पहाड़ों की हकीकत

देखिए वीडियो: स्युना गाँव को क्यों माँ से लगता है डर!

क्यों  सावन के मेघो से लौटने की अपील करते है गाव के बच्चे

गिरीश गैरोला

पूरे देश की पीने और सिंचाई के साथ ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने वाली गंगा माँ से स्युना गाव के लोग बेहद खौफ खाते है। सावन की फुहार से जहा लोग झुमने लगते है वहीं स्युना के लोग डर से अपने अपने घरों में दुबक जाते है।


जी हाँ ये कहानी उत्तरकाशी जिला मुख्यालय से लगे स्युना गाँव की है जो हर वर्ष के 6 महीने अपने घरों में ही कैद होकर रह जाते है। हालांकि जिला मुख्यालय से महज 4 किमी की दूरी पर गंगीरी कस्बे के सामने नदी पार स्युना गाव है, किन्तु गाँव को जोड़ने के लिए आज तक कोई संपर्क मार्ग नही बन सका। गंगा का जल स्तर कम होने पर ग्रामीण खुद श्रमदान कर लकड़ी का अस्थायी पुल बनाकर इस पर आवाजाही करते है किंतु मनेरी बैराज से अतिरिक्त पानी छोड़ने के साथ ही ये पुल बह जाता है, और गाँव के 25 परिवार काला पानी की सजा भुगतने को मजबूर हो जाते है। गाँव में  तीन साल की योगिता हो अथवा 60 साल की बुजुर्ग चन्द्रभागा , सावन के गरजते मेघो से सहम कर खुद को घर के एक कोने में कैद कर लेते है और एक अनजान अनहोनी का डर उनकी आंखों में तौरने लगता है।


बेटी पढ़ाओ और बेटी बचाओ के नारे के साथ दर्जनों बार ग्रामीण एक अदद पहुच मार्ग बनाने की अपील साशन और सरकार से कर चुके है   किंतु लोकतंत्र की भीड़ में उनकी आवाज कही दबकर रह गयी, अब  मजबूरी में लोग होटल की नौकरी ही सही
अपने बच्चों को गंगा के इस तरफ शिफ्ट कर अपने गाँव की खुली हवा छोड़कर शहर की घोंसले टाइप मॉडर्न सोसाइटी के हिस्सा बनने को मजबूर हो गए है।
गंगोरी के पास से ये स्युना गाव को जोड़ने वाला  अस्थायी पुल जब तक पानी के बहाव में बह नही जाता स्युना गाव के लोग आम जिंदगी जीते है, किन्तु इस पुल के  बहते ही वो सहम जाते है । महीने का राशन घर मे एकत्र किया जा सकता है किंतु बीमार बुजुर्ग, प्रसूता महिला, स्कूल जाने वाले छात्र आखिर किसको अपना दुखड़ा सुनाए?
ग्रामीण महिला अनिता सजवाण  अगस्त महीने की उस वरसात को नही भूली जब आसमान से मेघ गरज रहे थे नदी उफान पर थी और नदी में बना अस्थायी पुल पानी के साथ बह गया था हालांकि ये हर वर्ष की कहानी है किंतु दर्दनाक इसलिए कि प्रसव पीड़ा होने पर अनिता को पैदल जंगल के रास्ते अस्पताल तक चलना पड़ा, । अस्पताल में महिला डॉक्टर में बताया कि प्रसव नार्मल नही है आपरेशन से करना होगा। खैर आपरेशन हुआ टांके लगे और फिर से एक बार इसी जंगल के रास्ते पैदल घर जाने की चिंता। पहली बार माँ बनी एक महिला का दर्द , रास्ते मे चलते हुए जब चुभन होती तो थोड़ा देर आराम करने को बैठती तो ढलते सूर्य के साथ कम होती रोशनी और जंगल मार्ग से समय पर घर पहुचने की चिंता। आज भी उस घटना को याद कर अनिता रो पड़ती है, बच्ची एक साल की हो गयी किन्तु आज भी हालात नही बदले है, अब तो अनिता को माँ बनने से ही डर लगने लगा है।
गाव की ही संगीता भी सावन के महीने अपनी कहानी सुनाती है, पास में बैठी अपनी बेटी की तरफ इशारा कर बताती है कि गरजते मौसम में नदी उफान पर और जंगली मार्ग से अपनी बेटी को स्कूल छोड़ने गयी तो अचानक पैर फिसलने से उसकी बेटी पहाड़ी पर पलटियां खाते हुए ढलान पर गिर गयी किसी तरह लोगो की मदद से बच्ची को बाहर  निकाला।   अपनी कहानी को अपने ही अंदाज में बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ के नारे पर हमसे सवाल करती है- कैसे पढ़ाये और बचाये बेटी को?

