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उत्तरकाशी में दो दिवसीय युवा महोत्सव शुरू ।

26 और 27 दिसंबर को ब्लॉक से चुनी हुई टीमों के बीच जनपद में हो रही  प्रतिस्पर्धा।जीतने वाली टीम राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में 29 – 30 दिसंबर को देहरादून में लेंगे हिस्सा।

गिरीश गैरोला

युवा कल्याण एवं प्रांतीय रक्षक दल द्वारा दो दिवसीय युवा महोत्सव उत्तरकाशी में शुरू हो गया है। दो दिवसीय महोत्सव के पहले दिन ब्लॉक स्तर से चुनी हुई 6 की टीम ने  अपना प्रदर्शन दिया।  आने वाले 29 और 30 दिसंबर को राज्य स्तरीय युवा महोत्सव देहरादून में आयोजित किया जाएगा। जिसमें उत्तराखंड के जनपदों से चयनित सांस्कृतिक टीमों के बीच प्रतिस्पर्धा होगी । इसी कड़ी में  स्वामी विवेकानंद जी के जन्म दिवस के मौके पर 12 जनवरी को राष्ट्रीय स्तर पर युवा महोत्सव का आयोजन किया जाएगा ।

उत्तरकाशी के विकास भवन में आयोजित युवा महोत्सव के पहले दिन बतौर मुख्य अतिथि शामिल यमुनोत्री के विधायक केदार सिंह रावत ने बताया युवाओं को स्वामी विवेकानंद के चरित्र से प्रेरणा लेनी चाहिए । उन्होंने कहा स्वामी विवेकानंद कहते थे युवाओं की पूजा फुटबॉल के मैदान में है ।  युवा जितने मजबूत होंगे उसी कर्म के आधार पर उनका जीवन भी सफल होगा ।

महोत्सव में बतौर विशिष्ट अतिथि डीएम आशीष चौहान ने कहा पहाड़ों की संस्कृति मैं कहीं एक समानता है,  चाहे वह उत्तराखंड के पहाड़ों की संस्कृति हो या राजस्थान की,  किंतु पाश्चात्य संस्कृति को आदर्श मानते हुए युवा पीढ़ी जिस तरह से अपनी मूल संस्कृति से हट रही है उसको बचाने के लिए पहल किए जाने की आवश्यकता है ।युवा महोत्सव में मोरी, पुरोला , भटवाड़ी, डुंडा ,  चिन्यालीसौड़ के युवाओं ने एक से बढ़कर एक सांस्कृतिक झलक की प्रस्तुतियां दी।

उत्तरकाशी जनपद के सुदूर पुरोला क्षेत्र  के खिलाड़ी गांव से आए कलाकार सुनील बेसारी ने बताया बताया कि उन्होंने स्युला  जातर कार्यक्रम प्रस्तुत किया है जिसमें कलाकार पोखु देवता की गाथा गाते हुए मंच पर आते हैं । ढोल नगाड़े देव डोली के साथ देवता का पस्वा  मंच पर उतरते हैं । उन्होंने बताया कि आदिकाल में जब महासू देवता का बाण भगवान विष्णु का प्रतीक बन गया था उसी याद में महासू देवता के प्रभाव में ही देवता के पस्वा देव शक्ति से  झूलते हैं और अपने चेहरे पर नुकीले मोटी सुईया चुभा लेते हैं और जलती हुई दिए कि लॉ को अपने मुख में रख लेते है ।

विभिन्न परिधानों और वेशभूषा में सजी कलाकारों ने स्वीकार किया कि नई पीढ़ी अपनी समृद्ध संस्कृति को भूलती जा रही है और मॉडर्न होने की चक्कर में आधुनिक पाश्चात्य संस्कृति की तरफ आकर्षित हो रही है । उन्होंने बताया कि हमारी संस्कृति के साथ हमारे वेशभूषा और परिधानों के पीछे देश काल परिस्थिति के अनुसार वैज्ञानिक कारण भी हैं जिन्हें नई पीढ़ी को एक फैशन के रूप में अपनाने की जरूरत है।

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