एक्सक्लूसिव

सूचना आयुक्त भर्ती पर फिर नया पेंच

भूपेंद्र कुमार

पिछले कुछ दिनों से बंद पड़े राज्य सूचना आयोग कोर्ट  के ताले के अभी खुलने की राह दिखाई नहीं दे रही।

9 जून 2018 को 2 सूचना आयुक्तों के चयन के लिए अगली बैठक रखी गई थी, किंतु सरकार द्वारा अपनों को फिट करने और मदन कौशिक द्वारा एकतरफा फैसले की आड़ लेने के कारण नेता प्रतिपक्ष इंदिरा हृदयेश ने स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए 9 जून की बैठक में उपस्थित होने से इंकार कर दिया। पिछले तीन दिनों से मुख्यमंत्री कार्यालय से लेकर भाजपा प्रदेश कार्यालय और मदन कौशिक के साथ-साथ इंदिरा हृदयेश के घर पर भी आवेदकों की आवाजाही तेजी से देखने को मिल रही है। देखना है कि आज की बैठक स्थगित होने के बाद सरकार का अगला कदम क्या होता है !

मदन कौशिक की सलाह से उखड़ी इंदिरा हृदयेश

28 मई को सूचना आयुक्त के पद की भर्ती को लेकर हुई बैठक में  निर्णय नहीं हो पाया था। तब त्रिवेंद्र रावत के खासमखास मंत्री मदन कौशिक ने इंदिरा हृदयेश और त्रिवेंद्र रावत की उपस्थिति में ऐसा फार्मूला सुझाया कि बैठक ही स्थगित हो गई। सरकारी प्रवक्ता मदन कौशिक त्रिवेंद्र रावत के प्रवक्ता बनकर आए और उन्होंने नेता प्रतिपक्ष इंदिरा हृदयेश को सुझाव दिया कि आप व मेरे लिए सबसे बेहतर यह स्थिति होगी कि हम दोनों इस मामले को मुख्यमंत्री के सुपुर्द कर दें और सूचना आयुक्त किसे बनाना है, यह मुख्यमंत्री के विवेक पर छोड़ देते हैं।
इस बीच त्रिवेंद्र रावत ने बताया कि उन्होंने तो अभी तक उन लोगों की सूची भी नहीं देखी, जिन्होंने आवेदन किया है। त्रिवेंद्र रावत के जवाब पर इंदिरा हृदयेश ने कहा कि ज्यादा बेहतर होगा कि पहले आवेदकों की मैरिट सूची योग्यता के आधार पर बना ली जाए। मदन कौशिक द्वारा अपनी बात की पुनरावृत्ति करने के बाद इंदिरा हृदयेश ने स्पष्ट कर दिया कि लोकतांत्रिक संस्थाओं में नेता प्रतिपक्ष के रूप में उनकी जो भूमिका संविधान द्वारा तय की गई है, उसके अनुसार वह सरकार को इस प्रकार का बाइपास रास्ता नहीं दे सकती। सरकार पहले योग्य दावेदारों की सूची सामने रखे, फिर उस पर चर्चा करे और तब चयन हो।

हाईकोर्ट के निर्णय पर सूचना आयोग कोर्ट मे ताले
हाईकोर्ट के निर्णय के कारण  मुख्य सूचना आयुक्त शत्रुघ्न सिंह द्वारा असमर्थता जताने के बाद सुनवाई पूरी तरह ठप हो चुकी है। कोर्ट के निर्णय के अनुसार एकल सदस्यीय सूचना आयुक्त सुनवाई ही नहीं कर सकता।

जबकि आज तक जितने भी सूचना आयुक्तों ने सुनवाई की है, सबने आपस में पृथक-पृथक विभाग बांटकर सुनवाई की। इससे अपीलों के निपटारे मे तेजी आई।फिर भी सवाल है कि यदि न्यायालय का यह बहुसदस्यीय वाला फैसला सही है तो फिर सूचना आयुक्तों द्वारा की गई एकल सुनवाई कैसे संवैधानिक हो सकती है?

हाईकोर्ट के इस निर्णय के खिलाफ तब आयोग ने अपील भी नही की थी।शत्रुघ्न सिंह स्वयं अभी तक पृथक रूप से सैकड़ों सुनवाइयां सुन चुके हैं, किंतु एसएस रावत और राजेंद्र कोटियाल के सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने हाथ खड़े कर दिए।

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