एक्सक्लूसिव

उत्तराखंड सरकार की नैया डूबी

हंगामा है क्यों बरपा ? नाव डूबी ही तो है ….

संतों,

मैं देख रहा हूँ की हर बात में बाल की खाल उधेड़ने और तिल का ताड़ बनाने की कुप्रवृति रखने वाले परछिद्रावेशी पत्रकार लोग बेवजह बवाल मचा रहे हैं कि देखो ..देखो.. दुनिया वालों देखो ..नाव डूब गयी I अबे पहली और सीधी सरल बात यह है की नाव का डूबना भी कोई खबर होती है ? यह तो सामान्य बात है , दुनिया का रिवाज है , खबर तो तब होती जब नाव हवा में उड़ने लगती या फिर रॉकेट की तरह अन्तरिक्ष में जा कर मंगल पर जा उतरती कि भाई वैज्ञानिकों जब तुम मंगल पर पानी और झील ढूंढ लोगे तो नाव ढूँढने में समय बर्बाद मत करना I

लेकिन संतों ,यह तो पत्रकारों की पुरानी आदत ठैरी कि साधारण सी खबर भी यूँ परोसें कि ऐसा लगे हो न हो यह नाव भी सत्तर साल में पहली बार डूबी है I लेकिन चूँकि इन मरदूद पत्रकारों की बातों में आकर लोग बाग़ ख्वामखाह जांच –वांच के चक्कर में आ रहे हैं तो अपुन का यह कर्तव्य बनता है ( आंग्ल भाषा में – I feel duty bound ) कि आपको विज्ञान और धर्म के वे सिद्धांत बताएं जाएँ जिनके कारण नाव का डूबना निश्चित था और जिनको सही तरह से न समझने पर आपकी अपनी नाव डूबने की सम्भावना भी बढ़ जायेगी I

अतः हे संतों ,आइये सबसे पहले जांचते है उस बुनियादी सवाल को जो अभी तक किसी ने उठाया ही नहीं I लोग पूछ रहे हैं कि हिसाब ज्यों का त्यों ,पर नाव डूबी तो डूबी क्यों ? भाई , बात बहुत सरल है ,नाव डूबी इसलिये क्योंकि वो तैर नहीं पा रही थी I तो हमें इस वैज्ञानिक तथ्य की तरफ ध्यान देना होगा कि नाव तैरती कैसे है ? कक्षा ६ की विज्ञान की किताब में साफ़ साफ़ लिखा है कि चीजें आपेक्षिक घनत्व के कारण तैरती हैं I जाहिर सी बात है कि नाव का आपेक्षिक घनत्व झील के पानी के आपेक्षिक घनत्व से ज्यादा हो गया था तो वह बेचारी तैरने की बजाय डूबने लगी I

तो संतों , सवाल यह है कि हम क्या कर सकते थे ? जाहिर सी बात है कि या तो नाव का आपेक्षिक घनत्व कम किया जाता या फिर झील के पानी का आपेक्षिक घनत्व बढ़ाया जाता I अब चूँकि नाव के साथ इतने भारी भरकम नाम –पद –योजनायें -अपेक्षाएं जुडी थी कि उसका आपेक्षिक घनत्व कम करने की गुंजाइश ही नहीं थी ,तो हमें झील के पानी का आपेक्षिक घनत्व बढाने की तरफ ध्यान देना चाहिए था I कक्षा ६ की विज्ञान की किताब के एक दूसरे पन्ने पर लिखा है कि खारे पानी का आपेक्षिक घनत्व मीठे पानी के आपेक्षिक घनत्व से ज्यादा होता है I अतः हमारे लिए विशुद्ध वैज्ञानिक दृष्टि से यही उचित था कि हम या तो मृत सागर से खारे और ज्यादा आपेक्षिक घनत्व वाले पानी का आयात कर उसे झील में मिलाते ,या फिर झील में नमक की मात्रा बढाते I पर विकास की अवैज्ञानिक दृष्टि होने के कारण हमने ऐसा नहीं किया , नतीजा यह हुआ कि बेचारी नाव इतना प्रशिक्षण देने के बावजूद चाह कर भी तैर न सकी I

