पहाड़ों की हकीकत

लिवाड़ी-फिताड़ी पहुंचे जिलाधिकारी तो खुली विकास योजनाओं की पोल

नीरज ‘उत्तराखंडी
आजादी के बाद पहली बार जिला अधिकारी हिमाचल प्रदेश की सीमा से लगे मोरी ब्लाक के सीमांत गाँव  फिताड़ी और लिवाड़ी पहुँचे तो सरकारी योजनाओं की सारी पोल खुल गई । सीमांत वासियों ने समस्याओं की झड़ी  लगा दी। सीमांत गाँवों में  स्वास्थ्य तथा शिक्षा व्यवस्था बदहाल पड़ी है। वहीं सरकारी योजनाएं गाँव तक नहीं पहुँच पा रही है।
डेढ़ सौ के पास नही शौचालय
आलम यह है कि 6 माह से खाद्यान्न नहीं पहुँचा है और न ही गैस कनेक्शन ही मिल पाये है। यहाँ उज्वला योजना का  गृहणियों को कोई लाभ नहीं मिल पाया है। न सौभाग्य योजना का सौभाग्य मिल पाया है। ग्रामीणों को बिजली के संयोजन नहीं  मिल पाये हैं।
कहने को तो वर्ष 2016 को जिला शौच मुक्त घोषित कर दिया गया है लेकिन धरातलीय हकीकत यह है कि यहां 146परिवारों के पास शौचालय नहीं है। कागजों में  ही शौचालय का निर्माण किया है ।
लिवाड़ी में निवास कर रहे 150 परिवारों के लिए पेयजल की कोई व्यवस्था नहीं है। ग्रामीण प्राकृतिक जल स्रोत से पानी ढोने को मजबूर हैं।
यूपी के टाइम का अस्पताल बंद
सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों की लापरवाही का आलम यह है कि जिला अधिकारी के पहुँचने के बाद भी लिवाड़ी ऐलोपैथिक अस्पताल के ताले नहीं खुले।
गौरतलब है कि रंवाई के विकास पुरुष और तत्कालीन पर्वतीय विकास मंत्री स्वर्गीय बरफिया जुवांठा ने लिवाड़ी में 6 बैड का एलोपैथिक अस्पताल खोला था।लेकिन अस्पताल शोपीस  बनकर रह गया है।
 दुखद बात तो यह है कि जब जिला अधिकारी अधिकारियों की फौज के साथ लिवाड़ी पहुँचे उस दिन भी अस्पताल में लटका ताला नहीं  खुला। हालांकि  स्वास्थ्य विभाग का वहाँ कोई भवन नहीं है लेकिन अस्पताल स्थानीय ग्रामीण के निजी भवन के 4 कमरों में  900 रूपये वार्षिक किराये पर कागजों में ही  संचालित किया जा रहा है। स्वास्थ्य सेवाओं का इससे बुरा हाल क्या हो सकता है जब यहां प्रसूता महिलाओं को भी पोषाहार नहीं मिल रहा है।
 वहीं समाज कल्याण विभाग की जन कल्याणकारी योजनाओं की पोल भी खुल गई, जब  95 वर्षीय किताबी देवी,75 वर्षीय मजूरी तथा 74 वर्ष के ठाकुर सिंह पेंशन मंजूर न  होने की जिले के मुखिया से शिकायत की। ये पेंशन की राह देख रहे हैं।
खुले आसमान तले पढाई: बेपटरी शिक्षा
सीमांत गाँव लिवाड़ी में शिक्षा व्यवस्था पटरी से उतर चुकी है।आलम यह है कि जूनियर हाई स्कूल विगत 15 वर्षो से एक अध्यापक के भरोसे चल रहा है।
वर्तमान समय में यहाँ 52 छात्र छात्राएँ अध्ययनरत हैं। सभी कक्षाएं एक साथ विद्यालय भवन के अभाव में खुले में  संचालित की जा रही हैं। विद्यालय भवन विगत 5 वर्षों से  निर्माणाधीन है। विद्यालय में सहायक अध्यापक के 4 पद स्वीकृत हैं, जिनमें  से तीन पद खाली हैं।
