धर्म - संस्कृति

जोशीमठ मे भी छठ की छटा

क्रांति भट्ट 

पहाड़ ने ” झट ” से अपने घर , गांव , तीज त्यौहार बिसार दिये और ” छठ ” पहाड़ पर गया ।
भगवान सूर्य की पत्नी ऊषा जिन्हे बिहार , पूर्वी उत्तर प्रदेश समेत भारत अन्य क्षेत्रों में ” छटी ” मैय्या भी कहते हैं । इसकी” छटा “पहाड़ के नगरों , शहरों , कस्बों , बाजारों मे भी दिख रही है । मजदूरी , स्वर्ण कार्य ( सुनार कार्य ) समेत विभिन्न कार्यों से जुडे बिहार , पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोग ” छट मैय्या ” का जो त्यौहार मना रहे हैं वह बरबस ध्यान आकृष्ट अपनी ओर आकृष्ट कर रहा है।

छोटे ,बडे , मजूर , गरीब , गुरूबा जिस श्रद्धा , आस्था से पहाड की कुड़कुडाती ठंड मे भी अपनी मिट्टी से , संस्कृति से , विरासत से जुडे इस पर्व को उल्लास से मना रहें हैं वह बताता है कि भले ही रोजी , रोटी के लिये घर , गांव , राज्य “छूटा “। पर इन लोगों का अपनी मिट्टी से , संस्कृति से , तीज त्यौहार से ” रिश्ता नहीं छूटा “।
पहाड में इस समय कुडकुडाती ठंड है। कितना है छट के प्रति ” छट मैय्या ” के अर्चकों का लगाव कहें ,श्रद्धा कहें या अपनी मिट्टी की सौंधी खुशबू से उपजी श्रद्धा ।एक उदाहरण देखने को मिला। जोशीमठ में इस समय कडाके की ठंड है। नगर में कोई तालाब , नदी , पोखर नजदीक नहीं है। यहां बिहार , पूर्वी उत्तर प्रदेश क्षेत्रों के लोग भी हैं। कुछ मजूरी करते हैं। कुछ सुनार हैं । कुछ अन्य कार्यों से जुडे हैं। संख्या भले ही कम हो। पर सब मिल कर छट का उत्सव जिसमें डूबते सूर्य को अर्घ दिया जाता है। और तालाब , नदी , पोखर के जल में खडे होकर ” अर्घ्य ” देना होता है। यहां नदी , तालाब , नजदीक न होने पर छटी मैय्या के उपासकों ने नगर के बीच बने गांधी मैदान में थोडा सा तालाब नुमा गढढा बना दिया। उसमें पानी डाला और गंगा जल की बूंदे भी डाली। प्लास्टिक की बरसाती से अंजुली भर तालाब को बांधा। और घुटने भर न सही , आधा कमर तक पानी न सही , टखने भर पानी ही सही , इसमें खडे होकर छठ मनाया।
गोपेश्वर में भी। बैतरणी कुंड में लोग जमा हुये और पूजा की।
इधर पहाड़ में अपने तीज त्यौहार कितनी जल्दी बिसार दिये जा रहे हैं। दुनिया में फूलों का उत्सव , फूल देई संग्रान जिसे फूल जैसे सुकुमार बच्चे मनाते हैं अब धीरे धीरे धीरे हासिये पर सरक रहा है। बहुत से तीज त्यौहार जाने कहां हर्च रहे हैं। खो से जा रहे हैं । पहाड से। हाथ के रूमाल की तरह झट से हाथ से छूट रहे हैं। हमारे कितने प्रवासी हैं जिन्हे वहां पर अपने मुलुक के ऐसे तीज त्यौहार याद आते हैं कितनों की आंख डबडबा जाती हैं जब दादी नानी की पीठ पर झूलकर ” घुघूती बसूती , क्य खांदी . दुध भात की मीठी लोरी याद आती है। प्रवास की बात क्या हम तो अपने घर में रह कर अपनी बूढी मय्या को गांव में अकेला छोड़ गये। और जो मिट्टी , मां , बिरासत , संस्कृति , भाषा , बोली , तीज त्यौहार नही भूले वे लोग भले ही रोटी के लिये परदेस में हैं पर जमीन से छूटे नहीं।
(फोटो साभार जोशीमठ के गांधी मैदान में छठ पर्व )

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