सियासत

फिर कांग्रेस का किला भेदने की तैयारी में भाजपा

रामनगर नगर पालिका अध्यक्ष की कुर्सी पर विराजने में भाजपा हमेशा से असफल रही है। लेकिन इस बार भाजपा की कोशिश मोदी मैजिक के सहारे लगातार हार का सिलसिला खत्म कर इतिहास रचने की है। दावेदारों की भरमार और यहां के विपरीत समीकरणों के बीच भाजपा का कांग्रेस के किले पर सेंधमारी करना आसान नजर नहीं आ रहा है। 
सुमित जोशी//रामनगर(नैनीताल)
राज्य में अगले साल निकाय चुनाव होने हैं। इसको लेकर दावेदारों समेत राजनीतिक दलों ने योजनाएं और अपने समीकरण बैठाने शुरू कर दिये हैं। सत्ता में काबिज भाजपा अपने प्रचंड बहुमत की चमक बरकरार रखने की मंशा से चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी कर रही है।
 तो वहीं 2017 विधानसभा चुनाव में मुंह की खा चुकी कांग्रेस अपनी उपस्थिती का अहसास कराते हुए वापसी के इरादे से चुनावी मैदान में उतरने की रणनीति बना रही हैं।
चुनावों की घोषणा फिलहाल नहीं हुई है। लेकिन प्रशासनिक अमला चुनाव की तैयारी में जुटा नजर आ रहा है। प्रशासन की तैयारियों को देखते हुए अप्रैल के अंतिम सप्ताह में राज्य में निकाय चुवान के होने की सम्भावनाएं जताई जा रही है। ऐसे में राज्य गठन के बाद से ही हाॅट सीट रहने वाली रामनगर विधानसभा में पालिका के समीकरण सत्ताधारी भाजपा के विपरीत ही रहे है, और वर्तमान में कांग्रेस का यहां कब्जा है।
इसको देखते हुए इस बार भाजपा संगठन ने अपनी रणनीति बनाने में यहां जोर दे रखा है। भाजपा संगठन को उम्मीद है कि इस बार मोदी मैजिक के सहारे रामनगर नगर पालिका में भगवा पताका लहराई जा सकती हैं। जिसको लेकर पार्टी की स्थानीय इकाई ने पालिका क्षेत्र के अंदर आने वाले सभी वार्डों में अपनी इकाईयों को सक्रिय करने की कवायद शुरू कर दी है। बीते दिनों हुई पार्टी कार्यकर्ताओं की बैठक में तमाम कार्यकर्ताओं को पालिका चुनाव और 2019 लोकसभा चुनाव में सफलता के लिए जिम्मेदारी भी सौंप दी गई हैं। लेकिन रामनगर पालिका चुनाव के समिकरण हमेशा से ही भाजपा के विपरीत ही रहे हैं। और यहां निर्दलिय और कांग्रेस का ही कब्जा अध्यक्ष की कुर्सी पर रहा है। जिससे रामनगर पालिका में भाजपा की भगवा पताका फहराने की राह आसान नजर नहीं आ रही हैं।
हाल ही में हुए जनसंख्या के आधार पर हुए सीमांकन के बाद रामनगर नगर पालिका में 19 वार्ड हो गये हैं। इससे पहले 15 वार्डों वाली इस नगर पालिका में दलित और मुस्लिम मतदाता हमेशा से ही निर्णायक की भूमिका में रहे हैं। अलग राज्य बनने के बाद राज्य को पहली निर्वाचित सराकर कांग्रेस पार्टी की मिली। रामनगर पालिका के समीकरण से परिचित कांग्रेस ने यहां का पालिका सीमांकन अपने समीकरणों को देखते हुए कर दिया। राज्य गठन के दौरान रामनगर पालिका में कांग्रेस का ही कब्जा था। जिसके बाद हुए चुनाव मे यहां सीट महिला आरक्षित हो गई और निर्दलीय महिला प्रत्याशी ने इस सीट पर कब्जा किया। जिसके बाद राज्य में 2007 में हुए चुनाव में भाजपा को सफलता मिली लेकिन भाजपा कांग्रेस के द्वारा किये सीमांकन को नहीं बदल सकी और 2008 पालिका चुनाव में फिर से समीकरण कांग्रेस की रणनीति के तहत ही बैठे पर निर्दलीय मो.अकरम अध्यक्ष और भाजपा की रणनीति एक बार फिर से यहां फेल साबित हुई।
2013 निकाय चुनावों में रामनगर पालिका के अध्यक्ष मो.अकरम पर दांव खेल कर कांग्रेस पालिका में एक बार फिर विराजने में सफल रही। एक बार फिर माहौल कुछ हद तक वैसा ही नजर आ रहा है क्योंकि जनसंख्या के आधार पर यहां वार्डों की संख्या बढ़ा दी गई है। लेकिन सीमांकन और समीकरण अभी भी कांग्रेस के सजाए गेम प्लान की तरह ही हैं। भाजपा अपनी लगातार हार के सिलसिले को तोड़ने के लिए रणनीति बनाने में लगी है। तो वहीं कांग्रेस के विधायक प्रत्याशी रहे रणजीत रावत भी अपनी भावी सियासत को देखते हुए रामनगर नगर पालिका की सीट पर कांग्रेस की बादशाहत कायम रखने की जुगत में लगे नजर आ रहे हैं।
देवभूमि की सत्ता में विराजमान भाजपा अपनी चमक को बरकरार रखने के लिए निकाय चुनाव के रण में उतरने की रणनीति बना रही है। भाजपा संगठन दावेदारों की भरमार को देखते हुए अभी से संभावित डेमेज कंट्रोल की मुद्रा में नजर आ रहा है। जिसके लिए संगठन ने राज्य की 70 विधानसभाओं में अपने पूर्णकालिक विस्तारकों की फौज तैनात कर दी है। जो 2019 लोकसभा चुनाव के साथ 2018 निकाय चुनाव के लिए भी संगठन की रीढ की तरह काम करेंगे।
पार्टी संगठन के साथ ही सरकार भी निकाय चुनाव के लिए बिसात बिछाने का काम कर ही है। इसके साथ पीएम मोदी के मैजिक को भी भाजपा अपनी संजीवनी केे तौर पर देख रही है। मगर रामनगर पालिका क्षेत्र के कांग्रेस पक्षीय जातीय समीकरणों को देखें तो भाजपा के रामनगर में कांग्रेस के किले को ध्वस्त कर यहां भगवा पताका लहराना आसान नहीं होगा।

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