एक्सक्लूसिव

एक्सक्लूसिव : समाचार प्लस के स्टिंग से मीडिया पर भी सवाल !

….खतरे में तो ‘मीडिया’ है जनाब

योगेश भट्ट 

कभी सोचा है कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने के बावजूद अपना देश ‘प्रेस की आजादी’ की रैंकिंग में लगातार नीचे क्यों जा रहा है ? जरा गौर कीजिए विश्व के 180 देशों की रैंकिंग में हम वर्ष 2017 में ‘लुढ़क’ कर 136वें स्थान पर थे और अब 138वें स्थान पर आ गए हैं । आखिर क्यों ? क्या वाकई देश में मीडिया की ‘आजादी’ बड़े खतरे में है । यकीन मानिए ऐसा नहीं है, यह सच है कि अपने देश के संविधान में प्रेस की आजादी व सुरक्षा के लिए कोई अलग से विशेष प्राविधान नहीं है। बल्कि संविधान के अनुच्छेद 19 (2) के तहत तो विवेकपूर्ण प्रतिबंध का सहारा लेकर अभिव्यक्ति की आजादी को रोका भी जा सकता है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि भारत में मीडिया और पत्रकारों पर सरकार की ओर से किसी तरह की कोई सेंसरशिप नहीं है। यहां अभिव्यक्ति की आजादी से जुड़े कानून हैं लेकिन बेहद उदार, जिनका इस्तेमाल भी यदाकदा ही होता है। सरकार मीडिया पर प्रतिबंध संबंधी कोई भी कानून बनाने से बचती है। आज भी यहां सरकारें मीडिया को ‘डराने’ से ज्यादा ‘खरीदने’ में यकीन रखती है। हालात अभी दूसरे देशों की जितने बुरे भी नहीं हैं कि सच लिखा, बोला या दिखाया न जा सके। अगर सच लिखा, बोला या दिखाया नहीं जा रहा है तो वह कोई ‘डर’ नहीं ‘स्वेच्छा’ है। दरअसल सच्चाई यह है कि मीडिया ‘अराजकता’ का शिकार है, ‘खोखला’ हो चला है, दिनोंदिन वह ‘कुरूप’ होता जा रहा है । मीडिया का ‘चेहरा’ आज वो पत्रकार या मीडिया संस्थान नहीं हैं जो पेशेवर ईमानदारी और प्रतिबद्धता के साथ काम कर रहे हैं। मीडिया का चेहरा तो उमेश जे कुमार जैसे ‘शख्स’ बन बैठे हैं जो, पत्रकारिता को ढाल बनाकर ‘पावर ब्रोकर’ बने हैं। जिनके लिए पेशागत नैतिकता, मानदंड और आदर्श कोई मायने नहीं रखते। सही मायनों में देखा जाए तो ‘मीडिया की आजादी’ नहीं आज ‘मीडिया’ खतरे में है।  और मीडिया को यह खतरा सरकारों से नहीं बल्कि उन ‘ताकतों’ से है जो पत्रकारिता की आड़ में ‘पावर ब्रोकर’ बनना चाहते हैं, ज्यादा से ज्यादा दौलत कमाना चाहते हैं और अपने हितों के लिए सरकारों को बनाने बिगाड़ने का ‘खेल’ खेलना चाहते हैं । मीडिया को बड़ा खतरा उन ‘अंदरूनी ताकतों’ से है जो पेशे की नैतिकता के खिलाफ गतिविधियों में संलिप्त हैं ।
अब बात निकली है तो दूर तक जाएगी, हाल फिलहाल चर्चा में चल रहे उमेश जे कुमार को ही लें । सिस्टम के ‘व्यभिचार’ और ‘भ्रष्टाचार’ ने मीडिया का जो नया ‘चेहरा’ तैयार किया है, उमेश जे कुमार उसका ‘प्रतीक’ है । उमेश मीडिया का एक ऐसा नाम है जो राजनेताओं, नौकरशाहों और सेलिब्रेटियों से गहरे रिश्तों और उनके स्टिंग कराने के लिए कुख्यात है । जिसके लिए पत्रकारिता के मायने ‘सरोकार’ नहीं