एक्सक्लूसिव पहाड़ों की हकीकत

“विकास” की कहानी में हाशिये पर “हक” का सवाल…

योगेश भट्ट//

दावा है कि 2019 तक प्रदेश में 12000 करोड़ की ‘आल वेदर रोड’ परियोजना परवान चढ़ जाएगी । अगर यह सच है तो तय मानिये आने वाले दो साल उत्तराखंड पर बहुत भारी पड़ने जा रहे हैं। विकास के नाम पर उत्तराखंड को इन दो सालों में बहुत बडी कीमत अदा करनी होगी, यकीन नहीं होता तो देखिये ऋषिकेश धरासू के बीच राष्ट्रीय राजमार्ग-94 पर जाकर। सडक को चौड़ा करने के लिये यहां पेड़ों का कटान शुरू हो चुका है। यह तो मात्र शुरुआत है प्रदेश में अगले दो सालों में सात अलग अलग राष्ट्रीय राजमार्गों पर विकास की यह दर्दनाक कहानी लिखी जानी है। इस दौरान दुर्लभ प्रजाति के वर्षों पुराने सैकड़ों पेड़ों का कटान होगा, जगह जगह पहाड का सीना चीरा जाएगा।

पर्यावरण और पारिस्थतिकी को जमकर नुकसान पहुंचाया जाएगा । छोटे काश्तकारों को अपनी जमीन छोड़नी होगी तो किसी को जमे जमाये रोजगार से हाथ धोना होगा। मोटे आंकलन के मुताबिक सात टुकडों में तैयार होने वाली इस परियोजना में तकरीबन चालीस हजार पेड़ कटेंगे । तब कहीं जाकर ‘आल वेदर रोड’ नाम का वह ड्रीम प्रोजेक्ट पूरा होगा, जिसके लिये यह प्रचारित किया जा रहा है कि इसके बाद उत्तराखंड में विकास की नयी इबारत लिखी जाएगी।

आल वेदर रोड उत्तराखंड में विकास की क्या इबारत लिखेगी ,फिलहाल तो यह कहा नहीं जा सकता लेकिन उत्तराखंड को यह बड़ा “दर्द” जरूर देने जा रही है। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि विकास की इस कहानी में उत्तराखंड के हक का सवाल आज हाशिये पर है। कोई इस विकास के लिये चुकायी जा रही कीमत और उस पर उत्तराखंड के हक की बात करने को तैयार नहीं, वह चाहे राज्य की सरकार हो या फिर राज्य के ठेकेदार । आल वेदर रोड़ की सच्चाई सिर्फ वही नहीं है जो सरकार बता रही है । हो सकता है कि परियोजना पूरी होने पर चार धाम यात्रा थोडा सुगम और आरामदेह हो जाए, लेकिन इसके लिये भी कीमत चुकानी होगी। इस आल वेदर रोड़ पर यात्रा करने वालों को ‘टोल’ देना होगा । स्थानीय लोगों के लिये ‘टोल’ का यह बोझ कितना कष्टकारी होगा यह अभी कहा नहीं जा सकता, क्योंकि अभी तो संभवत: इसकी लोगों को जानकारी भी नहीं है । जहां तक राज्य सरकार का सवाल है तो वह इस प्रोजेक्ट को मोदी जी का उत्तराखंड के लिये ‘तोहफा’ मानती है । लेकिन यह समझ नहीं आता कि जिसके लिये बडी कीमत चुकायी जा रही हो वह ‘तोहफा’ कैसे हो सकता है।

आखिर यह किन मायनों में ‘तोहफा’ है, क्या इससे राज्य की आमदनी में बहुत इजाफा होने जा रहा है या रोजगार के नए अवसर खुलने जा रहे हैं ? क्या पर्यटन के लिहाज से ही कुछ नया होने जा रहा है या फिर पहाड का कठिन जीवन कुछ आसान होने जा रहा है ? ऐसा तो कहीं कुछ फिलहाल तो नजर नहीं आता, हां कुछ ठेकेदार, अफसरों और नेताओं की मौज बहार जरूर होने जा रही है । जहां तक सडक के साथ जुड़े विकास का सवाल है, तो इसमें कोई दोराय नहीं उसके खतरे भी उतने ही बड़े हैं । उत्तराखंड में तो आल वेदर रोड़ के लिये उन तमाम खतरों को भी नजरअंदाज किया जा रहा है । हालांकि सच यह है कि उत्तराखंड के ‘विकास’ से कहीं अधिक यह परियोजना देश के सामरिक महत्व से जुड़ी है । परियोजना का नाम ‘चार धाम विकास परियोजना’ जरूर है लेकिन यह परियोजना उत्तराखंड के लिहाज से नहीं बल्कि सामरिक महत्व के लिहाज से ही अधिक महत्वपूर्ण और आवश्यक है।