संतों ,अब अगला सवाल है कि चलो अगर तैर न सकी तो डूबी क्यों ? तो हे संतों ,इसका जबाब भी विज्ञान में छुपा है I कक्षा ७ की विज्ञान की किताब की गाइड में लिखा है कि किसी वस्तु को तरल में आंशिक या पूर्ण रूप से डूबोने पर , तरल द्वारा वस्तु पर एक बल ऊपर की तरफ लगाया जाता है जिसे उत्प्लावन बल कहते हैं I नाव के डूबने के कारणों की विवेचना करने के बाद मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूँ कि किन्ही कारणों से झील के पानी का उत्प्लावन बल कम हो गया था ( वैसे मुझे इसमें विदेशी शक्तियों और देश में रह रही देशद्रोही ताकतों का हाथ भी दिखाई देता है ) I मेरी स्पष्ट राय है कि हमें एक वैज्ञानिक आयोग बना कर झील के पानी का उत्प्लावन बल बढाने की संभावनाओं पर शोध करनी चाहिए ,ताकि भविष्य में कोई नाव लाख चाहने के बावजूद न डूब सके I साथ ही यह भी जरूरी है कि एम.एस.सी. और पी.एच.डी. करने वालों के प्रश्नपत्रों में कुछ सवाल कक्षा ६ और ७ की किताबों के भी हों , ये भी भला कोई बात हुई कि पिछला भूले जा रहे हैं और आगे पढ़े जा रहे हैं ?

संतों ,यह तो थी वैज्ञानिक दृष्टि I अब धार्मिक विवेचना भी करनी होगी ,नहीं तो भाई लोग मुझ पर धर्मद्रोही होने के आरोप का इतने भारी भारी पत्थर बाँध देंगे ,कि विज्ञान के नियम अनुसार मेरे डूबने की प्रायिकता बढ़ जायेगी I

गीता में साफ़ साफ़ लिखा है कि यह संसार नश्वरअर्थात फानी है (फिल्म गाइड में देवानंद भी गीत गा चुके हैं –दुनिया है फानी ,,कहते हैं ज्ञानी ) I अर्थात हर वो जो जन्म लेता है उसका अंत अवश्यम्भावी है I तो नाव का भी अंत होने में किसी को संदेह नहीं होना चाहिए I और सोचिये हम क्या नाव लेकर आये थे दुनिया में ? जो अब नाव ले कर जायेंगे ? डूबना –तैरना तो ऊपर वाले हाथ में है I श्रृष्टि की उत्पत्ति –विकास एवं संहार के बारे में पुराणों में लिखा है कि ब्रह्मा सृजन करते हैं , विष्णु पालन करते हैं और शिव संहार करते हैं I अतः देवभूमि उत्तराखंड ,जहाँ तीनों देवता निवास करते हों ,वहां नाव की उत्पत्ति – पालन एवं संहार पर किसी को कोई सवाल ही नहीं करना चाहिए I बाइबिल और कुरआन में भी वर्णन है कि प्रलय के समय सिर्फ नूह की नाव बची थी (अगली प्रलय में भी सिर्फ उसकी नाव बचाने की पूरी व्यवस्था भी है ) , तो यह भी तो संभव है कि खुदा उर्फ़ गौड जी प्रलय का पूर्वाभ्यास कर रहे हों और इस नाव को उन्होंने नूह के लिए उपयुक्त न पा कर डूबा दिया ,ताकि प्रलय के दिन नूह इस नाव के भरोसे रह कर खुद भी डूब न जाय I नूह डूब गया तो सारी व्यवस्था ही डूब जायेगी I

अपुन के मुल्क के बड़े बड़े संत भी कह गए हैं कि भवसागर के पार जाना हो तो सांसारिक माध्यमों पर भरोसा न करना , ये हमारे कर्म ही है जो हमें भवसागर के पार ले जायेंगे I झील को पार करने के लिए सांसारिक नाव से उम्मीद करना माया के जाल में पड़ना ही है ,नाव का डूबना माया का डूबना और ब्रह्म का प्रकट होना मात्र ही है और कुछ नहीं I

संतों ,गरुड़ पुराण में भी उल्लेख है कि मृत्यु के बाद वैतरणी नदी को पार करने के लिए कोई नाव या पुल नहीं मिलेगा , गाय की पूंछ पकड़ कर पार करना होगा I इस नाव का डूबना असल में एक सन्देश भी है ,कि भाई नाव के भरोसे न रहियो , गाय की पूंछ पकड़ I और नाव डूबा कर ऐसा पवित्र सन्देश सिर्फ देवभूमि से ही दिया जा सकता था I मेरा सुझाव है कि मरने के बाद हम ठीक से पूंछ पकड़ सके ,इसके अभ्यास के लिए झील के किनारे गोशाला बना देनी चाहिए ,ताकि लोग गाय की पूंछ ठीक से पकड़ने की प्रैक्टिस कर सकें I

अंत में हे संतों , अब यह आप पर निर्भर करता है कि आप वैज्ञानिक दृष्टि से इस मसले को देखते हैं या धार्मिक दृष्टि से I चाहे तो दोनों दृष्टियों का अपनी सुविधानुसार घालमेल भी कर सकते हैं ,मुझे कोई आपत्ति नहीं होगी I।                                                                                                                                                                                                                                                                                                               लेखक : मुकेश प्रसाद बहुगुणा

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