राजकाज राजनीति

काश,दून को दस साल का हिसाब दे पाते मेयर..

काश,शहर को दस साल का हिसाब दे पाते चमोली..

योगेश भट्ट 

प्रदेश के तमाम निकायों के साथ ही देहरादून नगर निगम का कार्यकाल भी खत्म हो चुका है । अब शहर को नए ‘सफेदपोश’ का इंतजार है । काश, सालों साल तक शहर की सत्ता में काबिज ‘सफेदपोश’ शहर को हिसाब दे पाते । इस बार तो पूरे दस साल का हिसाब मांग रहा है यह शहर । क्योंकि सत्ता के लिहाज से दस साल कम नहीं होते, न शहर के लिये और न सत्ता में काबिज शख्सियत के लिए । शहर और शख्सियत दोनों का आंकलन किया जाए तो दस साल में शख्सियतें आगे निकलती चली गयीं और शहर पीछे छूटता चला गया । निवर्तमान मेयर विनोद चमोली को ही लें, लगातार दस साल तक मेयर रहते हुए उनका अपना सियासी कद बढ़ा । बीते एक साल से तो वह मेयर के साथ ही शहर की एक सीट से विधायक भी बन गए। लेकिन दस साल के बड़े कार्यकाल की उपलब्धियों को लेकर वह कटघरे में हैं । सवाल यह है कि क्या वह शहर की जरूरतों और अपेक्षाओं पर खरा उतर पाए ? शायद नहीं , चमोली दबंग नेता जरूर रहे लेकिन चर्चा में काम को लेकर नही विवादों को लेकर । कभी सरकार से टकराव तो कभी अफसरों से अनबन । कभी पार्षदों से तो कभी अपनी ही पार्टी से जुबानी जंग । कभी घपले घोटाले तो कभी आफ द रिकार्ड किस्से । रहा सवाल शहर का तो हाल यह है कि, दस लाख से अधिक आबादी वाला शहर पार्क के नाम पर सिर्फ एक गांधी पार्क पर निर्भर है । देहरादून नगर निगम शहर में एक नया पार्क तक विकसित नहीं कर पाया । दुखद यह है कि बच्चा पार्क के नाम पर भी इसी पार्क का ‘गला’ काट लिया गया। कहने को निगम के स्कूल भी हैं और अस्पताल भी, लेकिन सब बदहाल । क्या बीते सालों में एक आदर्श स्कूल और एक आदर्श अस्पताल स्थापित नहीं किया जा सकता था । ऐसा नहीं है कि यह संभव नहीं था, लेकिन हकीकत यह है कि इस दिशा में न सोचा गया और न पहल ही हुई। निगम के कर्ताधर्ताओं की प्राथमिकता में कभी शहर रहा ही नहीं । अच्छी खासी जगहों पर नगर निगम की संपत्तियां या तो निष्प्रोज्य पड़ी हैं या फिर कब्जे का शिकार हैं । शहर में कहीं होटल व स्कूल वालों ने तो कहीं बिल्डरों ने निगम की जमीनों पर कब्जा किया हुआ है, लेकिन निगम हमेशा बेपरवाह रहा है । एक टाउन हाल छोड़कर नगर निगम का कोई ऐसा स्थान या भवन नहीं जहां सार्वजनिक कार्यक्रम किया जा सके । हर इलाके में नगर निगम की संपत्ति मौजूद है, लेकिन निगम का कोई सामुदायिक भवन या मिलन केंद्र नहीं जिसका शहर के लोग इस्तेमाल कर सकें । निगम ने जो व्यवसायिक संपत्तियां तैयार की उनके हाल भी बेहाल हैं। जिस शीशमबाड़ा सोलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट को अपनी उपलब्धि बताया जा रहा है, वह सिस्टम के नकारेपन और अकर्मण्यता का उदाहरण भी है । शहर का कूड़ा निस्तारण के एकमात्र इस प्लांट को बनने में ही दस साल लगे और अभी भी इस पर हालात सामान्य नहीं हैं।