उत्तराखंड के ‘विकास’ का तो मात्र बहाना है, ताकि इस पर राज्य की ओर से कोई अडंगा न लगे । इस परियोजना के तहत भारत सरकार की योजना संभवत: चीन व अंतर्राष्ट्रीय सीमा तक बारह महीने आवागमन सुगम बनाने की भी है । ऐसे में सिर्फ यह कह देना भर कि उत्तराखंड को केंद्र ने बड़ी सौगात दी है, ठीक नहीं है। वास्तविकता यह है कि उत्तराखंड तो इसके लिये बड़ी कीमत चुका रहा है। सवाल यह है कि इतनी बडी परियोजना में उत्तराखंड को सिर्फ ‘विकास’ के नाम पर सिर्फ छला जा रहा है। किसी को अंदाजा भी है कि उत्तराखंड को इसकी कितनी बडी कीमत चुकानी पड़ेगी। योजना से प्रदेश के पांच जिले उत्तरकाशी, टिहरी, चमोली, रुद्रप्रयाग और पिथौरागढ़ सीधे तौर पर प्रभावित हो रहे हैं । परियोजना के तहत लगभग 900 किलोमीटर सड़क का विकास होना है। जिसकी जद में लगभग 400 किमी. वन क्षेत्र आ रहा है। वन भूमि के आधे से अधिक मामलों में मंजूरी भी मिल चुकी है, कई स्थानों पर सड़क को दस से पंद्रह मीटर तक चौडा किये जाने के लिये पेडों का कटान भी शुरू हो चुका है । सच यह है कि प्रकृति का जो दोहन यहां अगले दो साल में होने जा रहा है, उसकी भरपाई अगले दो सौ सालों में भी संभव नहीं है।

आश्चर्य यह है कि परियोजना को लेकर दून से दिल्ली तक पूरा सिस्टम अलर्ट पर है तो पर्यावरण के तमाम ठेकेदार, बुद्धिजीवी, पर्यावरण मित्र, वैज्ञानिक, समाजसेवी, हिमालय प्रेमी सब खामोश हैं । स्थानीय स्तर पर भी यह कोई मुद्दा नहीं है, परियोजना के लिये चुकायी जा रही बडी कीमत के एवज में उत्तराखंड के हक की बात कहीं न उठना अपने आप में चौंकाने वाला है। छोटी छोटी परियोजनाओं पर अडंगा लगाने वाली एनजीटी, केंद्रीय वन मंत्रालय और तमाम अन्य संस्थाओं को इस पर कोई आपत्ति नहीं । जबकि सच यह है कि उत्तराखंड के लिये इस परियोजना से एक अधिक महत्वपूर्ण तो वह परियोजनाएं है जो वर्षों से ‘फारेस्ट क्लियरेंस’ न होने के कारण शुरू नहीं हो पायी हैं ।

इन छोटी परियोजनाओं का दुर्भाग्य है कि यह मोदी, गडकरी या टीएसआर का ‘ड्रीम प्रोजेक्ट’ नहीं है । यह तो चंद स्थानीय लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी से जुडे ‘ड्रीम प्रोजेक्ट’ हैं, और सरकार की नजर में उनकी कोई अहमियत नहीं । इनमें कोई परियोजना कहीं सड़कों की हैं तो कोई छोटे पुल और छोटे ‘रोप वे’ की हैं । कई परियोजनाओं पर तो “फारेस्ट क्लियरेंस” एक एक दशक से लटका हुआ है। और कुछ न सही राज्य सरकार चाहती तो ‘आल वेदर’ परियोजना में क्लियरेंस के साथ लंबे समय से अटकी परियोजनाओं के लिये भी मंजूरी का दबाव बना सकती थी, लेकिन नहीं राज्य की व्यवस्था तो कटपुतली मात्र है।

बहरहाल, आज चिंताजनक यह है कि तकनीक के युग में एक सड़क के लिये इतनी बड़ी कीमत चुकायी जा रही है और इस पर चिंता सिर्फ बंद कमरों में जतायी जा रही है। यह सही है कि विकास की अपनी एक कीमत होती है, लेकिन आल वेदर रोड़ में उत्तराखंड के लिये सवाल सिर्फ विकास का नहीं बल्कि हक का भी है। अफसोस यह है कि हक का यह सवाल फिलहाल हाशिये पर है।

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