पहाड़ों की हकीकत

पिथौरागढ़ में किताबों के लिए आंदोलन पर एक अध्यापक की दो टूक टिप्पणी

पिथौरागढ़ के विद्यालय में अध्यापकों और पुस्तकों की मांग को लेकर छात्र आंदोलन कर रहे हैं। इस आंदोलन को बॉलीवुड के कलाकार हेमंत पांडे सहित काफी हस्तियों की तवज्जो मिल रही है। वहीं इस बीच मिर्ची बाबा के नाम से मशहूर अध्यापक मुकेश प्रसाद बहुगुणा ने भी इस आंदोलन को लेकर सिस्टम को झकझोरने वाली चुटीली पोस्ट लिखी है। आइए पढ़ते हैं

संतों ,

सुनने में आ रहा है कि कतिपय लोग पिथौरागढ़ में विद्यालय में पुस्तकों और अध्यापकों की मांग को लेकर आन्दोलन कर रहे हैं I

मेरा मानना है कि ऐसी मांगे न सिर्फ गैर-जिम्मेदार , वाहियात और फिजूल हैं ,बल्कि अवाम को विकास की मुख्य धारा के मुद्दे बहकाने का षड्यंत्र भी है I ऐसे लोगों को चिन्हित कर इन पर एस्मा या कोई ऐसी सख्त धारा लगानी चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ियों को सबक मिल सके और वे ऐसा गैरजिम्मेदार कार्य करने से परहेज रख सकें I

संतों ,आप स्वयं ही सोचिये कि क्या भारत ,विशेषतौर से देवभूमि उत्तराखंड जैसे पुण्यस्थान पर ऐसे आन्दोलन होने चाहिए ? क्या किताबों और शिक्षकों के बिना शिक्षा नहीं ली जा सकती ? हमारे ग्रन्थों में इस तरह के पर्याप्त उदाहरण हैं जिनसे साबित होता है कि ज्ञान प्राप्त करने के लिए पुस्तकों और शिक्षकों की ख़ास जरूरत नहीं है I याद करिए एकलव्य को ,जिसने साक्षात गुरु के बिना ही धनुर्विद्या में प्रवीणता प्राप्त की थी I इन आन्दोलनकारियों को चाहिए कि गुरूजी की मूर्ति बना कर घर में लगा दें और फिर ज्ञान साधना में जुट जाएँ I निसंदेह यह अज्ञानी आन्दोलनकारी पौराणिक ग्रंथों का अध्ययन नहीं करते हैं I

संतों , आप यह भली भांति जानते ही है कि सर्वश्रेष्ठ ज्ञान पुस्तकों से नहीं अपितु कर्म से मिलता है I हमारे बड़े बड़े ऋषि-मुनियों ने पुस्तकीय ज्ञान की बजाय व्यवहारिक कर्म युक्त ज्ञान को प्रधानता दी है I मैंने यह कहीं नहीं पढ़ा कि वशिष्ठ ,विश्वामित्र ,भारद्वाज , भृगु जैसे विद्वान लोगों ने किसी पुस्तक का कहीं उल्लेख किया हो I ये आन्दोलनकारी हमारी ऋषि परम्परा को भूल कर विदेशी पुस्तकीय शिक्षा प्रणाली पर जोर दे रहे हैं ,यह हमारे लिए शर्म की बात है ,मैं इनकी वही वाली निंदा करता हूँ ,जो की जानी चाहिए (अर्थात कड़ी वाली निंदा ) I इन आन्दोलनकारियों को चाहिए कि वे आन्दोलन त्याग कर अपने संस्कारों और संस्कृति को अपनाएँ और अविलम्ब सभी छात्रों को लेकर स्वयं भी तपस्या करने के लिए चले जाएँ Iयह बुद्ध का देश भी है ,जिन्होंने किसी किताब को पढ़ कर बोध प्राप्त नहीं किया था ,अपितु बोधिवृक्ष के नीचे तपस्या कर ज्ञान प्राप्त किया था I तपस्या से ज्ञान अवश्य मिलेगा ,इसमें किसी को कोई संदेह नहीं होना चाहिए I जिसे संदेह हो ,वह निश्चित रूप से रौरव नरक में स्वदेशी कढाई में स्वदेशी कच्ची घानी के सरसों के तेल में पकौड़ों की तरह तला जाएगा और अगले जन्म में पाकिस्तान में जन्म लेने के लिए अभिशप्त होगा I