गाव में मीडिया की टीम के आने की सूचना से बुजुर्ग महिला चंद्रभागा  भीगी आंखों से उस वाकये को याद कर बताती है कि कैसे उसके पति की तबियत खराब हुई और रास्ता न होने कारण उसे खुद अपनी पीठ पर जंगल के रास्ते पति को अस्पताल लेकर जाना पड़ा था,  किंतु देर ही गयी और अब उसके पति भी उसे इस दुनिया मे अकेला छोड़ कर चल दिये। 8 नाती पोतो  और तीन बेटो वाली चंद्रभागा आज गाव में अकेले रह गयी है।  बेटे होटलो में नौकरी कर अपने बच्चों को स्कूल के पास किराये का कमरा लेकर रह रहे है, छलकती आंखों से महिला कहती है कि बीमार होने पर अपने पति को उसने स्वयं अपनी पीठ पर लाद कर अस्पताल पहुचाया थ किन्तु अब जब वो बीमार होगी तो उसे कौन अस्पताल पहुचाएगा? । बुजुर्ग महिला के पास बर्षो से भैंस भी है जिसे अब वो अकेले होने के कारण पालने में असमर्थ है दिक्कत ये है कि उसे बेच भी नही सकती क्योंकि गाव से बाहर निकलने को  रास्ता ही नही है।


गाव के राजेश सजवाण बताते है कि गंगा के जल स्तर बढ़ने के बाद जब अस्थायी पुल बह जाता है तब वह उन्हें जंगल मार्ग से तेखला पुल तक पहुच कर बाजार, अस्पताल और अन्य कार्य से मुख्यालय तक पहुचना पड़ता है जो करीब 8 किमी दूर पड़ता है।  उस पर भी केवल पैदल ही चला जा सकता है कोई जनवर भी नही जा सकते । इसलिए गाव में न तो कोई नए पशु खरीद सकता है और न ही अपने पशु बेच सकता है।


जनवरी से मार्च तक नदी में जब पानी कम होता है उस वक्त पशुओ को आर पार कराया जा सकता है किंतु इसके लिए कम से कम 10 लोगो की जरूरत पड़ती है , जो पशु को आगे और पीछे से सपोर्ट दे सके।
नदी के किनारे किनारे यदि रास्ता बनाया जाय तो केवल दो किमी दूरी से हो लोग गंगा के इस तरफ  मुख्यालय से जुड़ सकते है किंतु गाव के 25 परिवारों की आवाज लोकतंत्र के वोट के गणित में उलझ कर रह गयी है। कई बार अधिकारियों और नेताओं मंत्री विधायको के सामने बात रखी गयी पर आजतक सुनवाई न हो सकी। गांव के राजेश की तरह अन्य लोग भी शब्जी उत्पादन करना चाहते है किंतु गांव में पेय जल की लाइन वर्षो से चोक पड़ी है पानी की पोस्ट पर या तो टोंटी ही नही है या वो सुखी पड़ी है। कुछ लोगो ने नदी से ही पाइप डालकर मोटर से पानी पम्प कर खेतो तक पहुचाया है किंतु ये एक महंगा सौदा है।
वोट के गणित सड़ चलने वाले लोकतंत्र में बहके ही स्युना गाव की आवाज दब कर दाह गयी हो किन्तु मानवाधिकार पर बड़े बोल बोलने वालों भी क्यों धृतराष्ट्र बने हुए है।

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