सियासत

विद्रोह की तैयारी में भाजपाई!

चार नए जिले बनाने की बजाय नौ जिले किए समाप्त

उत्तराखंड  में विद्रोह की राजनीति उत्तराखंड गठन के पहले दिन से ही बदस्तूर जारी है। अपनी सरकारों को हरवाने, अपने प्रत्याशियों को पैदल करने से लेकर अपने दल को क्लीनबोर्ड करने में माहिर रही भाजपा में एक नया विद्रोह तैयार हो रहा है। पहले से ही कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आए पांच लोगों को मंत्री पद देने से भड़का का मूल कार्यकर्ता एक बार फिर निराश है।
इस बार यह विद्रोह भारतीय जनता पार्टी के उस संगठन के खिलाफ है, जिसे कल तक भाजपाई अपनी विचारधारा बताते थे। २३ में से घटाकर १४ बच चुके सांगठनिक जिलों को घटाने के कारण यह विद्रोह तैयार हो रहा है। अमित शाह की इस बात का प्रदेश भाजपा जवाब देने से डर गई कि विषम भोगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए उत्तराखंड में २३ जिले बनाए गए थे, ताकि संगठन स्तर पर भाजपा कहीं कमजोर न पड़े।
यदि अमित शाह को यह गणित समझा दी जाती कि पर्वतीय क्षेत्रों में एक व्यक्ति का एक दिन में दो अलग-अलग बैठकों में सैकड़ों किमी. दूर जाकर पहुंचना नामुमकिन है तो शायद सांगठनिक जिलों को समाप्त करने की नौबत न आती। आखिर में बनाए गए देवप्रयाग जिले का ही उदाहरण यदि अजय भट्ट अमित शाह को समझा देते कि टिहरी के जिलाध्यक्ष के पास पौड़ी लोकसभा की दो विधानसभाएं देवप्रयाग और नरेंद्रनगर होने के कारण टिहरी और पौड़ी लोकसभा सांसदों द्वारा एक दिन में बैठक बुलाने के कारण टिहरी के जिलाध्यक्ष का दोनों स्थानों पर पहुंच पाना नामुमकिन था, इस कारण देवप्रयाग को पृथक जिला बनाया गया। इस बात को कहने की बजाय अजय भट्ट ने आनन-फानन में ९ जिलों को समाप्त करने का एकतरफा फरमान सुना डाला। इन ९ सांगठनिक जिलों में भारतीय जनता पार्टी के तकरीबन ४०० कार्यकर्ता कार्यरत थे, जो इस निर्णय के बाद पैदल हो चुके हैं।
एक ओर ५७ विधायकों के भार के कारण संगठन के लोग सरकार में एडजस्ट नहीं हो पा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर अब संगठन को समेटने से संगठन और कमजोर हुआ है।
काशीपुर, रुड़की, पछवादून, कोटद्वार, डीडीहाट, पुरोला, देवप्रयाग, रुद्रपुर, रानीखेत के सांगठनिक जिलों को समाप्त करने के बाद इन जिलों में काम कर रहे भाजपा के कार्यकर्ता अब मोर्चे पर हैं।
निराशा का यह वातावरण लोकसभा चुनाव २०१९ से ठीक पहले भाजपा को कहां लेकर जाता है, यह देखने लायक होगा। बहरहाल, इस बात को लेकर आक्रोश है कि प्रदेश अध्यक्ष ने अपनी कुर्सी बचाने के लिए जिलाध्यक्षों की बलि लेकर उनकी दीपावली काली कर दी।

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