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एक्सक्लूसिव धर्म - संस्कृति

अच्छी खबरःयहां सीमांत के सवर्णों ने दलितों के लिए खोले मंदिर के द्वार

समानता की मिसाल व प्रेरणा की मशाल।
चिल्हाड के ग्रामीणों की अनुकरणीय पहल ।
दलितों व महिलाओं के लिए खुले देवालय  के द्वार ।
देवमाली,पुजारी,वजीर व स्याणे ला सकते है समाज में बदलाव।
नीरज उत्तराखंड
एक ऐसे दौर मे, जब देश मे सवर्ण और दलित की खाई को चौड़ा बनाए रखने के राजनीति में सियासी दल वोटों की फसल काट रहे हैं ,ऐसे मे उत्तराखंड के सीमांत से सवर्णों के एक गांव ने प्रेरक उदाहरण पेश किया है।
इस गांव में दलित-सवर्ण  एक साथ मिलकर मंदिर में पूजा अर्चना करते हैं। कुछ माह पहले ऐसा नही था।
हाल ही के कुछ माह पूर्व जनपद देहरादून के पर्वतीय जनजाति क्षेत्र जौनसार-बावर के तहसील त्यूनी के खत/पट्टी बणा धार के  बिजल्वाण ब्राह्मण बाहुल्य गाँव चिल्हाड के जागरूक व शिक्षित ग्रामीणों ने  गाँव में स्थित चार महासू देवताओं की बहिन बलाईणी माता मंदिर के द्वार महिलाओं और दलितों के लिए खोल कर एक अनुकरणीय  मिसाल पेश की है। इससे गांव के भाई चारे मे बढोतरी हुई है।
यह अन्य आसपास के गाँव के ग्रामीणों के लिए एक प्रेरणा है। देवमाली रोशनलाल बिजल्वान कहते हैं कि लोग खुद को पढ़े लिखे या सभ्य और सुसंस्कृत होने का बखान करते नहीं अघाते,लेकिन जब समाज में फैली बुराइयों व कुरीतियों को दूर करने की मुहिम की बात होती है तो कुरीतियों की पैरवी करते नजर आते हैं।
ऐसे तथाकथित शिक्षित जनों को चिल्हाड के जागरूक लोगों से कुछ सीखने की जरूरत है। गांव के स्याणा जयदत्त बिजल्वान कहते हैं कि अगर ऐसी पहल चार महासू देवताओं  के उत्पत्ति स्थल  व माता देवलाडी के मंदिर मेंद्रथ व चार महासू देवताओं के वजीर कहे जाने वाले व चालदा महासू के वीर शैडकुडिया महाराज के राईगी स्थित मंदिर में भी शुरू की जाती तो एक स्वच्छ समाज के वातावरण का सृजन होता।और धार्मिक आस्था की आड़ में पनप रहे भेदभाव व कुरीतियों का भी अन्त होता।
 दलितों द्वारा धर्म परिवर्तन करने की एक बड़ी वजह धर्म व आस्था की आड़ में हो रहा भेदभाव व छुआ-छूत  भी है।यही वजह है कि जब अन्य धर्मों के ऐजेंट उन्हें उनके धर्म अपनाने पर समानता, शिक्षा व सेवा का चारा डाला जाता है तो वे आकर्षित हो जाते हैं।
इस मुहिम के महानायक देवमाली रोशन लाल बिजल्वान,गाँव के स्याणा व जिला पंचायत सदस्य जय दत्त बिजल्वान तथा पुजारी लच्छी राम बिजल्वान की भूमिका अहम् रही ।
यही फर्ज चिल्हाड गाँव के विद्वान व जागरूक ग्रामीणों ने भी अदा किया ।जिसके लिए वे प्रशंसा के पात्र हैं।अब देखना यह है कि उनके इस सकारात्मक कार्यों से कितने गाँव प्रेरणा लेते हैं।

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