धर्म - संस्कृति

मौत के रहस्य का गवाह है यह ताल!

कहां है वो यमद्वार, जहां से आते हैं मृत्यु के देवता यमराज, बालक की जिद पर आना पड़ा जहा यमराज को, कहां हुआ विष्णु नारायण और यमराज का युद्ध

गिरीश गैरोला//

पैदा होने वाले हर इंसान की  एक दिन मौत निश्चित है । इसके बाद भी हर इंसान मौत के नाम से ही खौफ ज़दा हो जाता है। आखिर मरने के बाद इंसान जाता कहा है? ये सवाल जो आज आपके मन मे पैदा हो रहा है वही सवाल वर्षो पहले ऋषि पुत्र नचिकेता के मन मे भी पैदा हुआ था । जब उसके पिता उसके सवाल का जबाब नही दे सके तब बालक नचिकेता मौत के रहस्य को जानने खुद यमराज की तलाश में घर छोड़ जंगल मे तपस्या करने निकल पड़े। और इस ताल के पास वर्षो की साधना के बाद खुद यमराज ने उन्हें मौत का पूरा रहस्य समझाया था। ताल के पास ही एक गुफा है मान्यता है कि इसी मार्ग से यमराज इस स्थान पर उतरे थे। नचिकेता ताल में साधनारत बाबा की माने तो तपस्या कर रहे बालक नचिकेता को भेष बदल कर देखने पहुचे विष्णु नारायण और यमराज में युद्ध भी इसी स्थान पर हुआ था।


ऊत्तरकाशी जिला मुख्यालय से 27 किमी घने जंगल के बीच  सर्पिलाकार पहाड़ी मार्ग से होकर केदारनाथ मार्ग पर चौरंगी खाल नामक स्थान पडता है।
यह स्थान  तांत्रिक क्रिया के गुरु चौरंगीनाथ की तपो भूमि रही है और पास में ही इनका  मंदिर भी है। यह पहुचने वाले सभी पर्यटक और श्रद्धालु यात्री मंदिर दर्शन के बाद ही आगे बढते है। चार धाम यात्रा काल मे इस छोटे से स्थान पर यात्रिओ की भीड़ उमड़ती है और वे यहां पर उतर कर मौसम का मजा लेने के साथ पेट पूजा भी करते है । शीतकाल  में यहां सन्नाटा छाया रहता है किंतु बर्फवारी के बीच कड़कती शर्दी में शीतकालीन पर्यटन को बढ़ावा मिलने के बाद अब शर्दी में भी यह स्थान पर्यटकों से गुलजार रहने लगा है। चौरंगिखाल के ढाबो में आज भी  चूल्हे में  लकड़ी जलाकर पारंपरिक  भोजन पकाया जाता है जिसके चलते इसका स्वाद लेने के लिए पर्यटक उत्सुकता से  अपनी बारी का इंतजार करते है।


चौरंगिखाल से नचिकेता ताल के लिए 3 किमी का पैदल ट्रैक वन विभाग ने बनाया है। यहां वन विभाग की टोल चौकी से भारतीय को 10 रु तो विदेशी को 40रु की पर्ची कटवाने के बाद ही आगे जाने की अनुमति मिलती है। मार्ग में बांज बुरांस मोरू के घने पेड़ सुंदर दृश्य पैदा करते है । मार्ग में जंगल इतना घना है कि इस तरफ धूप पेड़ों को चीर कर नही पहुच सकती लिहाजा महीनों पहले हुई बर्फवारी आज भी मार्ग में देखी जा सकती है। मार्ग की चढ़ाई और ऊपर से ट्रैक पर बिखरी बर्फ सफर में एक अलग ही रोमांच पैदा करती है। कदम बेहद संभाल कर रखने होते है जरा सी असावधानी इंसान को खाई में गिरा सकती है।
तीन किमी का ट्रैक चढ़ने के बाद हम पहुचते है नचिकेता ताल में।  ताल के सुंदर जल में चारो तरफ के घने पेड़ो की सुंदर आकृति किसी आईने में सजी किसी पेंटिंग लालसी दिखाई देती है। ताल में कुटिया के बाहर बैठे बाबा बाई तरफ से ताल की परिकरिमा कर मंदिर में आने की सलाह देते है और हम ताल की खूबसूरती और उसमें तैरती ट्राउट मछलिये की तस्वीर अलग अलग एंगेल से खींचने में मशगूल हो जाते है। इस झील को लेकर कई किंवदंतियां है।

