पहाड़ों की हकीकत

पढि़ए, गोमती घाटी के ग्रामीणों ने इस पुल के लिए क्यों लगाई प्रधानमंत्री से गुहार!

डा. रमेश बिष्ट

बागेश्वर। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत वर्षों पहले निर्मित मोटरमार्ग में आज तक पुल का निर्माण न होने पर थक हारकर गौमती घाटी के ग्रामीणों ने अंतत: प्रधानमंत्री कार्यालय में गुहार लगाई है। पीएमओ से तुरंत ग्रामीणों के पत्र को आवश्यक कार्यवाही हेतु मुख्य सचिव उत्तराखंड सरकार को भेजा गया, लेकिन दो माह का समय हो गया, अभी तक उत्तराखंड सरकार के स्तर से कार्यवाही के नाम पर केवल खानापूर्ति नजर आ रही है।


जिला बागेश्वर के तहसील गरुड़ के अंतर्गत ग्रामसभा सिमखेत के लिए आठ साल पहले पीएमजीएसवाई के तहत सड़क का निर्माण किया गया, किंतु इसके मध्य पड़ने वाली गौमती नदी में आज तक पुल का निर्माण नहीं हो सका। जिस कारण करोड़ों की लागत से बने इस मोटरमार्ग के लाभ से क्षेत्रीय जनता महरूम है। पुल न होने से लाभ तो दूर, सड़क की हालत बद से बदतर हो कच्चे रास्ते में तब्दील हो चुकी है। 2010 में पीएमजीएसवाइ सिंचाई खण्ड बागेश्वर द्वारा ‘कन्धार-रौल्याना मोटरमार्ग के किमी. एक से सिमखेत के लिए इस सड़क का निर्माण किया गया। मध्य में पडऩे वाली गोमती नदी के दोनों ओर 104.29 लाख रुपए खर्च कर विभाग ने 2013-14 में डामरीकरण भी कर दिया। कैसा कार्य हुआ होगा, वह यहां स्पष्ट देखा जा सकता है। पांच साल के अनुरक्षण कार्य मद में 14.29 लाख की लागत है। अब निविदा के मानकों के तहत कार्यदायी संस्था ठेकेदार की सड़क निर्माण के बाद पांच साल की अनुरक्षण (मेन्टेनेन्स) की जिम्मेदारी का समय भी समाप्त होने को है। ऐसे निर्माण से मात्र किस-किस का हित हुआ होगा, समझा जा सकता है। स्थानीय लोग जान जोखिम में डालकर नदी के रास्ते आवाजाही करने को मजबूर हैं, जो कभी भी बड़ी दुर्घटना का कारण बन सकता है। खासकर बरसात में गौमती नदी का बहाव बहुत तेज रहता है।
इस पुल के लिए जनता संबंधित विभाग से लेकर सरकार व जनप्रतिनिधियों के द्वार खटखटा चुकी है। जनप्रतिनिधियों को तो गौमती घाटी केवल चुनाव के समय वोट बैंक के लिए याद रहती है, विकास के लिए नहीं।


अधिशासी अभियंता पीएमजीएसवाई सिंचाई खण्ड बागेश्वर से ज्ञात हुआ कि रु. 307.25 लाख की डीपीआर बहुत पहले यूआरआरडीए को भेजा जा चुका है, लेकिन भारत सरकार स्तर पर निर्मित प्रपोजल मोड्यूल में उक्त मोटर मार्ग का नाम ही प्रदर्शित नहीं हो रहा है। यहकारण तकनीकी हो या मानवीय, है तो घोर लापरवाही ही। जिस वजह से डीपीआर डाटा प्रपोजल माड्यूल में प्रविष्ट नहीं हो सका और अब तक 307.25 लाख का स्टील गर्डर सेतु हवा में लटका है। डबल इंजन सरकार के डिजिटल संसार के आकाश में डीपीआर कहीं खो गई है।
इतनी बड़ी चूक या लापरवाही किस स्तर पर और कैसे हुई, कौन इसके लिए जिम्मेदार हैं? क्या जिम्मेदार लोगों पर कोई कार्यवाही होगी अनेक प्रश्न हैं, जिनका जबाब देने को कोई तैयार नहीं। इस खामी को लेकर केवल कागजी घोड़े दौडाए जा रहे हैं। जनता को हमेशा की तरह मात्र आश्वासनों की घुट्टी पिलाई जा रही हैं। फिलहाल पुल का मामला सूचना एवं कार्यवाही के नाम पर डिजिटल इंडिया में एक आफिस से दूसरे आफिस में कागजों में ही घूम रहा है।


यहां यह भी उल्लेखनीय है कि जब तक यह डिजिटल आकाश व कागजों से धरातल पर पहुंचेगा, तब तक सारे निर्माण सामानों के दाम बढ़ चुके होंगे, फिर पुल की निर्माण लागत भी बढऩी स्वाभाविक है। ऐसे में पुन: नए सिरे से संसोधन कर बजट अनुमोदन के लिए जाएगा और फिर कितना समय लगेगा, अनुमान नहीं लगाया जा सकता। आम जनता को तो बस इंतजार ही करना है…।

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