एक्सक्लूसिव

एक्सक्लूसिव वीडियो : हाई कोर्ट के हालिया प्रतिबंध के बावजूद सीएम की विधानसभा में अवैध खनन 

भूपेंद्र कुमार 

मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत की विधानसभा डोईवाला में हाईकोर्ट के आदेश के तहत 26 अक्टूबर से खनन बंद है किंतु यहां खनन अवैध रूप से जारी है।
 पर्वतजन के पास पिछले 4 दिनों के वीडियो और अन्य स्टिल फुटेज से यह साफ पता चल जाता है कि डोईवाला में प्रतिदिन सैकड़ों ट्रैक्टर ट्रॉली अवैध खनन लगे हुए हैं।
देखिए वीडियो 
COPYRIGHTS @ PARVATJAN
 यह न सिर्फ हाईकोर्ट के आदेशों की अवमानना है, बल्कि जीरो टोलरेंस पर गंभीर सवाल खड़े करता है। गौरतलब है कि डोईवाला के एक जागरूक नागरिक विरेंद्र पेगवाल की याचिका पर हाई कोर्ट ने 26 अक्टूबर 2018 को इस क्षेत्र में खनन पर रोक लगा दी थी। साथ ही अवैध खनन होने पर जिलाधिकारी और खनन अधिकारी को दोषी माने जाने का आदेश दिया था।
 हाई कोर्ट ने जिलाधिकारी को जारी आदेश में कहा था कि रिवर बेड मैटेरियल (आरबीएम) ट्रैक्टर में नहीं ले जाया जाएगा। इस पर हाई कोर्ट ने कंपलीट बैन लगा दिया था।
हाईकोर्ट का आदेश
 साथ ही हाई कोर्ट ने आदेश दिया था कि आरबीएम ले जाने वाले ट्रैक्टर को सीज कर दिया जाए।
 गौरतलब है कि मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत की विधानसभा में 3 नदियां पड़ती है एक सुसुवा नदी है जो राजा जी पार्क से लगती हुई बहती है। इस नदी में खनन बिल्कुल प्रतिबंधित है। यहां आज तक कभी खनन लाइसेंस स्वीकृत नहीं हुआ। दूसरी नदी सौंग नदी है।। यहां पर वर्ष 1999 से खनन पर प्रतिबंध लगा हुआ है। और तीसरी नदी जाखन नदी है। इस नदी का आधा हिस्सा वन विभाग के अंतर्गत है, जिसमें वन विभाग बिल्कुल नियम कायदों के अनुसार कंट्रोल्ड खनन कराता है और आधा हिस्सा सामाजिक क्षेत्र का है इस पर खनन प्रतिबंधित है।
एसडीएम ने स्वीकार किया अवैध खनन
एसडीएम डोईवाला कुसुम चौहान ने 26 नवंबर को एक पत्र के माध्यम से तहसीलदार से लेकर रेंजर और पुलिस अधिकारियों को कहा कि न्यायालय की अवमानना हो सकती है यदि अवैध खनन न रोका गया। साथ ही एसडीएम ने भी इस बात के प्रति पत्र में भी खेद जताया है कि एसडीएम को संबंधित तहसीलदार वन विभाग के कर्मचारी अधिकारी और पुलिस के कर्मचारी अधिकारी कोई तवज्जो नहीं देते हैं।
 हकीकत यह है कि इन तीनों नदियों में दिन रात निर्बाध गति से अवैध खनन हो रहा है। प्रतिबंधित सुसुवा नदी को तो खनन माफिया ने इतना गहरा खोद दिया है कि नदी के तल से भी नीचे की मिट्टी आजकल खोदी ही जा रही है।
 इस क्षेत्र में खनन कराने के पीछे सीधे-सीधे राजनीतिक संरक्षण तो है ही, इसके अलावा डोईवाला की उपजिलाधिकारी कुसुम चौहान और कोतवाल ओमबीर रावत भी इसके लिए सीधे-सीधे जिम्मेदार हैं। इन दोनों अधिकारियों का अवैध खनन को सीधा संरक्षण है। इसके बावजूद यह दोनों अधिकारी लंबे समय से मुख्यमंत्री की विधानसभा में ही टिके हुए हैं। सवाल उठता है कि आखिर यह किस राजनीतिक संरक्षण के तहत यहां पर टिके हुए हैं।
 दूसरा सवाल यह है कि हाई कोर्ट के जस्टिस राजीव शर्मा और जस्टिस मनोज कुमार तिवारी ने अपने आदेश मे 26 तारीख अक्टूबर को इस क्षेत्र में खनन पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया था, तो एक माह तक डोईवाला प्रशासन ने किस आधार पर यह आदेश दबाए रखा !
 इसके अलावा पिछले 4 दिन की वीडियो और अन्य फुटेज साफ बताते हैं कि ट्रैक्टर ट्रॉलियों में इन प्रतिबंधित नदियों से दिन भर अवैध खनन हो रहा है।
एक और गौर करने वाली बात यह है कि जब इस क्षेत्र की 3 नदियों में से दो नदियों पर खनन पूरी तरह से प्रतिबंधित है तो फिर इन नदियों के किनारे भंडारण की अकेले डोईवाला में 100 से अधिक लाइसेंस आखिर क्यों दिए गए हैं ! तथा 50 के लगभग क्रेसर किस उद्देश्य से लगाए गए हैं !
 जाहिर है कि इन सभी भंडारण और क्रेशर प्लांट में नदियों से अवैध खनन करके सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है। मजेदार बात यह भी है कि यह भंडारण के लाइसेंस और क्रेशर प्लांट के लाइसेंस भाजपा से जुड़े लोगों के भी नहीं है। जाहिर है कि यह लाइसेंस मोटा पैसा खर्च करके लिए गए हैं।
 इससे भाजपा तथा उसके अनुषांगिक संगठनों की डोईवाला इकाई में भी काफी नाराजगी है।
छह माह पहले मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के ओएसडी धीरेंद्र सिंह पवार ने मुख्यमंत्री की विधानसभा में खनन कार्य में लगे ट्रैक्टरों के संबंध में एक आदेश जारी कराया था कि एग्रीकल्चर में रजिस्ट्रेशन किए हुए ट्रैक्टर भी खनन सामग्री ढो सकते हैं हालांकि बाद में बवाल होने पर वन निगम ने अपना यह आदेश वापस ले लिया था। हाई कोर्ट के ताजा आदेश और धीरेंद्र सिंह पंवार के पुराने आदेश से समझा जा सकता है कि अवैध खनन को सरकार का कितना अधिक संरक्षण प्राप्त है।
स्थानीय समाजसेवी वीरेंद्र सिंह पेगवाल कहते हैं कि वह जल्दी ही अवैध खनन और इससे हो रही हाई कोर्ट की अवमानना के खिलाफ फिर से न्यायालय की शरण लेने वाले हैं।
 इससे एक सवाल और खड़ा होता है कि जब जीरो टोलरेंस की सरकार में मुख्यमंत्री की विधानसभा में ही अवैध और अनैतिक कार्यों के खिलाफ आम आदमी को हाई कोर्ट की शरण लेनी पड़ रही है तो फिर यह कैसा जीरो टोलरेंस है !

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