एक्सक्लूसिव

दोनों अध्यक्षों की पद और प्रतिष्ठा दांव पर

उत्तराखंड के लोकसभा चुनाव के दृष्टिकोण से पहली बार भाजपा और कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष लोकसभा चुनाव लड़े। दोनों ही अध्यक्षों कांग्रेस के प्रीतम सिंह और भाजपा के अजय भट्ट का यह पहला लोकसभा चुनाव रहा। मजेदार बात यह रही कि दोनों ही अध्यक्ष अपनी सीट से बाहर शेष प्रत्याशियों के प्रचार-प्रसार के लिए निकलने की हिम्मत नहीं जुटा पाए।
अजय भट्ट 2017 के विधानसभा चुनाव में प्रचंड मोदी लहर के बावजूद रानीखेत सीट से विधानसभा चुनाव जीतने में नाकामयाब रहे तो मोदी लहर के बावजूद कांग्रेस के प्रीतम सिंह अपनी सीट बचाने में कामयाब रहे। अजय भट्ट नैनीताल से हरीश रावत के खिलाफ तो प्रीतम सिंह टिहरी से राज्यलक्ष्मी शाह के खिलाफ पहली बार मैदान में उतरे। मोदी के चेहरे पर लड़े गए इस चुनाव में भाजपा के शेष प्रत्याशियों की भांति अजय भट्ट को यकीन है कि मोदी लहर उनकी नैय्या पार लगा देगी, तो प्रीतम सिंह को यकीन है कि वे मोदी लहर को ध्वस्त करते हुए संसद जरूर पहुंचेंगे।
टिहरी उत्तरकाशी और देहरादून के नौकरशाहों का मानना है कि प्रीतम सिंह मात्र चार विधानसभा सीटों पर बढ़त हासिल कर सकते हैं, शेष पर भाजपा बढ़त बनाएगी। नैनीताल लोकसभा सीट के बारे में अनुमान लगाया जा रहा है कि हरीश रावत ने अजय भट्ट को कड़ी टक्कर दी है। दोनों पार्टी अध्यक्षों के नेतृत्व में यह पहला लोकसभा चुनाव लड़ा गया है। यदि प्रीतम सिंह अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाए तो उनके लिए संघर्ष बढ़ जाएगा और यदि वे खुद की सीट जीतने में भी नाकामयाब रहे तो उन पर चकराता का अध्यक्ष वाला लेबल और मजबूती से चिपक जाएगा।
अजय भट्ट के लिए तो यह चुनाव जीवन-मरण का सवाल है। हार के बाद अजय भट्ट के लिए सबसे दुखदायी बात यह होगी कि अध्यक्ष के रूप में वे बोनस के दिन गिन रहे हैं। इसलिए सिर्फ जीत ही उनका आगे का रास्ता मजबूत कर सकती है।

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