सच तो यह है कि देहरादून नगर निगम का दायरा भले ही बढ़ा हो, लेकिन निगम से अपेक्षाएं आज भी सीमित हैं । एक सुंदर दून की परिकल्पना आज भी सिर्फ इतनी ही है कि शहर साफ सुथरा,हरा भरा और नियोजित हो । साफ सड़कें हों नियमित उनकी सफाई हो । सड़कों के किनारे नालियां जरूर हो, कूड़े के निस्तारण की उचित व्यवस्था हो । शहर के अलग अलग इलाकों में छोटे छोटे पार्क हों, बच्चों के खेलने के स्थान हों, अच्छे सुसज्जित सामुदायिक भवन हों, पुस्तकालय हों, सार्वजनिक शौचालय हों । नदी नालों पर अतिक्रमण न हो, निगम की जमीन पर कब्जा न हो । शहर में छोटे छोटे व्यवस्थित बाजार हों, मंडियां हों और पार्किंग की व्यवस्था बेहतर हो ।
अफसोस निगम इन छोटी अपेक्षाओं को ही पूरा करने में नाकाम रहा है। शहर की स्वच्छता, जिसका सीधा जिम्मा नगर निगम का है उसके हाल भी किसी से छिपे नहीं है । अभी पिछले साल इन्हीं दिनों की बात है जब केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय की रिपोर्ट में देहरादून की पोल खुली । स्वच्छता सर्वेक्षण में फेल देहरादून स्वच्छता के मामले में 316 वें स्थान पर रहा । उपलब्धि यह है कि नगर निगम बनने से पहले देहरादून में मात्र 75 मलिन बस्तियां थी । आज नगर निगम में बढ़कर 150 के पार पहुंच चुकी है। बीते दस सालों में ही तकरीबन तीस बस्तियां शहर में बसी हैं।
कुल मिलाकर निगम के खाते में बीते सालों में कोई बड़ी उपलब्धि दर्ज नहीं है। हां तमाम घपले घोटालों को लेकर निगम जरूर चर्चा में रहा। बहरहाल तमाम नाकामियों के बीच हो सकता है कि विनोद चमोली के पास गिनाने के लिये बड़ी उपलब्धियां हों । मसलन वह शहर में बने और बन रहे फ्लाईओवरों को ही अपनी उपलब्धि बता दें । यह भी संभव हैं कि वह शहर के तमाम बेतरतीब चौराहों को भी अपनी उपलब्धियों की फेहरिस्त में शामिल कर दें । पंद्रह साल में बामुश्किल तैयार हुए एक मात्र सोलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट को बड़ी उपलब्धि के तौर पर सामने रखें । उपलब्धियों की फेहरिस्त के नाम पर राजनेताओं की ओर कुछ भी संभव है । वाकई अगर ऐसा है तो फिर पूरे शहर की मौजूदा बदहाली का जिम्मेदार भी पूरी तरह उन्हें ही ठहराया जाना चाहिए । जेएनएनयूआरएम योजना में शहर के लिये बेहतर योजनाएं तैयार नहीं कर पाने और एडीबी की योजनाओं को सही से धरातल पर न उतार पाने की जिम्मेदारी भी उन्हीं को लेनी चाहिए। स्मार्ट सिटी योजना में बार बार फेल होने और अभी तक योजना शुरू न होने का अपयश भी उन्ही के खाते में जाना चाहिए। हालांकि यह तर्क संगत नहीं है क्योंकि बड़ी योजनाओं का जिम्मेदार अकेले निगम को नहीं ठहराया जा सकता । जहां तक सवाल विनोद चमोली का है तो वह राज्य आंदोलन की पृष्ठभूमि से निकले राजनेता हैं इसलिये उनसे उम्मीदें और अपेक्षाएं भी अधिक हैं।लेकिन यह भी सच्चाई है कि देहरादून शहर की उम्मीदों पर वह खरा नहीं उतर पाए। दूसरे नेताओं की तरह उनकी चिंता भी शहर के बजाय सियासी गणित और वोट बैंक पर ही रही ।

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