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राजनीति

अंबेडकर के बहाने संसद पर नजर

पहली बार विधानसभा के सदन में पहुंचे झबरेड़ा के विधायक देशराज कर्णवाल की अति महत्वाकांक्षा के कारण उनकी और सरकार की खूब किरकिरी हुई

पर्वतजन

ब्यूरो प्रचंड मोदी लहर में विधानसभा पहुंचे भाजपा के कई विधायकों की उम्मीदें आसमान छू रही हैं। लंबे प्रयास के बाद पहली बार विधानसभा पहुंचने वाले भाजपा में ऐसे विधायकों की लंबी फेहरिश्त है, जिनके पैर अब जमीन पर नहीं पड़ रहे हैं। वो अब ये मानने को तैयार ही नहीं कि उनकी जीत के पीछे एकमात्र कारण मोदी लहर थी। अब वे जीत के पीछे अपनी योग्यता, अपने राजनैतिक कौशल व राजनैतिक पृष्ठभूमि को मुख्य कारण बताने से नहीं चूक रहे हैं। जीएसटी बिल पास करने के लिए बुलाए गए दो दिवसीय विधानसभा सत्र के दौरान ऐसा ही एक मामला तब सामने आया, जब झबरेड़ा से नवनिर्वाचित विधायक देशराज कर्णवाल द्वारा नियम ३१० के तहत लगाए गए सवाल को विधानसभा अध्यक्ष ने नियम ५८ के तहत सुनने के लिए सहमति दी।
नियमत: इस नियम के तहत विधायक जो सूचना देता है, उसे उस सूचना को विधानसभा अध्यक्ष द्वारा बोलने की अनुमति देने के बाद पढऩा होता है। जब विधानसभा अध्यक्ष ने देशराज कर्णवाल को अपनी बात रखने का समय दिया तो देशराज कर्णवाल ने नियम-कानूनों को किनारे रखते हुए सबसे पहले नियम विरुद्ध विधानसभा में अंबेडकर की फोटो लगाने पर धन्यवाद देते हुए लंबा भाषण देना शुरू कर दिया। देशराज कर्णवाल अति उत्साह में बाबा साहब भीमराव अंबेडकर के संबंध में कसीदे पढऩे लगे तो विपक्ष ने सवाल खड़ा किया कि हाल ही में देशराज कर्णवाल की झबरेड़ा विधानसभा के अंतर्गत ही भीमराव अंबेडकर के पोस्टर जलाए गए, इस पर सदन में चर्चा होनी चाहिए। इससे पहले कि सत्ता पक्ष के लोग देशराज कर्णवाल को मूल विषय पर आने या नियमानुसार अपना सवाल रखने की ओर इशारा करते, देशराज कर्णवाल ने पूरी विधानसभा सिर पर उठा ली। वे विपक्षी विधायकों पर जोर-जोर से चिल्लाने लगे। वहां उपस्थित किसी की भी समझ में नहीं आया कि आखिरकार देशराज कर्णवाल को क्या हो गया है। किसी तरह देशराज कर्णवाल को कहा गया कि उनकी यह बात नियम विरुद्ध है और उन्होंने नियम ३१० के तहत जो सूचना लगाई है, वही सवाल पूछे। इस बीच विपक्ष की ओर से उत्तराखंड के विभिन्न स्थानों पर भीमराव अंबेडकर की मूर्ति के नाम पर इतना बवाल काटा गया कि सरकार असहज हो गई। किसी तरह मान-मनोव्वल कर विपक्ष को शांत करवाया गया।
दूसरे दिन जीएसटी बिल के पास होने पर जब विभिन्न विधायकों ने अपने-अपने विचार उस बिल के संदर्भ में रखने शुरू किए तो देशराज कर्णवाल को भी विधानसभा अध्यक्ष द्वारा इस बिल के संदर्भ में अपनी बात कहने के लिए कहा गया। एक दिन पहले के अपने रवैये पर पुन: आते हुए देशराज कर्णवाल ने जीएसटी बिल की बजाय पुन: भीमराव अंबेडकर का मामला गरमा दिया। पूरी विधानसभा में किसी को एक बार फिर समझ में नहीं आया कि देशराज कर्णवाल क्यों बाबा भीमराव अंबेडकर के पीछे पड़े हुए हैं। आखिरकार डांट-डपटकर देशराज कर्णवाल को बिठाया गया।
जीएसटी बिल पास होने के बाद देशराज कर्णवाल संसदीय कार्य मंत्री प्रकाश पंत के पास पहुंचे और बार-बार कहने लगे कि यदि मेरा काम नहीं हुआ तो इसका असर २०१९ के लोकसभा चुनाव पर पड़ेगा। संसदीय कार्य मंत्री प्रकाश पंत पहले ही सदन के भीतर देशराज कर्णवाल की हरकत से दुखी थे। उन्होंने कर्णवाल को टालने की कोशिश की, किंतु देशराज कर्णवाल बार-बार २०१९ के लोकसभा चुनाव में होने वाले नुकसान की बात कहते रहे।
देशराज कर्णवाल का कहना था कि झबरेड़ा में जिन लोगों ने पोस्टर फूंकने का काम किया, यदि शीघ्र ही उनके खिलाफ कार्यवाही नहीं की गई तो फिर २०१९ भारी पड़ जाएगा। देशराज कर्णवाल की बातों से आजिज आकर प्रकाश पंत ने कर्णवाल के पक्ष में एक-दो फोन किए और फिर कर्णवाल को स्पष्ट रूप से कह दिया कि वो अति उत्साह में अपनी और पार्टी की किरकिरी न करवाएं। सदन के भीतर नियम, कायदे, कानूनों के तहत चर्चा करें और सीखने की कोशिश करें। देशराज कर्णवाल सीखने-पढऩे की बजाय पुन: एक बार फिर उसी बात पर अड़ गए कि वो तो बाबा साहब भीमराव अंबेडकर के स्वाभिमान की लड़ाई लड़ रहे हैं। किसी तरह प्रकाश पंत ने नए-नवेले विधायक से पिण्ड छुड़ाया।
देशराज कर्णवाल सुरक्षित झबरेड़ा विधानसभा सीट से चुनाव जीतकर आए हैं। २०१२ का विधानसभा चुनाव उनकी पत्नी लड़ी और बुरी तरह हारी। देशराज कर्णवाल इससे पहले जिला पंचायत सदस्य रह चुके हैं। कर्णवाल विधायक बनने के बाद पूरे जोश-खरोश से लवरेज हैं और अब उनकी नजर किसी तरह २०१९ में हरिद्वार लोकसभा के टिकट पर है।
देखना है कि बाबा भीमराव अंबेडकर के नाम पर विधायक देशराज कर्णवाल टिकट लाने में कामयाब होते हैं या नहीं।

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