राजनीति सियासत

बागी नेताओं की तीसरे मोर्चे की तैयारी।छेड़ा क्षेत्रीय राग  

भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के बागी तथा असंतुष्ट नेताओं ने आज ऋषिकेश के एक होटल में आयोजित बैठक में क्षेत्रीय मुद्दों के आधार पर तीसरा मोर्चा बनाने पर विचार विमर्श किया।
 यह सब वही नेता हैं, जिन्हें पिछले विधानसभा चुनाव में किसी न किसी कारण से पार्टी ने टिकट नहीं दिया और उनमें से अधिकांश या तो निर्दलीय चुनाव मैदान में उतर गए थे अथवा किसी न किसी कारण से नाराज थे  विधानसभा चुनाव के बाद से इन असंतुष्ट नेताओं में से अधिकांश नेता अपने संपर्कों की बदौलत पार्टी में वापस आने की जुगत में लगे रहे।
भाजपा अध्यक्ष का धर्म संकट 
 कुछ समय पहले भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने सभी असंतुष्टों को साथ लेकर चलने की बात कहते हुए उनके मन में घर वापसी की लौ जगा दी थी, लेकिन उत्तराखंड में भाजपा के जिन नेताओं को इन असंतुष्ट नेताओं के बागी होने से नुकसान हुआ, वे किसी भी कीमत पर इनकी घर वापसी कराने को तैयार नहीं हैं।
 उदाहरण के तौर पर भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट रानीखेत में प्रमोद नैनवाल के बागी चुनाव लड़ने के कारण रानीखेत विधानसभा से चुनाव हार गए थे। अब उनके सामने सबसे बड़ा संकट यह है कि आखिर वह उनको कैसे पार्टी में ले आएं जिनके कारण वह चुनाव हारे थे !
कांग्रेस के नेताओं की नाराजगी 
 इसी तरह से कांग्रेस में भी प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह ने असंतुष्टों के लिए घर वापसी के दरवाजे खोल दिए हैं। लेकिन कांग्रेस में जो नेता इन असंतुष्टों के कारण चुनाव हारे हैं, वह इनकी घर वापसी से बिल्कुल भी खुश नहीं हैं।
 उदाहरण के तौर पर नैनीताल में हेम आर्य की घर वापसी से सरिता आर्य बेहद खफा हैं तो टिहरी से शूरवीर सिंह सजवाण की घर वापसी से मंत्री प्रसाद नैथानी बिल्कुल भी खुश नहीं हैं।
 वही आर्येंद्र शर्मा को लेकर किशोर उपाध्याय ने ताल ठोक रखी है। साथ ही टिहरी से चुनाव लड़ने वाले दिनेश धनै भी कांग्रेस में शामिल होना चाहते हैं, जबकि किशोर उपाध्याय उन्हें शामिल कराने के बिल्कुल भी पक्ष में नहीं हैं।
 भाजपा के राष्ट्रीय संगठन तथा उत्तराखंड में 11 विधायकों पर सिमट चुकी कांग्रेस का प्रदेश संगठन असंतुष्टों को साथ में लेकर आने वाले निकाय तथा लोकसभा चुनाव की तैयारी करना चाहता है।
 लेकिन भाजपा तथा कांग्रेस के जिन नेताओं को इन बागियों ने नुकसान पहुंचाया, वह इन की राह में सबसे बड़ा रोड़ा बने हुए हैं।
ये नाराज नेता रहे मौजूद
बहरहाल ऋषिकेश के होटल में पूर्व कैबिनेट मंत्री दिनेश धनै, पूर्व विधायक नरेंद्र नगर ओम गोपाल रावत, रुड़की के पूर्व विधायक सुरेश चंद्र जैन, रानीखेत से डॉक्टर प्रमोद नैनवाल, ऋषिकेश से संदीप गुप्ता, कांग्रेस के सहसपुर से आर्येंद्र शर्मा, रायपुर विधानसभा से महेंद्र प्रताप नेगी, उत्तरकाशी से सूरत राम नौटियाल, मसूरी से राजकुमार जायसवाल, चौबट्टाखाल से कविंद्र ईस्टवाल तथा भाजपा के पूर्व जिलाध्यक्ष गोविंद अग्रवाल, ज्योति सजवाण सरीखे के 150 नेताओं का जमावड़ा ऋषिकेश में हुआ।
ये नही आए लेकिन समर्थन 
 मार्ग खराब होने के कारण इस बैठक में पूर्व विधायक आशा नौटियाल तथा श्रीनगर के पूर्व विधायक बृजमोहन कोटवाल नहीं पहुंच पाए। काशीपुर के पूर्व विधायक तबीयत खराब होने के कारण नहीं पहुंच पाए। साथ ही बैठक में आए लोगों ने बताया कि पूर्व भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष डॉक्टर अंतरिक्ष सैनी भी किसी कारणवश नहीं पहुंच पाए लेकिन उन्होंने बैठक को अपना समर्थन व्यक्त किया है।
यह है रणनीति 
 बैठक में इन असंतुष्ट नेताओं ने इस बात की संभावनाएं टटोली कि यदि कोई क्षेत्रीय मोर्चा बनता है तो किन मुद्दों को लेकर जनता के बीच चुनाव में लेकर जाना ठीक रहेगा।
 सभी इस बात पर एकजुट थे कि इस बात को मुद्दा बनाया जाएगा कि कांग्रेस तथा भाजपा दिल्ली से संचालित होने वाले दल हैं इसलिए यह लोग उत्तराखंड की समस्याओं को मुद्दे की तरह इस्तेमाल करेंगे तथा यह बात जनता के सामने रखेंगे कि प्रदेश में पलायन, बेरोजगारी और आपदा जैसी समस्याएं विकराल रुप से हैं लेकिन कांग्रेस और भाजपा दिल्ली से संचालित होने के कारण इन मुद्दों के प्रति गंभीर नहीं हैं।
 असंतुष्ट नेताओं ने अपना संगठन बढ़ाने के लिए प्रदेश के विभिन्न राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों तथा बुद्धिजीवी वर्ग के साथ-साथ स्वतंत्र विचारकों को अपनी टीम में जोड़ने पर भी विचार विमर्श किया।
ये तो वापसी कर चुके
 देखना यह है कि लोकसभा चुनाव आते-आते अपने इन नाराज नेताओं के प्रति भाजपा का कांग्रेस का क्या रुख रहता है !
 असंतुष्ट नेताओं की यह अब तक की चौथी बैठक थी यहां पर यह भी गौरतलब है कि असंतुष्ट नेताओं की दूसरी बैठक शामिल रहने वाले हेमा आर्य तथा राजेश्वर प्रसाद पैन्यूली कांग्रेस में शामिल हो चुके हैं।
और आखिरकार
 देखना यह है कि लोकसभा चुनाव तक कितने लोग इस संगठन में टिके रहते हैं। हालांकि इन असंतुष्ट नेताओं की फिलहाल प्राथमिकता पुरानी पार्टियों में जाने की ही है किंतु यदि वाकई यह असंतुष्ट नेता तीसरा मोर्चा बनाने में कामयाब रहते हैं तो इसमें कोई दो राय नहीं कि इनका अपने-अपने क्षेत्र में व्यापक जनाधार है और क्षेत्रीय मुद्दों को लेकर जनता में जाने पर यह लोग गेमचेंजर भी साबित हो सकते हैं।

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