मान्यता है कि इस ताल में देवी देवता आज भी स्नान को आते है । जिस दौरान रात के समय यहां शंख और घंटो की आवाज सुनाई देती है। पास में ही एक मंदिर है वर्ष में एक बार यहां मेला लगता है जिसमे स्थानीय ग्रामीण अपनी देव डोलियों के साथ स्नान के लिए पहुचते है। भले ही देश विदेश के पर्यटक यहां पहुचते हो किन्तु टिहरी और ऊत्तरकाशी दो जनपदों के बॉर्डर पर होने का खामियाजा यहां ताल को भुगतना पड़ता है।  कोई भी जिला इसके विकास के लिए तत्पर नही  दिखता है।
पौराणिक नचिकेता ताल  न सिर्फ पर्यटकों को प्राकृतिक सुंदरता के लिए आकर्षित करता है बल्कि धार्मिक महत्व को भी समेटे हुए है। ताल में वर्षो से साधना कर रहे बाबा इस ताल के पास मौत की गुफा के जिक्र करते हुए कहते है कि बालक नचिकेता की तपस्या को देखने के लिए भगवान विष्णु नारायण भेड़ के रूप में प्रकट हुए तभी यमराज भी भैंस के रूप में अवतरित हुए। किंबदंतिया है कि दोनों में भयंकर युद्ध हुआ जिसके बाद विष्णु रूपी भेड़ ने भैंस रूपी यमराज को पूंछ पकड़ कर जिस स्थान पर पटका था उस स्थान पर हुए गड्ढे में यह ताल निर्मित हो गया और ऊपरी ताल का पानी इसमे भर गया जिदके बाद ऊपरी ताल को काना ताल कहा गया। मान्यता ये भी है कि काना ताल में आज भी वो गुफा मौजूद है जहाँ से यमराज इस स्थान पर उतरे और बालक नचिकेता को मौत का रहस्य बताया था।
दिल्ली से अपने तीन पीढ़ियों के  परिवार के साथ ताल में टैंट लगाकर कैम्पिंग कर रहे पर्यटकों ने बताया कि इस स्थान पर पहुचने के लिए प्रकृति से प्रेम होना बेहद जरूरी है । ध्यान योगा के साथ ईश्वरीय शक्ति के अहसास के लिए ये बेहद उपयुक्त स्थान है किंतु
इंटरनेट पर इसके बारे में कुछ ज्यादा नही लिखा गया है   और न ही इस स्थान पर कोई सूचना पट ही है जिसमे इस स्थान के बारे में कुछ लिखा गया है । जबकि पर्यटन विभाग इस स्थल को विकसित कर यहां पर्यटन को बढ़ावा दे सकता है।
लाल झंडी के पास ये वही गुफा है जिसके बारे में मान्यता है कि  यमराज इसी गुफा से  यहां पहुचे थे और इसी गुफा में ऋषि पुत्र नचिकेता को मौत का रहस्य यमराज ने खुद बताया था। ये भी कहा जाता है कि इस गुफा में जो कोई भी अंदर गया वापस लौट कर नही आया। तन्त्र मंत्र शिद्धि के लिए ये स्थान बेहद उपयुक्त बताया जाता है और मान्यता है कि इस स्थान पर  कम समय मे ही   मंत्र शिद्धि प्राप्त हो जाती है। आज भी यहा पहुँचने वाले लोग इस गुफा की परिकरिमा कर नचिकेता ऋषि से आशीर्वाद मांगते है।
चार धाम यात्रा के साथ उत्तराखंड के पहाड़ो में पर्यटकों को रिझाने के लिए बहुत कुछ  है  किन्तु जिम्मेदार पर्यटन विभाग खुद इस से अनजान बना है तो किसी और से क्या उम्मीद कर सकते है।

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