सियासत

ट्रांसफर एक्ट नहीं, ये रॉलेक्ट एक्ट से कम नहीं?

आई0पी0 ह्यूमन (स्वतन्त्र स्तम्भकार)

सोते-सोते हर इंसान कोई न कोई अच्छे सपने की तलाश में रहता है और अगली सुबह के खुशनुमा अहसास की कल्पना करता है। सोसल मीडिया के दौर में आजकल लोग सोने से पहले अपने दोस्तों, रिस्तेदारों, घर-परिवार वालों के साथ सोसल मीडिया में चैटिंग करता है। व्हाट्सएप्प तथा फेसबुक पोस्टों को देखकर ही सोने का मन बनाता है ताकि उसको चैन की नीद आ सके।मेरी भी कुछ ऐसी ही आदत है। अकेले में घर परिवार से 150 किलोमीटर की  दूरी पर वीरान जगह पर विगत 19 वर्षों से शिक्षक के रूप में कार्य कर रहा हूँ।

मेरी पत्नी मुझसे 200 किलोमीटर की दूरी पर कार्यरत है। दुर्गम में कार्य करते हुए उनको भी 22 साल 11 फरवरी 2019 को पूर्ण हो जाएंगे। रोज सोसल मीडिया तथा शिक्षक संगठनों के ग्रुप में इसी आशा के साथ नजर गड़ाये रहता हूँ कि ट्रांसफर के सम्बंध में कुछ अच्छी खबर आई होगी। मगर जब भी मिली निराशा और हताशा ही मिली।

एक फिल्मी गाने के बोल याद आते हैं “दुनियां में कितना गम है, मेरा गम कितना कम है, लोगों का गम देखा तो मैं अपना गम भूल गया, जिसको देखो उसके पास एक दुःख भरी कहानी है-” ये बोल आज मुझे हकीकत में महसूस हुए जब 29 जनवरी को 9 बजकर 56 मिनट पर  मैंने पर्वतजन की एक पोस्ट की हेड लाइन पढ़ी- जिसका शीर्षक था “तड़प उठी उत्तरा: सीएम साहब ऊपर वाले कि लाठी में आवाज नहीं होती” लिंक को ओपन कर देखा तो मैं पल भर के लिए अपना सब कष्ट भूल गया। जो मार्मिक पत्र बहन उत्तरा बहुगुणा पन्त ने मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री के नाम प्रेषित किया था। दूसरों के दुख और कष्टों को देखकर वास्तव में व्यक्ति अपने दुःख और कष्टों को भूल जाता है।

आखिर हम किस लोकतंत्र की बात करते हैं? जनता का शासन  जनता के द्वारा जनता के लिए? ये सब राजनीतिक विज्ञान में पढ़ाई का एक टॉपिक मात्र हो सकता है। यहां तो जनता के द्वारा चुने गए प्रतिनिधि जनता के लिए ही कष्टकारी साबित हो रहे है।

भौतिक विज्ञान में लेंज का नियम है कि-”प्रेरित धारा सदैव उस कारण का विरोध करती है, जिससे वह स्वयं उतपन्न होती है” यही  नियम आजकल की सरकारों पर लागू होता है। जिन मुद्दों और वायदों के कारण वे सत्तासीन होते है। उन्ही को भूलकर उन्ही का विरोध करते है? समस्या अब सिर्फ ट्रांसफर की नहीं है। सवाल है नारी अपमान का वो भी भरे राजदरबार में। महाभारत काल से लेकर वर्तमान तक नारी भरी रसजसभ में अपमानित आखिर क्यों हो रही है? उत्तरा बहुगुणा पन्त को विगत वर्ष मुख्यमंत्री जनता दरबार में इसलिए प्रताड़ित किया गया कि ओ अपनी समस्या को बयां कर रही थी। 20 वर्ष से ऊपर वह दुर्गम में अपनी सेवा देती रही, लेकिन उनकी पति की मौत के बाद उसका जीवन कष्टकारी हो गया। उत्तरा बहुगुणा अपने ट्रांसफर  की गुहार लेकर मुख्यमंत्री दरबार मे गयी तो उनके साथ क्या सलूक किया गया जग जाहिर है।आजतक ट्रांसफर तो दूर विभागीय प्रताड़ना का शिकार हो रही हैं। जैसा उनके द्वारा मुख्यमंत्री तथा शिक्षा मंत्री को लिखित पत्र से प्रतीत होता है।

कल्याणकारी राज्य और राम राज्य की क्या अवधारणा रह गयी है? जनता और फरयादी की आवाज को दबा देना क्या यही जीरो  टॉलरेन्स है? ट्रांस्फर एक्ट का शिक्षको ने दिल से स्वागत किया था मगर उनको क्या पता कि ट्रांसफर एक्ट नही ये रौलेट एक्ट  साबित होगा। जहां न दलिलें सुनी जाती हैं और न ही अपीलें। दर्द भरे दिलो की ये आवाज गूंजती है ”भूलना ही था तो ये प्यार किया ही क्यों था”—।

यही दर्द वर्षों से अपनों से मिलने की तलाश मे शिक्षकों का भी है। लागू करना ही न था  तो ए एक्ट बनाया ही क्यों था? अब तो यही लगता है कि-कौन सुनेगा किसको सुनाएं इसी लिए चुप रहते है। 2 वर्षों से शिक्षको के तबादले बन्द हैं। शिक्षको से 100 प्रतिशत परीक्षाफल विभाग उम्मीद करता है। नही होने पर दण्डात्मक कार्यवाही की जाती है।मगर विभाग 10% भी ट्रांसफर नहीं कर पाया, इसका दोषी भी क्या शिक्षक ही माना जाएगा?

लगता है गैरसेंण राजधानी की तर्ज पर ट्रांसफर एक्ट भी सिर्फ चुनावी  मुद्दा ही बना रहेगा। पहाड का शिक्षक ही ठगा महसूस कर रहा है तो आम जनता और बेरोजगार युवाओं का क्या हाल होगा राम जाने! उत्तरा बहुगुणा पन्त का धैर्य और साहस अवश्य ही एक दिन सबके लिए नया सवेरा लेकर आएगा।

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