एक्सक्लूसिव खुलासा

बड़ा सबूतःशराब माफिया की गोद मे सरकार

सरकार ने उत्तराखंड की डिपार्टमेंटल स्टोर से शराब की दुकानों को बंद करने का इंतजाम कर दिया है। 20 मार्च को सरकार ने आबकारी नीति में एक संशोधन किया। संशोधन के अनुसार उन्हीं डिपार्टमेंटल स्टोर में शराब की दुकानों का नवीनीकरण किया जाएगा, जिनमें शराब के अलावा अन्य सामानों की बिक्री का टर्नओवर पांच करोड़ से अधिक होगा। डिपार्टमेंटल स्टोर के मालिक वर्ष 2018-19 के लिए सरकार के खाते में फरवरी माह में ही बाकायदा शुल्क और चालान जमा करके अगले वर्ष के लाइसेंस का नवीनीकरण करा चुके हैं।यही नही वे अप्रैल माह के लिए पांच -दस लाख का शराब का एडवांस कोटा भी खरीद कर रख चुके हैं। इसके अतिरिक्त 30 से 50 लाख तक का माल उनकी दुकान पर अभी भी रखा हुआ है।
 हरिद्वार में UK वाइन डिपार्टमेंटल स्टोर के मालिक हिमांशु गुप्ता का कहना है कि डिपार्टमेंटल स्टोर से सरकार को कुल 10 करोड रुपए का अधिकार प्राप्त होता है और इन स्टोर में  लगभग डेढ़ सौ स्थानीय लोग काम कर रहे हैं सरकार के इस कदम से राजस्व का नुकसान तो होगा ही लोग भी बेरोजगार हो जाएंगे। गुप्ता कहते हैं कि कुछ समय पहले ही उन्हें लाइसेंस मिला है और  स्टोर के मालिक कौन है।  दुकान के इंटीरियर पर भी पांच-दस लाख रुपए खर्च किया है। ऐसे में इस नियम से उनको काफी नुकसान हो जाएगा।
 अचानक 20 मार्च को पांच करोड़ वाली शर्त जोड़े जाने से डिपार्टमेंटल स्टोर के मालिक हैरान परेशान हैं कि इतना टर्नओवर तो उत्तराखंड में किसी भी डिपार्टमेंटल स्टोर का नहीं है! ऐसे में वह अनबिकी और एडवांस में खरीदी गई शराब का क्या करेंगे ! रामनगर स्थित “सेवन इलेेेवन” डिपार्टमेंटल स्टोर के मालिक पवन कपूर कहते हैं कि विभाग ने यह पूरा खेल सिर्फ एक व्यक्ति को फायदा पहुंचाने के लिए  खेला है। संभवत: इससे  मंत्री और  सचिव अनजान हैं।
 बड़ा सवाल है कि सरकार जब पहले ही लाइसेंस का नवीनीकरण शुल्क जमा करा चुकी है तो बाद में इस तरह की बेतुकी शर्त जोड़ने का क्या मतलब है ?
 पैसा जमा कर चुके यह लोग अब हाइकोर्ट जाने की तैयारी कर रहे हैं। यदि ऐसा हुआ तो सरकार को बैकफुट पर आना पड़ेगा।
 पर्वतजन के सूत्रों के अनुसार आबकारी कमिश्नर से लेकर आबकारी सचिव भी इस नई शर्त को लेकर अब हैरानी जता रहे हैं और मान रहे हैं कि यह गलत हुआ है।
अभी तक की पड़ताल में प्रथम दृष्टया इस पूरे मामले के लिए आबकारी विभाग के जॉइंट कमिश्नर टी के पंत पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

 सवाल है कि इस तरह की शर्तें बनाने के पीछे कौन मास्टरमाइंड है। अब इन्होंने किसके दबाव में अथवा किस लालच में यह बदलाव किया ! यह गंभीर जांच का विषय है। पंत का कहना है कि यह नीति शासन द्वारा बनाई गई है और  उन्हें किसी भी प्रकार की आपत्ति अभी तक प्राप्त नहीं हुई है।

