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आसमान से गिरे, खजूर में अटके

१६ वर्षों से भूमि मिलने के बावजूद भूमिधरी का अधिकार न मिलने के कारण ऋषिकेश के पशुलोक में टिहरी बांध विस्थापित भी क्रमिक अनशन पर हैं।

योगेश डिमरी/ऋषिकेश

मुख्यमंत्री हरीश रावत ने मालिकाना हक से वंचित विस्थापितों को भूमिधरी का अधिकार देने के लिए एक महीने का समय तय किया है। १५ दिन में कानूनी राय व वन विभाग द्वारा डिनोटिफकेशन जारी किया जाएगा। उसके अगले १५ दिनों में राजस्व विभाग इसे राजस्व ग्राम घोषित करने की कार्यवाही शुरू कर देगा, किंतु सुस्त ब्यूरोक्रेसी के कारण फिर से इस मामले के लटकने की अधिक संभावना है।
विगत एक वर्ष से टिहरी आंशिक डूब क्षेत्र के नंदगांव के ग्रामीण धरना-प्रदर्शन व भूख हड़ताल जारी रखे हुए हैं। सरकार द्वारा लगातार मिले झूठे आश्वासनों के कारण ग्रामीणों ने कई बार भूख हड़ताल खत्म की, किंतु सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी।
विस्थापन के नियम अनुसार इन लोगों को इनके भवन का भुगतान व अन्यत्र भूमि दी जानी थी, किंतु भवन के ६० प्रतिशत से लेकर ८० प्रतिशत तक के भुगतान के बावजूद आज तक इन्हें भूमि मुहैया नहीं कराई गई। भवन का जो प्रतिकर इन लोगों को मिला, वो इन्होंने भूमि पाने के लिए धरने-प्रदर्शन व भूख हड़ताल से लेकर तमाम कोशिशों पर खर्च कर दिया है। जिन लोगों के पास कुछ धनराशि बची भी है, ऐसे लोग यह नहीं सोच पा रहे कि वो अगर भवन बनाना भी चाहें तो कहां बनाएं।
नई टिहरी जिला मुख्यालय पर धरना-प्रदर्शन कर रहे इन लोगों की स्थिति आज आसमान से गिरकर खजूर में लटकने वाली हो गई है।
नहीं मिला भूमिधरी अधिकार
टिहरी बांध विस्थापितों के साथ अन्याय का यह अकेला मामला नहीं है। एक ओर बांध प्रभावित भूमि पाने के लिए संघर्षरत हैं तो वहीं दूसरी ओर विगत १६ वर्षों से भूमि मिलने के बावजूद भूमिधरी का अधिकार न मिलने के कारण ऋषिकेश के पशुलोक में टिहरी बांध विस्थापित भी क्रमिक अनशन पर हैं।
२००९ में हरीश रावत को सांसद के साथ-साथ केंद्रीय मंत्री बनने का भी सौभाग्य प्राप्त हुआ। तब वोट मांगते वक्त हरीश रावत ने कहा था कि चुनाव जीतकर सबसे पहले वे बांध विस्थापितों को भूमिधरी का अधिकार दिलाएंगे। २०१४ में जब हरीश रावत की पत्नी हरिद्वार लोकसभा से कांग्रेस प्रत्याशी बनी तो उन्होंने भी विस्थापितों के साथ यही वायदा किया था।
रमेश पोखरियाल निशंक सांसद बने, प्रेमचंद्र अग्रवाल दो बार विधायक बने, किंतु आज तक ऋषिकेश के पशुलोक क्षेत्र के विस्थापितों को १६ वर्ष पहले उन्हें आवंटित भूमि का भूमिधरी अधिकारी नहीं मिल सका है।
विगत एक माह से विस्थापित लगातार क्रमिक अनशन पर बैठे हैं, किंतु उनकी समस्या का अभी तक कोई समाधान नहीं हो पाया है।
२०१७ के टिकट के दावेदार जरूर एक बार फिर इन प्रदर्शनकारियों पर डोरे डालने लगे हैं कि यदि इस बार उन्हें जिता दिया तो वे भूमिधरी का अधिकार निश्चित रूप से दिला देंगे।
गौरतलब है कि इस क्षेत्र की ७० प्रतिशत भूमि बेच दी गई है। आने वाले वक्त में यह खरीद-फरोख्त किसी बड़ी मारकाट में तब्दील हो जाए तो आश्चर्य नहीं होगा।
इस वजह से इनके यहां न ग्राम पंचायत, न ब्लॉक स्तर और न ही जिला पंचायत स्तर के चुनाव होते हैं। बिना प्रधान के यहां मनरेगा जैसी रोजगारपरक केंद्रीय योजना का लाभ नहीं मिल पा रहा है। ग्राम पंचायत न होने से यहां के निवासी मूल निवास, जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र आदि के लिए दर-दर भटकने और धरना प्रदर्शन करने को मजबूर हैं।

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