मरीजों को नहीं मिल रहा ईलाज, सीएम साहब पीपीपी मोड से वापस लो टिहरी अस्पताल

अजय रावत ‘अजेय’

सामने आने लगे अस्पतालों को पीपीपी मोड दिए जाने के दुष्परिणाम

रैफरल सैंटर मात्र बनकर रह जाएंगे ऐसे अस्पताल

जिला अस्पताल टिहरी में हुए हंगामें से सच साबित हुई आशंका

टिहरी। हाल ही में पीपीपी मोड के तहत एक निजी संस्था को सौंपे गए टिहरी के जिला अस्पताल बौराड़ी में हुए हंगामें से साबित हो गया है कि स्वास्थ्य महकमें के अफसरों की जिद से जबरन लिया गया यह फैसला पहाड़ की सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं को पूरी तरह से ध्वस्त कर देगा। इस बारे में पूर्व में पहाड़ के सरोकारों से जुड़े लोगों द्वारा व्यक्त की गई आशंका आज सच साबित हो गई।

पीपीपी मोड वाले अस्पताल से नये डीएम भी नाखुश

https://youtu.be/e0OV64SxdT0

मौजूदा सरकार व उसके स्वास्थ्य महकमें के बड़े अफसरों द्वारा जनसरोकारों को पूरी तरह से नजरअंदाज करते हुए टिहरी के साथ पौड़ी के जिला चिकित्सालय व दो अन्य चिकित्सालयों को पीपीपी मोड पर निजी क्षेत्र को देने का प्रस्ताव पारित कया गया। जिसके तहत टिहरी के जिला अस्पताल बौराड़ी को निजी संस्था को सौंप भी दिया गया। सरकार के अधीन संचालित होने के दौरान इस अस्पताल में 20 कुशल व विशेषज्ञ चिकित्सक तैनात थे, लेकिन निजी क्षेत्र को पीपीपी मोड पर दिए जाने के बाद से इस अस्पताल की स्वास्थ्य व चिकित्सा सेवाएं पूरी तरह चरमरा गई।

पीपीपी मोड के तहत निजी संस्था के प्रशासन द्वारा इस अस्पताल के संचालन शुरू करते हुए यहां अव्यवस्थाओं का बोलबाला हो गया। जहां पूर्व में यहां मरीजों को अपेक्षित रूप से बेहतर सुविधाएं मिल रही थीं, वहीं अब यहां मरीज व उनके तीमारदार निजी संस्था के डाक्टरों के दुव्र्यवहार से परेशान हैं, इसी का नतीजा है कि आज मरीजों व तीमारदारों के सब्र का बांध टूट ही गया, जिसकी परिणिति हंगामें के रूप में हुई।

दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि जब तक अस्पताल सरकारी व्यवस्था के तहत चल रहा था, किसी भी अव्यवस्था की स्थिति में सरकार पर निशाना साधते हुए जनप्रतिनिधियों व सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलने का विकल्प भी स्थानीय लोगों के पास था, लेकिन अब पीपीपी मोड में संचालन के बाद से परेशान लोगों के पास दबाव हेतु यह विकल्प भी शेष नहीं रहा।

निजी क्षेत्र के लिए आसान न होगा पहाड़ में डाक्टरों की तैनाती
सरकार द्वारा टिहरी व पौड़ी के जिला अस्पताल के साथ पौड़ी जिले के दो अन्य सीएचसी को भी पीपीपी मोड पर देने का प्रस्ताव विचाराधीन है, ऐसे में अस्पतालों का अधिग्रहण करने वाली संस्था को कम से कम साठ से सत्तर कुशल डाक्टरों की आवश्यकता होगी। पहाड़ में तैनाती को लेकर डाक्टरों की अनिच्छा की प्रवृत्ति को देखते हुए साफ है कि अधिग्रहण करने वाली संस्था द्वारा इन सभी अस्पतालों को अपने मेडिकल कालेज में अध्यनरत जूनियर व सीनियर फैलो द्वारा ही संचालित किया जाएगा।

डोईवाला व जिला अस्पताल टिहरी के मौजूदा हालात यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि पीपीपी मोड पर अस्पतालों का संचालन संभव नहीं है। इतना ही नहीं पौड़ी जिले के सतपुली में हंस फांउडेशन द्वारा स्थापित किए गए अत्याधुनिक अस्पताल में भी डाक्टरों की तैनाती टेढ़ी खीर बना हुआ है, ऐसे में साफ है कि पहाड़ के अस्पतालों में निजी क्षेत्र द्वारा डाक्टर तैनात किया जाना संभव नहीं है।

अफसरों की मनमानी से जनसरोकारों से दूर जाती सरकार
अस्पतालों को पीपीपी मोड पर दिए जाने के खेल के पीछे सबसे अहम भूमिका विभाग में बैठे बड़े अफसरों की है। यह अफसर निजी संस्थाओं से मिलीभगत कर ऐसी संस्थाओं को फायदा पहुंचाने के साथ अपने हित भी साध रहे हैं। ऐसे में सरकार स्वास्थ्य जैसे जनसरोकारों के मोर्चे पर जनता से दूर जाती हुई नजर आ रही है। यदि टिहरी जैसे पूर्व में पीपीपी मोड पर दिए गए अस्तपालों की दुर्दशा से बेखबर पौड़ी अन्य अस्पतालों को भी जबरन पीपीपी मोड पर देने की अपनी मंशा पर कायम रहती है तो जहां पहाड़ की स्वास्थ्य सेवाएं पूरी तरह से तबाह हो जाएंगी वहीं सरकार की छवि पर भी बट्टा लगना तय है।

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