राजनीति

एक्सक्लूसिव: अपनों के लिए की गई घोषणा से मुकरे मुख्यमंत्री

इस वर्ष 25 जून को आपातकाल की बरसी पर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा देहरादून आए और उन्होंने आपातकाल को याद करते हुए कांग्रेस पर लोकतंत्र की हत्या का आरोप लगाया। जेपी नड्डा के साथ उस वक्त कार्यक्रम में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत और तमाम मंत्री, विधायक और संगठन के लोग भी मौजूद थे। जेपी नड्डा ने अपने भाषण में बताया कि किस प्रकार आपातकाल के दौरान भारतीय जनता पार्टी के लोगों को चुन-चुनकर मीसा के तहत जेलों में डाला गया। जेपी नड्डा भाषण देकर वापस चले गए, लेकिन आपातकाल के दौरान भाजपाइयों पर हुए अत्याचार जैसा ही भाषण पिछले वर्ष देहरादून में आयोजित कार्यक्रम में मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने भी दिया था। विगत वर्ष आपातकाल की बरसी पर आयोजित कार्यक्रम में आपातकाल के बहाने कांग्रेस को घेरने और भाजपाइयों को सहलाने की त्रिवेंद्र रावत की नीति का कुछ दिन बाद खुलासा भी हो गया। उस दिन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने तब के मीसा बंदियों को न सिर्फ अपने हाथ से मालाएं पहनाकर व शॉल ओढ़ाकर सम्मानित भी किया, बल्कि घोषणा भी की कि उनकी सरकार बहुत जल्द ही मीसा बंदियों को 16 हजार रुपए प्रतिमाह पेंशन देगी।

मुख्यमंत्री के बयान के एक साल तक कार्यवाही नहीं हुई, जबकि मीसा के तहत भारतीय जनता पार्टी के तमाम बड़े नेताओं में पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी लंबे समय तक जेल में रहे थे। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत द्वारा मीसा बंदियों को पेंशन देने की घोषणा पर उस दौर में जेल में बंद रहे और पिछले कार्यक्रम में शामिल रहे श्रीमधुकांत प्रेमी पुत्र स्व. श्री सुगनचन्द पीठ बाजार ज्वालापुर हरिद्वार ने सूचना के अधिकार के अंतर्गत मुख्यमंत्री के घोषणा की जानकारी मांगी। उन्हें आश्चर्य हुआ कि मुख्यमंत्री कार्यालय ने ऐसी किसी घोषणा से ही इंकार कर दिया।
भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश महामंत्री नरेश बंसल कहते हैं कि उस दिन मुख्यमंत्री ने मीसा बंदियों को पेंशन देने की घोषणा की थी और उत्तराखंड के सभी मीसा बंदियों को पेंशन देने का वायदा भी किया था, किंतु उन्हें नहीं मालूम कि मुख्यमंत्री की यह घोषणा अभी तक धरातल पर क्यों नहीं उतरी। बंसल का कहना है कि इस बारे में पार्टी संगठन में भी चर्चा हुई है कि आखिरकार मीसा बंदियों को पेंशन देने संबंधी उनकी सूचीबद्धता का काम अभी तक क्यों नहीं हुआ है।
देखना है कि ढीली-ढाली यह सरकार अपनी कही बात को कब धरातल पर उतारती है?

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