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जीएमवीएन की एमडी ज्योति नीरज खैरवाल ने निगम को सुधारने के लिए उठाए कड़े कदम

मंदी आर्थिक हालात से जूझ रहे गढ़वाल मंडल विकास निगम को आर्थिक रूप से मजबूत और कार्यों को पटरी पर लाने के लिए नए प्रबंध निदेशक बनी ज्योति नीरज खैरवाल ने कई वर्षों से एक ही स्थान पर जमे कर्मचारियों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजकर न केवल कर्मचारियों की कमियों को पूरा किया, बल्कि वर्षों से बिना काम के वेतन ले रहे कर्मचारियों को भी काम पर लगा दिया है।
इतना ही नहीं वर्षों से हर होटल में एक कमरा प्रबंध निदेशक के नाम पर आरक्षित रहता था, जिससे निगम को आर्थिक रूप से काफी हानि होती थी।
ज्योति नीरज खैरवाल के प्रबंध निदेशक बनते ही उस आरक्षित कमरे को पर्यटकों के लिए खोल दिया गया है, जिससे आय में काफी बढोतरी होने की पूर्ण संभावना है। इसके अलावा कम आय वाले पीआरओ कैंपस को भी बंद करने का निर्णय लिया गया है।

नए प्रबंध निदेशक द्वारा निगम हित में उठाए जा रहे यह छोटे-छोटे कदम कितने कारगर साबित होंगे, यह भविष्य में देखने लायक है। जीएमवीएन में प्रथम बार प्रबंध निदेशक का पद किसी महिला अधिकारी के हाथ में आया तो पहले दिन से उनकी असफल होने की चर्चाएं होनी लगी थी, किंतु अपने कुशल प्रबंधन से निगम हित में उनके द्वारा जो कदम उठाए जा रहे हैं, उसे देखकर सभी दंग हैं।
निगमों में अत्यधिक राजनैतिक हस्तक्षेप के कारण किसी भी मजबूत फैसले को लेना किसी भी प्रबंध निदेशक के लिए दूर की कड़ी साबित होती है। कर्मचारियों की तैनाती भी राजनैतिक स्तर से ही होती है। यहां सीधी भर्ती की कोई परंपरा नहीं है। जिसके परिणामस्वरूप ऊंची पहुंच के चलते कुछ कर्मचारी काम न कर अपनी राजनैतिक रोटियां सेकते हैं।
प्रबंध निदेशक द्वारा किए गए स्थानांतरण में अधिकतर वह कर्मचारी हैं, जो अपनी नियुक्ति से ही एक ही स्थान पर जमे हैं या फिर उनके पास वर्तमान में कोई काम नहीं है। सरनजीत कौर अपनी नियुक्ति से ही राजपुर रोड मुख्यालय में जमी थी, क्योंकि इनका पति सतपाल गांधी निगम में ही एकाउंट अधिकारी है और इन दोनों को एक ही कक्ष आवंटित है। सतपाल गांधी अलग-अलग कारणों से चर्चा में रहने वाले अधिकारी हैं। कभी इनकी भर्ती पर सवाल उठते रहे कभी योग महोत्सव में फोटोग्राफी के कारण तो कभी एकाउंट अधिकारी होने के नाते विदेश में सरकारी भ्रमण हो या अपने अधीनस्थ कर्मचारियों से मार-पिटाई को आदि तमाम मुद्दों के कारण चर्चाओं में बने रहे। सरनजीत कौर अपने आवास 87डी पार्क रोड देहरादून में रिफ्लेशन नाम की एक फोटोग्राफी कंपनी चलाती है, जिसका सारा काम उनका पति सतपाल गांधी देखते हैं। वर्ष 2001 में नन्दा देवी राजजात के समय पर इस कम्पनी को काम दिलाने के लिए गांधी ने एड़ी-चोटी के जोर लगाया था, परंतु काफी शिकायतों के बाद भी कोई प्रबंध निदेशक इनका कुछ भी नहीं कर पाया।
विजय गुप्ता भी इसी तरह का नाम है, जिनका कार्य कर्मचारियों का आयकर विवरण भरने तक ही सीमित था। वह भी रिटायरमेंट के करीब होने पर आज तक हिले नहीं। पीआरओ कैंप मुंबई में भी पति-पत्नी जोड़ी का खेल चल रहा था। पीआरओ मुंबई द्वारा अपनी ही पत्नी प्रभा बडोनी को अपने कार्यालय में काम पर लगा रखा था। उनका स्थानांतरण देहरादून करना भी मजबूत फैसला है।
इसी प्रकार पीआरओ कैम्प लखनऊ में तैनाती से ही जमी रेनू रघुवंशी को होटल द्रोणा में स्थानांतरण किया गया है। खनन अनुभाग देहरादून में वर्षों से जमे कर्मचारियों को भी दूर-दूर पटका गया है। इसमें सबसे चर्चित चेहरा दिग्विजय नेगी है। वह हमेशा ही अपनी ऊंची पहुंच का हवाला देते रहते हैं और मुख्यमंत्री के साथ फोटो खिंचवाकर रौब झाड़ते रहते थे। उनका स्थानांतरण हरकीदून के समीप के गेस्टहाउस में कर दिया गया। अब देखना यह है कि उनकी यह तुरुप के इक्के वाली फोटो क्या गुल खिलाएगी।
जब से जीएमवीएन की स्थापना हुई, तब से अब तक कुछ प्रबंध निदेशकों के नाम अच्छे कार्यों के लिए लिए जाने जाते हैं। उनमें प्रमुखता से आरके सिंह, उमाकांत पंवार, वीवीआरसी पुरुषोत्तम, सी. रविशंकर आदि ऐसे नाम हैं, जिन्होंने लीक से हटकर कार्य किया, किंतु इस कड़ी में वर्तमान प्रबंध निदेशक ज्योति नीरज खैरवाल का भी नाम लिया जाएगा। हालांकि एमडी द्वारा किए जा रहे कार्यों का असर कुछ उन कर्मचारियों पर भी पड़ेगा, जो सीधे, सरल और अपने कार्यों से मतलब रखते हैं।
आपदा के बाद सबसे अधिक आर्थिक नुकसान निगम को ही हुआ। आज पांच वर्ष बीतने के बाद भी निगम इससे उबर नहीं पाया है। हालात यह हैं कि कई महीनों से कर्मचारियों को वेतन के लाले पड़े हुए हैं। सभी सरकारी आयोजन सरकार द्वारा निगम से ही संपन्न कराए जाते हैं, किंतु निगम की हालत खराब होती देख सरकार ने भी निगम से पल्ला झाड़ दिया है। न तो आर्थिक मदद ही की और न ही नए कार्यों में सम्मिलित किया।
उदाहरण के लिए गैरसैंण विधानसभा के दौरान भोजन की व्यवस्था किसी प्राइवेट संस्था से करवाकर सरकार ने साफ कर दिया कि हमें जीएमवीएन की दयनीय आर्थिक हालात से कोई मतलब नहीं है। इस स्थिति से गुजर रहे निगम में वर्तमान में अपने में ही बड़े बदलाव की आवश्यकता है। शायद नई प्रबंध निदेशक इसी पैटर्न पर कार्य कर रही हैं।
बहरहाल, भविष्य में यह देखना दिलचस्प होगा कि इन कड़े फैसलों से कितने कर्मचारी मेडिकल पर जाकर फैसले के खिलाफ जाते हैं और कितने कर्मचारी फैसले का स्वागत कर मजबूती से कार्य करते हैं।
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