उदाहरण के तौर पर पर्वतजन ने राजपुर रोड पर स्थित वत्सल स्टोर से जानना चाहा तो पता चला कि इस के मालिक इंदीवर सरल ने अगले वर्ष के लिए नवीनीकरण का शुल्क ₹दो लाख 27 फरवरी को बाकायदा चालान के माध्यम से राजकोष में जमा करा दिया था और एडवांस में शराब का कोटा भी खरीद लिया था। अब अचानक से 4 दिन पहले 20 मार्च को टर्नओवर वाली शर्त जुड़ने के बाद से वह काफी परेशान हैं।

आज और कल शनिवार और इतवार की छुट्टी है। 28 मार्च को हाईकोर्ट में वकीलों के चुनाव हैं। 29-30-31 को छुट्टी है। अर्थात हाईकोर्ट में सरकार के फैसले को चुनौती देने के लिए डिपार्टमेंटल स्टोर के मालिकों के पास भी मात्र सोमवार और मंगलवार का समय है। सोमवार का दिन यदि तैयारियों में निकला तो मंगलवार को कोर्ट इस मामले को किस नजरिए से देखता है, इस पर सारा दारोमदार टिका है।
 सरकार को ऐसा करने की जरूरत क्यों पड़ी ! आइए इसको समझने का प्रयास करते हैं –
 उत्तराखंड में 12 डिपार्टमेंटल स्टोर हैं, जिनमें समुद्र आयातित विदेशी शराब मिलती है। डिपार्टमेंटल स्टोर में मिलने वाली शराब की सभी बोतल लगभग बारह सौ से अधिक कीमत की होती हैं। जाहिर है कि समाज में  ₹3000 में शराब की बोतल खरीदने की क्षमता रखने वाला व्यक्ति ठेके पर खड़े होकर खिड़की में हाथ डालकर शराब खरीदना पसंद नहीं करेगा। कुछ महिलाएं भी होती हैं, जो शराब की दुकानों पर यूं लाइन पर लगना और सेल्समैन की बेरुखी के साथ 100 ₹50 अधिक कीमत पर शराब खरीदना पसंद नहीं करती। डिपार्टमेंटल स्टोर में एयर कंडीशन माहौल में तसल्ली से अलग-अलग ब्रांड की शराब को देखने-परखने के बाद खरीदने की सुविधा होती है। इसलिए वह डिपार्टमेंटल स्टोर का रुख करता है।
 इस तरह की शराब की दुकानें शॉपिंग मॉल में भी स्वीकृत की गई हैं। उत्तराखंड में इस तरह के 5 मॉल हैं। मॉल में जो दुकानें होती हैं, उनके लिए कोई भी नियम नहीं बदला गया है।  एक आम आदमी भी समझ सकता है कि एक डिपार्टमेंटल स्टोर एक ही व्यक्ति का होता है जबकि एक मॉल में हर दुकान  एक अलग व्यक्ति की होती है।
 पहला सवाल यह है कि अगर डिपार्टमेंटल स्टोर के मालिक के लिए शराब की दुकान चलाने की शर्त उसका 5 करोड रुपए का टर्नओवर है तो जो व्यक्ति मॉल में शराब की दुकान चला रहा है, उसके लिए ऐसी कोई शर्त क्यों नहीं ?
 दूसरा सवाल यह है  कि सरकार को टर्नओवर की शर्त जोड़ने से क्या फायदा है ?
 सिक्योरिटी के तौर पर शराब की दुकानों से 2 महीने का अधिभार एडवांस में कैश और बैंक गारंटी के रूप में जमा करा दिया जाता है तो फिर साफ है कि टर्नओवर की शर्त अनावश्यक रूप से डिपार्टमेंटल स्टोर को शराब के धंधे से बाहर करने की साजिश है।
 यदि डिपार्टमेंटल स्टोर बंद हो जाएंगे तो इसका फायदा दो क्षेत्रों को मिलेगा या तो लोग मॉल में खुली हुई इन दुकानों से शराब खरीदेंगे या फिर ठेकों पर जाकर। यदि हम यह सोचें कि डिपार्टमेंटल स्टोर में महंगे ब्रांड की शराब बिकने से ठेकों की कमाई पर असर पड़ने के कारण सरकार ने यह निर्णय लिया है तो फिर-
