एक्सक्लूसिव खुलासा

सुपर एक्सक्लूसिव : मृत्युन्जय को जेल ! अब सचिव, अपर सचिव,और अन्य सारे अफसरों को बदलने का “खेल” !!

कुलदीप एस राणा

पर्वतजन को इस बात के संकेत मिले रहे हैं कि आयुर्वेद विवि में राजेश अदाना का एक छत्रराज बना रहे,इसके लिए सचिव व अपर सचिव  के साथ-साथ पूरे आयुष सेक्शन में ही बदलाव की तैयारी है।

 पर्वतजन संवाददाता को विश्वस्त सूत्रों के हवाले से यह सूचना प्राप्त हुई है कि हाल ही में आरएसएस के वरिष्ठ कार्यकर्ताओं का एक गुट आयुर्वेद विवि के उच्च अधिकारी के साथ राजेश अदाना के समर्थन में व अपर सचिव आयुष के पद पर चहेते अफसर की तैनाती को लेकर सूबे के मुखिया से भेंट भी कर चुका है। 
 भ्रष्टाचार पर लम्बे समय से सुर्ख़ियों में रहा उत्तराखंड आयुष शिक्षा विभाग इस बात को और अधिक पुष्ट करता है कि राज्य सरकार की भ्रष्टाचार  पर कार्यवाही मात्र चुनावी दिखावा है। हकीकत इससे कोसों दूर है। आयुर्वेदिक विवि के पूर्व कुलसचिव डॉ. मृत्युंजय मिश्रा की गिरफ़्तारी से जनता की आँख में धूल झोंकने का जो बाहरी आवरण तैयार किया गया था, एक सप्ताह बीत जाने के बाद भी अन्य अभियुक्तों का विजलेंस की पकड़ में न आने व विश्वविद्यालय से भ्रष्टाचार सम्बंधी फाइलों के गायब हो जाने से वह तार-तार होता नज़र आ रहा है। कल तक विश्वविद्यालय मृत्युंजय कुमार मिश्रा की नीतियों, आदेशों और कार्यों से त्राहिमाम था , आज वही स्थिति विश्वविद्यालय के तथाकथित प्रभारी रजिस्ट्रार राजेश अदाना के कारण बनती नज़र आ  रही है।गौरतलब है कि जब उत्तराखंड शासन स्वयं इस बात की पुष्टि कर  रहा है कि मृत्युंजय मिश्रा को अपर स्थानिक आयुक्त दिल्ली  के पद से हटाए जाने के बाद 17 अप्रैल 2018 को कुलसचिव आयुर्वेद विवि का पदभार ग्रहण करते ही राजेश अदाना का प्रभारी कुलसचिव सम्बन्धी 24 जनवरी ,2018  को जारी आदेश स्वतः ही समाप्त हो गया है तो वह किस आदेश के कुलसचिव की कुर्सी पर जमे हुए हैं।  

  भ्रष्टाचार की शिकायतों पर मृत्युंजय मिश्रा को विवि से हटाकर शासन में अटैच किये जाने के उपरांत रिक्त हुए कुलसचिव के पद पर कार्मिक विभाग द्वारा वित्त सेवा के अधिकारी मो.नासिर को कुलसचिव का अतिरिक्त प्रभार दिया जाने सम्बन्धी 7 सितंबर 2018 के आदेश इस बात को औऱ अधिक पुष्ट करता है कि राजेश अदाना अवैध रूप से कुलसचिव की कुर्सी पर जमे हुए हैं।  अब यहाँ यह सवाल उठना लाजमी है कि आखिर किसकी शह पर राजेश अदाना न सिर्फ विवि के स्वयंभू रजिस्ट्रार बने हुए हैं बल्कि विवि में नियुक्ति , खरीद , दाखिले इत्यादि सम्बन्धी आदेश भी जारी कर रहे हैं। ऐसे में विवि के कुलपति डॉ  अभिमन्यु कुमार की ख़ामोशी  राजेश अदाना के साथ उनकी  मिलीभगत की तरफ भी इशारा कर रही है।

  इन दोनों की ही मिली भगत का परिणाम है कि शासन को बिना बताये इन दोनों ने विवि में उच्च पदों पर भी अपने स्तर से नियुक्तियां कर दी थी, जिसका संज्ञान आने पर सचिव आर के सुधांशु ने बिना शासन की अनुमति के हुई इन नियुक्तियों को नियम विरुद्ध करार देते हुए निरस्त करने के आदेश जारी  कर दिए। कल तक आयुष में भ्रष्टाचार पर सहयोग को लेकर जिस अपर सचिव जी बी ओली का नाम बार बार उभर कर आता रहा था,उन्हें आयुष शिक्षा विभाग से विदा हुए काफी समय बीत चुका है। साथ ही सचिव आयुष  शिक्षा का दायित्व वरिष्ठ नौकरशाह आर के सुधांशु संभाल रहे हैं, जिनके कार्यकाल में ही मृत्युंजय मिश्रा को विजलेंस द्वारा गिरफ्तार भी किया गया है। ऐसे में अब यहां भी यह सवाल बार बार सर उठा रहा है कि आखिर वह क्या मजबूरी या दबाव है जो आयुर्वेद विवि  में राजेश अदाना के कार्यकलापों पर लगाम कसने में आर. के. सुधांशु के हाथ बांध रहा है। 

 पर्वतजन को विश्वस्त सूत्रों से यह सूचना प्राप्त हुई है कि विगत समय में जिस प्रकार सचिव आर के सुधांशु और अपर सचिव देवेंद्र पालीवाल ने आयुर्वेदिक विवि में हो रहे भ्रष्टाचार के विरुद्ध कड़ा रुख अख्तियार किया है, शासन और सरकार के उच्च अधिकारियों व मंत्रियों को यह रास नहीं आ रहा है और अब इन दोनों अधिकारियों की आयुष शिक्षा विभाग से विदाई की फाइल तैयार कर दी गयी है। सम्बंधित फाइल अब अंतिम मुहर के लिए मुख्यमंत्री कार्यालय भी पहुंच चुकी हैं। 

सनद रहे कि राजेश कुमार अदाना की विवि में नियुक्ति में प्रदेश आरएसएस के एक वरिष्ठ कार्यकर्त्ता की बड़ी भूमिका भी रही है, जिनसे करीबियों की चर्चा गाहे बगाहे राजेश अदाना अपना प्रभाव बनाने के लिए करते रहते हैं।बार-बार सचिव आयुष के आदेशों की अवहेलना करना, शासन को अँधेरे में रख विवि में नियम विरुद्ध नियुक्ति करना , कुलसचिव का प्रभार दिए जाने सम्बन्धी आदेश न होने  के बावजूद खुद को प्रभारी रजिस्ट्रार बताना, भाजपा की जीरो टोलेरेंस  सरकार की नाक के नीचे यह सब कुछ होना सूबे के मुख्यमंत्री की कार्यशैली पर भी सवाल खड़े कर रहा है।

 इतना सब होने के बावजूद यदि प्रदेश के मुखिया आयुर्वेद विवि में घट रहे घटनाक्रम पर आँख मूंदते हुए निर्णय लेते हैं तो समझा जा सकता है कि भ्रष्टाचार पर ज़ीरो टॉलरेंस मात्र एक चुनावी जुमला है जो जनता की आँख में धूल झोंकने के लिए उछाला जाता है।

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