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रोचक:तिब्बत पर माधोसिंह भंडारी की विजयपर्व की इस दीवाली को भी जानते हो क्या!

मंगसीर की बग्वाल पर बिखरे संस्कृति के रंग 
संस्कृति का संरक्षण आज की जरूरत
स्कूलों की भूमिका अहम् 
गिरीश गैरोला
तिब्बत पर विजय के प्रतीक स्वरूप उत्तराखंड के गढ़वाल मे मनाई जाने वाली दिवाली, पारंपररिक कार्तिक महीने की दिवाली से एक महीने बाद मनाई जाती है। मँगसीर महीने की 2 और 3 गते को इसका भव्य आयोजन किया जाता है। किन्तु तीन दिन पूर्व से ही गांव के पंचायती चौक और उत्तरकाशी नगर के रामलीला मैदान मे इसकी तैयारियां शुरू हो जाती है।
     नयी पीढ़ी को पहाड़ की समृद्ध संस्कृति के रूबरू कराने के लिए विवेकानंद फाउंडेशन स्कूल गणेशपुर मे भी स्कूल के छात्रों और अभिभावकों ने पारंपरिक वेशभूषा ,गढ़ भोज और अग्नि कुंड के चारों तरफ सामूहिक रांसों –तांदी नृत्य कर एक  दूसरे को बग्वाल की शुभ कामनाएँ  दी।
‘रियासते-टिहरी’ ( राजशाही के समय टिहरी और उत्तरकाशी जनपद का हिस्सा जो अंग्रेज़ों के अधीन न होकर टिहरी राज शाही के अधीन था ) के सेनापति गढ़वाली वीर माधो सिंह भण्डारी की वीरता की कहानियों से इतिहास भरा पड़ा है किन्तु तिब्बत के साथ युद्ध के दौरान वीर माधो सिंह भण्डारी के नेतृत्व मे गढ़वाली वीरों के सेना को युद्ध के मैदान मे भेजा गया था, उस वक्त युद्द के चलते कार्तिक महीने  की दिवाली मे माधो सिंह अपने घर नहीं लौट सके। लिहाजा जनता ने उस वर्ष दिवाली नहीं मनाई और उनके वापस लौटने के बाद उनके स्वागत मे दीप जलाकर और नाच-गाने से उनका स्वागत किया था। तब से लेकर आज तक टिहरी रियासत मे कार्तिक की दिवाली के एक महीने बाद 2–3गते मंगसीर को फिर से दिवाली मनाने की परंपरा  की सुरुआत हुई, जिसे स्थानीय बोली मे बग्वाल कहा जाने लगा।
गढ़वाल की इस बग्वाल की तैयारियों के लिए गांव के पंचायती चौक तीन दिन पूर्व से ही सजने लगे हैं। नई पीढ़ी के साथ देश विदेश से आए पर्यटकों को गढ़वाली संस्कृति और बग्वाल के महत्व से रूबरू करवाने के लिए उत्तरकाशी नगर के रामलीला मैदान मे तैयारियां चल रही हैं।
नयी पीढ़ी को पहाड़ की समृद्ध संस्कृति के रूबरू कराने के लिए विवेकानंद फाउंडेशन स्कूल गणेशपुर मे भी स्कूल के छात्रों और अभिभावकों ने पारंपरिक वेशभूषा ,गढ़ भोज और अग्नि कुंड के चारों तरफ सामूहिक रांसों –तांदी नृत्य कर एक दूसरे को बग्वाल की शुभ कामनाएँ  दी
विवेकानंद यूथ फाउंडेशन स्कूल के प्रबन्धक स्वामी चेतन ने बताया कि वह 25 वर्ष पूर्व वे उत्तरकाशी आए थे। उन्होने कहा कि पहाड़ की  संस्कृति ही यहां की धरोधर है। बच्चों को अँग्रेजी पढ़ाने से ज्यादा जरूरत संस्कृति को सहेज कर रखने की है

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