सिर्फ ‘सरकार’ है, सरकार के स्टिंग करना और उसे अपने ‘जाल’ में फंसा कर रखना जिसकी काबलियत है। इन दिनों यह ‘स्टिंग किंग’ उमेश जे कुमार उत्तराखंड में सलाखों के पीछे है। उत्तराखंड सरकार को उमेश पर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ के लिए मजबूर होना पड़ा है। चर्चा है कि उमेश जे कुमार हर बार की तरह मौजूदा सरकार के भी कुछ अधिकारियों और सीएम के करीबियों के स्टिंग करा चुका था। बात और आगे बढ़ती इससे पहले ‘सरकार’ ने इस बार आक्रामक रुख अपनाते हुए उमेश जे कुमार को शिकंजे में ले लिया है।  लेकिन वही हो रहा है जिसका अंदेशा था, सरकार की उमेश पर यह ‘सख्ती’ सरकार से जुड़े लोगों को ही रास नहीं आ रही है। तमाम सफेदपोशों, नौकरशाहों, पुलिस अफसरों और कारोबारियों की नींद उड़ी है। सवाल उमेश जे कुमार पर नहीं बल्कि उल्टा ‘सरकार’ पर उठ रहे हैं। मीडिया की ‘आजादी’ की दुहाई देते हुए सत्ता के गलियारों से लेकर न्यायालय तक पैरोकारी होने लगी है। उमेश जे कुमार के पक्ष में ‘माहौल’ तैयार किया जाने लगा है।
मीडिया के वजूद के ‘असल’ सवाल यहीं से उठते है, सवाल यह है कि स्टिंग आपरेशनों के जरिए सिस्टम को अपनी अंगुली पर नचाने वाले उमेश जे कुमार और पत्रकारिता के मूल धर्म से समझौता न करने वाले पत्रकार में फर्क क्यों नहीं किया जाता ? क्यों हमारे राजनेताओं, अफसरों और समाज के ठेकेदारों की नजर में उमेश जे कुमार ‘बड़ा पत्रकार’ हो जाता है ? क्यों रातों रात वह नियम कानून से ऊपर उठ जाता है ? क्या सिर्फ इसलिए कि वह नैतकिता को ताक पर रख उनके काले कारनामों ‘भ्रष्टाचार’ और ‘व्यभिचार’ में शामिल होता है ? क्या इसलिए कि वह सही, गलत और आदर्शों की बात नहीं करता ? या इसलिए कि वह उन्हें ‘इस्तेमाल’ भी करता है और खुद ‘इस्तेमाल’ भी होता है ?
उमेश जे कुमार को लेकर आज बहुत लोग फिक्रमंद हैं, पता है क्यों ? क्योंकि उन्हें मीडिया में अपने ‘नंगे’ दिखने का डर है। अफसोस यह है कि यही ‘फिक्र’ और ‘डर’ उमेश जे कुमार की ताकत बनी हुई है, जबकि यह ‘खौफ’ उमेश का नहीं मीडिया का होना चाहिए, एक ‘आम पत्रकार’ का होना चाहिए । लेकिन यह इसलिए संभव नहीं है कि एक ‘आम पत्रकार’ पेशागत मर्यादा और नैतिकता से बंधा है। उसकी अपनी एक आचारसंहिता है, एक ‘लक्ष्मण रेखा’ है। दुर्भाग्य देखिये, उमेश पर शिकंजा कसा जाता है तो सरकार के अंदर से ही सरकार के ‘एक्शन’ पर सवाल उठने लगते हैं। कहा जा रहा है कि सरकार का ‘केस’ कमजोर है, सरकार ‘डरी’ हुई है। हो सकता है कि यह सही हो, ‘कुछ’ छिपाने की कोशिश में सरकार मजबूत ‘केस’ नहीं बना पायी हो। लेकिन सवाल सिर्फ ‘सरकार’ के ‘डर’ का ही क्यों, सरकारें तो पहले भी ‘भ्रष्ट’ थी और आज भी ‘दूध की धूली’ नहीं है। सवाल तो ‘सरकार’ और ‘पत्रकार’ नाम की दोनों अलग अलग संस्थाओं के नैतिक पतन का है। सवाल आज अगर सरकार के ‘साफ्ट टारगेट’ बनने पर है तो सवाल उमेश के ‘मंसूबों’ पर भी है। अगर छह महीने पहले सरकार के किसी अफसर का स्टिंग कराने में कामयाबी हासिल की तो आज तक उसे छिपा कर क्यों रखा गया ? क्यों उस स्टिंग को जनता के सामने नहीं रखा गया ? इसका जवाब भी मिलना चाहिए।
