राजनीति सियासत

कमीशनखोर हैं सरकार के विधायक ! अजय भट्ट का विवादित बयान।

 देहरादून–उत्तराखंड के विधायकों पर भाजपा अध्यक्ष अजय भट्ट का सनसनीखेज बयान
 विधायकों का वेतन दोगुना से भी अधिक किए जाने के सवाल पर सरकार का बचाव करते-करते भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट अपनी रौ में यह भी कह गए कि विधायकों की दलाली रोकने के लिए बढ़ाई गई सैलरी।विधायक पैसों की कमी पूरा करने के लिए करते थे कमिशनखोरी।
पैसों की कमी पूरी करने के लिए इधर-उधर मुँह मारते थे विधायक। कभी इधर से कमीशन लेते है कभी उधर से कमिशन लेते है। इसलिए सरकार ने बढ़ायी है विधायकों की सैलरी।
अब सवाल यह है कि प्रचंड बहुमत की सरकार में 57 विधायक तो भाजपा के ही थे तो उनमें से किन किन विधायकों के खिलाफ कमीशन लेने का आरोप था ! और यदि सरकार के पास कोई ऐसे सबूत है कि किसी विधायक ने विधायक निधि में कमीशन लिया है तो उनके खिलाफ सरकार ने क्या कार्यवाही की ?
 सरकार समय-समय पर लोकायुक्त की नियुक्ति न करने को लेकर अपना बचाव यह कहते हुए करती है कि जब भ्रष्टाचार ही नहीं होगा तो लोकायुक्त की जरूरत ही क्या है ! ऐसे में दूसरा सवाल उठता है कि विधायकों के कमीशन लेने से रोकने का क्या यही तरीका सरकार के पास बचा था कि उनकी सैलरी दोगुने से भी ज्यादा कर दी जाए ! यदि यह बढ़ा हुआ वेतन ही कमीशन रोकने की गारंटी है तो सरकार यह योजना और किन किन विभागों के लिए लागू कर रही है ! और यदि इसके बाद भी कमीशनखोरी नहीं रुकी तो सरकार क्या एक्शन लेगी  !
इधर सरकार में शिक्षा मंत्री अरविंद पांडे ने बिल्कुल इसके उलट बयान दिया है। अरविंद पांडे ने कहा कि विधायक निधि तो खत्म हो ही जानी चाहिए बल्कि विधायकों को वेतन भी नहीं दिया जाना चाहिए। जिनके अंदर सेवा भाव हो, केवल उन्हें ही राजनीति में आना चाहिए।
बड़ा सवाल यह नहीं है कि विधायकों की सैलरी दोगुनी कर दी अथवा विधायक कमीशनखोरी करते हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि विधायक गण अपनी विधायक निधि सालों साल खर्च नहीं करते और उसे बूथ निधि की तरह कार्यकर्ताओं में बंदरबांट कर लेते हैं।
अजय भट्ट के इस बयान पर लोग चुटकी लेते हुए कह रहे हैं कि अजय भट्ट तो खुद भी विधायक रहे हैं और मंत्री भी। वह शायद अपने अनुभव से ऐसा कह रहे हैं क्योंकि तब विधायकों का वेेेतन वाकई बहुत कम हुआ करता था।
पिछली सरकार में वित्त विभाग ने एक शासनादेश किया था कि यदि कोई विधायक मौजूदा वित्तीय  सत्र में अपनी विधायक निधि खर्च नहीं कर पाता है तो उसकी विधायक निधि का मात्र 20% धन की अगले वित्तीय वर्ष में जुड़ सकेगा।शेष विधायक निधि लैप्स हो जाएगी।
 यदि सरकार इस शासनादेश को पुनर्जीवित कर देती है तो राज्य की जनता के लिए विधायकों की वेतन वृद्धि या कमीशनखोरी कोई मुद्दा नहीं रह जाएगा। यदि कमीशनखोरी मुद्दा होती तो कमीशनखोर विधायक बार-बार नहीं जीतते।विपक्षी पार्टी कांग्रेस के मात्र 11 विधायक ही सदन में है।ऐसे में अजय भट्ट का यह कमीशनखोरी वाला आरोप सीधे-सीधे सरकार में शामिल 57 विधानसभा क्षेत्रों को भी आरोपों के घेरे में लेता है। बड़ा सवाल यह है कि क्या करोड़पति विधायकों को वाकई पैसेे की इतनी कमी हो गई है! क्या वह विधायक  कमीशनखोरी के लिए बनते हैं अथवा सेवा भाव के कारण !
 देखना यह है कि भाजपा अथवा विपक्षी कांग्रेस के विधायक अजय भट्ट के इस बयान को किस रूप में लेते हैं। बहरहाल अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में अजय भट्ट ने विपक्षी पार्टी कांग्रेस पर जमकर निशाने लगाए।
भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष श्री अजय भट्ट ने कहा कि उत्तराखंड में भाजपा सरकार द्वारा भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ चलाए जा रहे अभियान व कांग्रेस के समय की अव्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए उठाए जा रहे क़दमों से कांग्रेस नेता बौखला गए हैं और वे अनर्गल बयान दे रहे हैं।
     श्री अजय भट्ट ने कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष द्वारा दिए गए बयान पर टिप्पणी करते हुए यह बात कही। श्री भट्ट ने कहा कि कांग्रेस शासन के समय राज्य में सर्वत्र भ्रष्टाचार था। अब भ्रष्टाचार पर नकेल कसी जा रही है। इसके दायरे में कांग्रेस के नेता भी आ रहे हैं। इससे कांग्रेस नेता सकते में हैं।उन्होंने कहा कि एन एच 7 घोटाले में एस आइ टी की जाँच निष्पक्ष रूप में आगे बढ़ रही है। मामले खुलते देख कांग्रेस नेता चिन्ता में पड़ गए है। यदि कांग्रेस नेता ईमानदार हैं तो उन्हें जाँच में सहयोग देना चाहिए। लेकिन वे जनता का ध्यान बाटने के लिये अनर्गल बाते कर रहे हैं।
   उन्होंने कहा कि सहकारिता के मामले में कांग्रेस के समय हुए बड़े घपले सामने आ रहे हैं। अब जब राज्य सरकार नियमों के तहत कार्यवाही कर रही है तो कांग्रेस नेता परेशान हैं। कांग्रेस के समय सहकारिता को भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ा दिया गया था। किंतु अब उसे गर्त से बाहर निकाला जा रहा है। लोकायुक्त के मामले में भी कांग्रेस का दोहरा चरित्र सामने आ रहा है।
               प्रदेश में लोकायुक्त के बारे  में श्री भट्ट ने कहा कि आज यदि उत्तराखण्ड में लोकायुक्त नहीं है तो उसके लिए कांग्रेस ज़िम्मेदार है। उन्होंने कहा कि राज्य में जनरल बी सी खण्डूरी के मुख्यमंत्री काल में 2011 में लोकायुक्त अधिनियम पारित होने के साथ उस पर 2013 में राष्ट्रपति जी की स्वीकृति भी मिल गई थी। लेकिन कांग्रेस ने सत्ता में आने  बाद 2014 में लोकायुक्त अधिनियम समाप्त कर दिया और फिर ख़ुद ऐसी व्यवस्था की कि लोकायुक्त का गठन ही नहीं हो पाया। भाजपा सरकार आने पर जो बिल सदन में लाया गया वह अब सदन की सम्पत्ति है और कार्यमंत्रणा समिति के सुपुर्द है जिसमें कांग्रेस के प्रदेश के बड़े नेता हैं।
        श्री भट्ट ने आरोप लगाया कि कांग्रेस के नेता नहीं चाहते कि लोकायुक्त बिल पास हो।  कांग्रेस   से सवाल  कि उन्होंने  एक बार भी मंत्रणा समिति में यह  उठाई।  सच यह है कि मंत्रणा समिति में कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष नेता प्रतिपक्ष  पूर्व विधानसभा अध्यक्ष कुछ बोलते नहीं लेकिन बाहर शोर करते हैं।
    श्री भट्ट ने कहा कि जहाँ तक शराब व खनन माफ़िया का सवाल है तो कांग्रेस सरकार के समय ये माफ़िया ही सरकार की नीतियाँ तय करते थे। इसका नतीजा यह रहा की माफ़िया मालामाल होते गए और सरकार का राजस्व गिरता गया। राजस्व गिरने कीबात कैग की रिपोर्ट से भी सामने आई है। जबकि वर्तमान में भाजपा सरकार पूरी पारदर्शिता से काम हो रहा है व माफ़िया राज समाप्त हो चुका है ।
   उन्होंने कांग्रेस नेताओं को सलाह दी कि वे कोई आरोप लगाने से पहले अपनी गिरेवान में झाँक लिया करें तो बेहतर होगा।

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