 तीसरा सवाल खड़ा होता है कि सरकार यह नीति भी बना सकती थी कि एक डिपार्टमेंटल स्टोर की दूरी शराब के ठेके से कितनी दूरी पर होनी चाहिए और यदि यह कारण मान लिया जाए तो फिर राजपुर रोड पर पार्श्वनाथ मॉल में खुली शराब की दुकान के ठीक सामने एक और शराब का ठेका सड़क पर क्यों स्वीकृत किया गया है ? अकेले देहरादून में तीन डिपार्टमेंटल स्टोर हैं जबकि 428 शराब की दुकानें हैं और यदि इस तर्क को मान भी लिया जाए तो दो- ढाई हजार रुपए की शराब पीने वाले लोग ही कितने हैं जो ठेकों पर इसका असर पड़ जाए ! और फिर सरकार ठेकों के मुकाबले डिपार्टमेंटल स्टोर से अधिक अधिभार भी तो ले रही है।
  चौथा सवाल खड़ा होता है कि क्या इसका फायदा मॉल वालों को पहुंचाने का इरादा सरकार अपने मन में पाले हुए है ?
शक की सुई सरकार के इसी इरादे पर घूमती है। उत्तराखंड में 5 शॉपिंग मॉल मे ये शराब की दुकानें है और इनमे से चार शॉपिंग मॉल में एक ही व्यक्ति की दुकानें आवंटित हैं। यह व्यक्ति है सरोज मल्होत्रा।
  आबकारी पॉलिसी के अंतर्गत एक व्यक्ति के नाम एक ही दुकान आवंटित होती है। यहां तक कि एक नाम से दो पर्चियां भी नहीं डाली जा सकती। तो फिर कहीं डिपार्टमेंटल स्टोर को बंद करके सिर्फ मॉल में शराब बिकवा कर किसी व्यक्ति को फायदा पहुंचाने के लिए तो यह सब नहीं हो रहा ?
 पांचवा सवाल है कि आखिर एक व्यक्ति के नाम पर ही चार मॉल में शराब की दुकानें क्यों आवंटित हैं ? आखिर सरकार ने इस मॉल मालिक से कितने टर्नओवर की शर्त रखी है ?
 अगर यह नियम विरुद्ध है तो इस नियम विरुद्ध आवंटन के खिलाफ सरकार ने कोई कार्यवाही अब तक क्यों नहीं की ? क्या सरकार सिर्फ एक व्यक्ति को फायदा पहुंचाने के लिए जीरो टॉलरेंस की धज्जियां उड़ा रही है?
 सरकार जीरो टॉलरेंस की बात करती है, पलायन रोकने और रोजगार बढ़ाने की बात करती है । लेकिन यहां तो देहरादून से ही इनके लिए पलायन करने की नौबत आ गई है। देहरादून के घंटाघर स्थित डिपार्टमेंटल स्टोर के मालिक संजय मल्होत्रा कहते हैं कि  टर्नओवर की शर्त  सीधे-सीधे  प्रदीप मल्होत्रा को फायदा पहुंचाने के लिए ही जोड़ी गई है क्योंकि उन्हीं के पास 5 में से 4 मॉल के लाइसेंस है।
57 विधायकों के प्रचंड बहुमत और मृत विपक्ष के अहंकार में सरकार चाहे जो मर्जी निर्णय ले लेकिन एक तथ्य यह भी है कि कर्नाटक में डिपार्टमेंटल स्टोर में टर्न ओवर की कोई शर्त नहीं है। चंडीगढ़ जैसे ए क्लास सिटी में भी डिपार्टमेंटल स्टोर के लिए एक करोड़ का टर्नओवर की शर्त है जबकि पर्यटन प्रदेश गोवा में कोई शर्त ही नहीं है। वहां पान की दुकान से भी शराब खरीदी जा सकती है तो फिर इस तरह की बेतुकी शर्त से सरकार और शासन में बैठे कुछ नेताओं और अफसरों की जेब भले ही भर जाए लेकिन डिपार्टमेंटल स्टोर से प्राप्त होने वाले राजस्व से सरकार जरूर हाथ धो बैठेगी। देखना यह है कि इस नुकसान को सरकार कैसे टोलरेट कर पाती है !

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