एक्सक्लूसिव खुलासा : मछली के जलाशयों के ठेके में लाखों का घपला ।

देहरादून । 

उत्तरप्रदेश से अलग होने के बाद उत्तराखण्ड राज्य को जलाशयों के स्वामित्व को लेकर अथक प्रयास करने पड़े थे । उन्हीं जलाशयों को अब ठेके पर दिये जाने को लेकर कई संशय खड़े होने लगे हैं । 

ऐसा ही एक ताजा मामला है हरिपुरा और बौर जलाशयों के ठेके का । मत्स्य विभाग ने इसको आगामी दस वर्षों के लिये ठेके पर दिये जाने को लेकर आगामी 6 दिसम्बर को ई-टेंडर का आयोजन किया है । किंतु निविदा शर्तों को देखकर ऐसा लगता है कि यह किसी पक्ष विशेष को लाभ दिलाये जाने की कवायद है । 

अभी तक जलाशयों के टेंडर 5 वर्ष के लिये होते थे, इस बार यह 10 वर्ष के लिये कर दिये गये । पहली ही निविदा शर्त संदेह को जन्म देती है । जिसमें किसी एक जलाशय के संचालन, जिसके भी न्यूनतम क्षेत्रफल का खुलासा किया गया है , अनुभव के साथ केज कल्चर का भी अनुभव मांगा गया है । 

इसी से स्पष्ट हो जाता है कि यह किसी पक्ष विशेष को लाभ देने के लिये डिज़ाइन किया गया है क्योंकि अधिकांश जलाशय ठेकेदार मछली के बीज को बाहर से तैयार करवाकर जलाशय में छोड़ते हैं । 

इस बार संयुक्त उद्यम को छूट दी गई है । मतलब 2 या 3 फर्म मिलकर यह ठेका ले सकती हैं । इसमें भी मजे की बात यह है कि जिस फर्म को अनुभव हो उसका टर्नओवर मात्र 1 करोड़ तय किया गया है और बाकी की फर्म मिलकर 5 करोड़ का टर्नओवर पूरा कर दें । 

इसका अर्थ यह हुआ कि जिस अनुभवी पक्ष विशेष को यह लाभ दिया जाने वाला है उसका टर्नओवर मात्र 1 करोड़ के आस पास ही है और उसको यह छूट दे दी गयी है कि वो 2-3 और पार्टनर जोड़कर आगामी दस सालों के लिये यह जलाशय हासिल कर ले । इसमें सीधे सीधे किसी मिलीभगत की बू आ रही है । 

3-4 वर्ष पूर्व जब इस जलाशय का ठेका खत्म हुआ था तब इसका मूल्य 32 लाख के आसपास था अब 4 वर्षों बाद इसकी दर मात्र 36 लाख निर्धारित की गई है । अगर पहली निविदा शर्त ना होती तो कोई भी फर्म इसे 50-60 लाख रुपये में शुरुआती बोली लगा सकती थी जो निगोशिएशन में बहुत आगे भी जा सकती थी । 

मत्स्य विभाग के सचिव और निदेशक का पदभार एक ही अधिकारी के पास है तो ऐसे में उनपर भी उंगली उठना अत्यंत स्वाभाविक है । विभागीय मंत्री पहले भी कई बार कई विवादों और आरोपों में घिरी रही हैं सो उनपर भी पक्ष विशेष को लाभ दिये जाने की बात उठ रही है । 

 जहाँ तक पर्वतजन की जानकारी है उसमें जलाशय संचालन और केज कल्चर दोनों का अनुभव सिर्फ उस ठेकेदार के पास है जिसके पास इससे पूर्व में भी हरिपुरा और बौर जलाशयों का ठेका रहा था । कहीं यह पक्ष विशेष वही तो नहीं है जो अन्य पार्टनर्स के साथ इस बार इस जलाशय को 10 वर्षों के लिये हथियाने की फिराक में है ??

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