अलबत्ता अगर इन्हें आन्दोलन करने का शौक ही है तो बेशक करें , हवाई अड्डा बनाने के लिए करें , फ्लाईओवर बनाने के लिए करें , कृत्रिम झील बनाने के लिए करें , फाइव स्टार बार -होटल बनाने के लिए करें I ऐसे आन्दोलन करने से इन्हें न सिर्फ समाज के ठेकेदारों का सहयोग मिलेगा ,बल्कि रेत-बजरी खनन के गणमान्य ठेकेदारों का सहयोग भी अवश्य मिलेगा I फिर क्षेत्र का विकास होगा ,रोजगार मिलेगा और चुनाव लड़ने पर वोट एवं नोट भी प्राप्त होंगे I इन भौतिक कार्यों के लिए आन्दोलन करने का मूड न हो तो आध्यात्मिक उन्नति के लिए आन्दोलन करें – जैसे – प्रणमामि गंगे , सेव दी सांड मूवमेंट , बैल चराओ – देश बचाओ अभियान , धर्म रक्षा -आत्मरक्षा आन्दोलन ( पकड़ धर्म का झंडा ,,,नहीं देख ले मेरा डंडा ) आदि आदि I

मैं इन लोगों की निंदा करते हुए कहना चाहता हूँ कि ये वो लोग हैं जो मुल्क -राज्य और गाँव-शहर का चहुंमुखी विकास फूटी आँखों से नहीं देख सकते , इन मरदूदों को न देश की फ़िक्र है न धर्म या संस्कृति की I किताबें नहीं हैं तो गूगल नहीं कर सकते बे ? गुरूजी नहीं हैं तो कंप्यूटर से नहीं पढ़ सकते क्या ? स्कूल में इमारत नहीं है तो वृक्षों की छाँव में बैठ ताज़ी हवा खाते हुए प्रकृति के साथ रहते हुए नहीं पढ़ सकते क्या ? और इ-लर्निंग भी तो कोई चीज है ? आधुनिकता के इस युग में किताबों और अध्यापकों जैसी दकियानूसी बातें करना आखिर कहाँ तक उचित है ? जब देश कैशलेस हो सकता है तो क्या अब हमें बुकलेस -टीचरलेस – स्कूललेस सिस्टम नहीं अपनाना चाहिए ?

और हे संतों , कबीर दास को कैसे भूल गए ये दुष्ट आन्दोलनकारी ? कबीर जी ने साफ़ साफ़ कहा है -पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ ,पंडित भया न कोय ..ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय I तो किताबों यानी ग्रंथों की मांग करना सर्वथा अनुचित -निंदनीय कृत्य है , इन्हें चाहिए कि ये प्यार करें I प्यार करें अपने देश से , अपने झंडे से ,अपने देशवासियों से ,नारों से ,वादों से , चाहें तो फुर्सत मिलने पर अपने पड़ौसी -पड़ौसन से भी कर सकते हैं I प्यार करेंगे तो न सिर्फ पंडित -ज्ञानी बनेंगे बल्कि निर्भीक भी बनेंगे ,,,जब प्यार किया तो डरना क्या ,जैसे गीत साबित करते हैं कि प्रेम करने वाला न सिर्फ ज्ञानी होता है बल्कि निभीक भी I

अंत में मैं इन सभी आन्दोलनकारियों को लानत भेजते हुए प्रभु राम से प्रार्थना करता हूँ कि वो इनको सन्मति दे ,ताकि ये इस तरह के अनाप-शनाप आन्दोलन करने की बजाय राष्ट्र निर्माण में अपना शेष जीवन व्यतीत कर सकें I याद रखें राष्ट्र से बढ़कर कुछ नहीं हैं , न कोई किताब ,न कोई स्कूल न कोई अध्यापक I राष्ट्र सर्वोपरि था ,है और रहेगा I

वंदेमातरम् ..भारत माता की जय I

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