षर के बिना कोई भी काम होने को असंभव बताया है। हरक सिंह रावत ने कहा कि वन विभाग की एनओसी के बिना उत्तराखंड में न तो कोई सड़क बन सकती है, न कोई अस्पताल बन सकता है, न कोई विद्यालय बन सकता है। हरक सिंह यहीं नहीं रुके, उन्होंने जोर देकर कहा कि उत्तराखंड के विकास की चाबी उनकी जेब में है।

एक ओर शिक्षा मंत्री अरविंद पांडे ट्रांसफर पोस्टिंग से लेकर अटैचमेंट व्यवस्था समाप्त करने को लेकर बड़े-बड़े भाषण देते रहे, वहीं दूसरी ओर मुख्यमंत्री की पर्ची पर अधिकारियों ने तकरीबन एक दर्जन शिक्षकों को विभिन्न विभागों में अटैच कर डाला। अरविंद पांडे पहले दिन से ही बड़े बयान देकर सुर्खियों में हैं, किंतु एक कदम आगे बढऩे के बाद वे मुख्यमंत्री के हस्तक्षेप के कारण बैकफुट पर आते दिखे।

कुल मिलाकर एक साल का कार्यकाल पूरा होने से पहले सरकारी उत्सव की धूम इन उदाहरणों से फीकी जरूर पड़ गई है। यदि यही क्रम जारी रहा तो आने वाले समय में डबल इंजन की सरकार को भी काम के लिए जाने जाने के लिए आपसी झगड़ों के लिए जाना जाएगा, जो उत्तराखंड के लिहाज से खराब होगा।

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