राजनीति

रैबार देने से पहले ही रैबारी हुए गायब!

केदारनाथ पुनर्निर्माण यात्रा के लिए  दिल्ली से आने वाली टीम  का जोश केदारनाथ में माइनस जीरो टेंपरेचर के कारण ठंडा पड़ गया है।

 9 फरवरी से होने वाली है यात्रा स्थगित हो गई। केदारनाथ में इस ठंड में काम कर रहे मजदूरों का हौसला बढ़ाने के नाम पर शुरू की गई इस यात्रा पर अब  सवाल खड़े हो रहे हैं।
 इसके  राजनीतिक निहितार्थ निकाले जाने लगे हैं। केंद्र सरकार और  उत्तराखंड से पलायन कर बाहर जा बसे लोगों के मन में  उत्तराखंड की एक सॉफ्ट स्टेट की छवि तैयार हो रही है, जिसमें वह कुछ भी प्रयोग कर सकते हैं। राजनीतिक विश्लेषक  इस बात को लेकर भी चौकन्ने हैं कि श्री नरेंद्र मोदी ने आगामी लोकसभा चुनाव का बिगुल  केदारनाथ से ही फूंकने का मन बनाया है।

 केदारनाथ के पुनर्निर्माण के लिए हजार करोड रुपए से भी अधिक का बजट  और  राज्य सरकार  के मुख्य सचिव द्वारा इसकी लगातार मॉनिटरिंग  के साथ साथ अब  रैबार कार्यक्रम के माध्यम से केंद्रीय अधिकारियों के दल के साथ  केदार यात्रा के पीछे का मकसद  पूरी तरह से राजनीतिक  प्रतीत होता है।  हालांकि अभी केदारनाथ यात्रा बंद होने और केदारनाथ का तापमान असहनीय होने से यह यात्रा स्थगित हो गई है, लेकिन  तापमान थोड़ा बढ़ते ही यह यात्रा  फिर से शुरू होगी।
  इस यात्रा के पीछे तर्क तो यह दिया जा रहा है कि यात्रा का मकसद वहां काम कर रहे मजदूरों का हौसला बढ़ाना है, किंतु यदि मकसद यहीं तक सीमित होता तो मजदूरों का हौसला बढ़ाने का वक्त तो यही सबसे बढ़िया था।
  अनुकूल तापमान तक यात्रा को स्थगित करने से यह बात साफ हो गई है कि यात्रा का मकसद कांग्रेस पार्टी से केदारनाथ में कराए गए कार्यों का श्रेय छीन लेना है।
 मुख्य सचिव उत्पल कुमार लगातार केदारनाथ के पुनर्निर्माण कार्यों की मॉनिटरिंग कर रहे हैं। वह कई बार केदारनाथ आ- जा चुके हैं। यह हरीश रावत के द्वारा शुरू कराई गए कार्यों का ही जलवा था कि मोदी लहर की बीच एक बिल्कुल नए व्यक्ति को केदारनाथ की जनता ने चुनकर विधानसभा भेज दिया था। राजनीतिक विश्लेषक इस केदार यात्रा को करने के पीछे मानते हैं कि भाजपा इस तरह के कार्यक्रम के माध्यम से कांग्रेस से केदारनाथ में कराए गए कार्यों का श्रेय छीन लेना चाहती है। उत्तराखंड के विकास के नाम पर इसी तरह का एक कार्यक्रम पिछले साल नवंबर में भी आयोजित किया गया था।
4 नवंबर 2017 को उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने एक वीडियो जारी किया, जिसमें उन्होंने नया उत्तराखंड निर्माण के लिए लोगों के सुझाव मांगेे और उन्हें मुख्यमंत्री आवास में होने वाले रैबार कार्यक्रम में आमंत्रित किया। अगले दिन जब 5 नवंबर को लोग सुझाव देने रैबार कार्यक्रम स्थल पर पहुंचे तो उन्हें यह कहकर बाहर ही रोक दिया गया कि अंदर तो मीडिया की भी एंट्री बंद है तो तुम्हारे सुझाव कैसे लिए जा सकते हैं। बाद में कार्यक्रम समाप्त होने के बाद मुख्यमंत्री ने बीजापुर गेस्ट हाउस में एक प्रेस कांफ्रेंस की और बताया कि नया उत्तराखंड बनाने के मकसद से आयोजित रैबार कार्यक्रम सफल रहा, जिसमें आचार्य बालकृष्ण से लेकर प्रसून जोशी, जनरल विपिन रावत सहित आधा दर्जन लोग मौजूद थे।


मुख्यमंत्री निवास में आयोजित इस रैबार कार्यक्रम में उन तमाम लोगों ने क्या सुझाव दिए, यह वास्तव में आज तक राज का ही विषय है, क्योंकि सरकार की ओर से भी यह नहीं बताया गया कि किस-किस व्यक्ति ने नया उत्तराखंड बनाने के लिए क्या सुझाव दिए और सिर्फ 17 साल के युवा उत्तराखंड को अब नया उत्तराखंड बनाने की नौबत क्यों आन पड़ी। इस कार्यक्रम की आलोचना के बाद एक और कार्यक्रम 9 फरवरी 2018 से 12 फरवरी 2018 तक तय किया गया। जिसमें केदारपुरी पुनर्निर्माण अभियान के माध्यम से नया उत्तराखंड निर्माण की बात कही गई थी। इस अभियान दल के लिए बताया गया था कि इसमें प्रधानमंत्री के सचिव भाष्कर खुल्बे, कोस्ट गार्ड महानिदेशक राजेंद्र धस्माना, एयर इंडिया के सीएमडी प्रदीप खरोला, विदेश मंत्रालय के संयुक्त सचिव आलोक डिमरी, ब्रह्मोस के सीईओ सुधीर मिश्रा, महिला क्रिकेटर एकता बिष्ट, मानसी जाशी, फिल्म निर्माता मधुर भंडारकर और शौर्य डोभाल शामिल होंगे। तय कार्यक्रम से ठीक एक दिन पहले कार्यक्रम स्थगित होने की सूचना से लोग हैरान हैं कि आखिरकार अचानक ऐसी क्या नौबत आई कि रैबार कार्यक्रम को रोकना पड़ा।
लोकसभा चुनाव 2019 की तैयारी की दृष्टि से तमाम तरह के कार्यक्रमों के बीच इस तरह के कार्यक्रम आयोजित होना स्वाभाविक है, किंतु जिस प्रकार 9 नवंबर 2017 का कार्यक्रम ‘जंगल में मोर नाचा किसने देखा’ की तर्ज पर हुआ था, उससे उत्तराखंड के लोगों को वास्तव में निराशा हाथ लगी कि आखिरकार सरकारी धन से इस तरह का कार्यक्रम करने से उसे क्यों छुपाया गया?

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