उमेश के लिए यह कोई पहला मौका नहीं है, अब तो कई नए उमेश पैदा होने के लिए तैयार हैँ। जग जाहिर है कि उमेश उत्तराखंड के ‘भ्रष्टाचारी’, ‘व्यभिचारी’ नेताओं और अफसरों की ‘कमजोर नब्ज’ दबाकर सरकारों से ‘खेलता’ रहा है। इसी ‘खेल’ से डेढ़ दशक में उसने अपना साम्राज्य खड़ा किया है। सवाल यह है कि उमेश जे कुमार जो करता रहा है, क्या वाकई वह पत्रकारिता है ? पत्रकारिता के मूल सिद्धांत क्या इसकी इजाजत देते हैं ? अगर नहीं, तो फिर पेशे की नैतिकता के खिलाफ होने वाली गतिविधियों के विरुद्ध मीडिया के अंदर से ही आवाज क्यों नहीं उठती ? यही बात आज रह रहकर खटकती है। खतरनाक यह है कि उमेश जे कुमार सरीखे पावर ब्रोकर मीडिया में नयी पीढ़ी के लिए ‘रोल माडल’ बनते जा रहे हैं। जल्द से जल्द पैसा, रुतबा, शोहरत, ग्लैमर हासिल करने के लिए उमेश जे कुमार को आदर्श मानते हुए उसके ‘नक्शे कदम’ पर चलने लगे हैं। खोजी पत्रकारिता के नाम पर ‘स्टिंग आपरेशन’ और फिर ‘ब्लैकमेलिंग’ का सिलसिला आम बात हो गयी है। यही कारण है कि सरकार से भी बड़ा सवाल आज मीडिया की ‘विश्वसनीयता’ को बचाने का है। क्योंकि माहौल कितना ही खराब क्यों न हो गया हो लेकिन इस तथ्य से मुंह नहीं फेरा जा सकता कि जब कहीं न्याय नहीं मिलता तब जनता ही नहीं देश के न्यायाधीशों तक को भी मीडिया में उम्मीद नजर आती है।
सरकारें तो आएंगी जाएंगी, हो सकता है आने वाले वक्त में ऐसी सरकारें आएं जिन्हें ‘स्टिंग’ की परवाह न हो । जो नैतिक रूप से इतनी मजबूत हो कि उनके लिए स्टिंग आपरेशन को कोई मायने ही न हों। लेकिन चिंता मीडिया के भविष्य और ‘नैतिक पतन’ की है। सोचनीय पहलू यह है कि नैतिकता के खिलाफ होने वाली गतिविधियों पर प्रतिक्रिया क्यों नहीं होती ? मीडिया के अंदर से ही प्रतिकार क्यों नहीं होता। जरूरी नहीं कि जो गलतियां पहले होती रही हैं किसी अनजाने ‘डर’ के चलते उन्हें दोहराया जाता रहे। जरूरत है कि सरकार और मीडिया दोनो के स्तर पर उच्च मानक और मापदंड स्थापित किये जाएं। सरकार को चाहिए कि ‘जनपक्षीय’ पत्रकारिता और ‘डंकमार’ पत्रकारिता में अंतर स्पष्ट करे। मीडिया संस्थान, पत्रकार और पत्रकारों से जुड़ी जो संस्थाएं ‘खामोश’ हैं ,उन्हें खामोशी तोड़नी चाहिए। खुलकर आगे आकर सवाल खड़े करने चाहिए। सनद रहे मीडिया का भविष्य बचाना है तो ‘भूल सुधार’ करनी ही होगी। क्योंकि लाख कोई कहे कि पत्रकारिता आज व्यवसाय है लेकिन सच यही है कि पत्रकारिता एक ‘मिशन’ है और मिशन ही रहेगी। व्यवसाय वह तब ही बनती है जब इसका इस्तेमाल ‘व्यक्तिगत’ हित साधने के लिए होता है ।

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