यही स्थिति राजकीय  प्राथमिक विद्यालय लिवाड़ी की है। विद्यालय भवन जीर्ण-शीर्ण हालत में हैं। फ़र्श में गड्ढे बने हैं तो खिड़की से पल्ले गायब हैं। टीन की छतों में बड़े-बड़े छेद हैं।रसोई की विद्यालय के अतिरिक्त कक्ष में व्यवस्था की गई हैं । पेयजल की कोई व्यवस्था नहीं हैं। जिससे शिक्षा की स्थिति का अनुमान लगाया जा सकता है ।जूनियर  हाई स्कूल का विद्यालय का भवन विगत 5वर्षो से निर्माणाधीन है। कक्षाएं खुले आसमान के नीचे संचालित की जा रही है। जिससे बरसात तथा बर्फबारी में  शिक्षण कार्य प्रभावित होता है।
यही हाल राजकीय प्राथमिक विद्यालय खोसा लिवाडी का है। विद्यालय भवन जीर्ण-शीर्ण हालत में है विद्यालय की छतों से पानी टपकता है। रसोई घर में पानी का रिसाव होता है। मौसम खराब होने पर शिक्षकों के छुट्टी करने के सिवाय कोई विकल्प नहीं है। यहां वर्तमान समय में 53 विद्यार्थी पढ़ रहे हैं। यहाँ एक सहायक तथा एक शिक्षा मित्र कार्यरत हैं।अब आप समझ गए होंगे कि सुविधाओं के अभाव में कुछ यूँ जूझ रहे हैं सीमांतवासी।
सीमांत गाँव फिताड़ी भी बदहाल
सीमांत गाँव फिताडी में भी शिक्षा व्यवस्था बदहाल पड़ी है। यहाँ राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय में वर्तमान समय में 84 विद्यार्थी पढ़ रहे हैं ।
यहां शिक्षकों के 5पद स्वीकृत हैं, जिनमें 3 पद खाली चल रहे हैं। यहाँ प्रधानाध्यापक सहित विज्ञान गणित तथा हिन्दी विषयों के पद रिक्त चल रहे हैं। तथा राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय भवन के अभाव में जूनियर स्कूल के भवन में  संचालित किया जा रहा है ।विद्यालय का रमसा के तहत उच्चीकरण तो किया गया है लेकिन न तो ढांचा गत सुविधा का  विकास किया गया न ही पर्याप्त  शिक्षकों की व्यवस्था  ही की गई है।
वर्तमान समय में यहाँ 38 छात्र छात्राएं अध्ययन कर रहे हैं। यहाँ शिक्षकों के 6 पद स्वीकृत है जिनमें से तीन पद पर शिक्षक तैनात है जबकि 3 पद खाली  चल रहे  हैं। यहां भी प्रधानाध्यापक सहित विज्ञान तथा  अंग्रेजी विषयों के पद रिक्त है। प्रयोगशाला तथा कार्यालय सहायकों सहित चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के पद रिक्त चल रहे हैं।
ऐसे में सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि सीमांत गाँवों में शिक्षा व्यवस्था किस दौर से गुजर  रही है। निरीक्षण के दौरान जब जिला अधिकारी ने छात्रों  से अंग्रेजी में एनवायरमेंट पर्यावरण  की स्पेलिंग पूछी तो कोई भी छात्र नहीं  बता पाये। जब अंग्रेजी के शिक्षक ही नहीं होंगे तो पढायेगा कौन?सीमांत गाँव के ग्रामीणों के शैक्षिक भविष्य के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है।

1 Comment

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  • Bus naitagri bhut hai whan pr jo humaisa bjat hajam kr jaatai hai.
    Mulbhut subidano sai kya lana daina en logo ko kud to gaon mai rhaina nhe hai…Sab bolai kai barosai hai ji

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