एक्सक्लूसिव खुलासा

खुलासा: निशाने पर क्यों हैं विधायक उमेश शर्मा !

चैंपियन  के बाद उमेश शर्मा पर निष्कासन की तलवार

 कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आए नेताओं की भाजपा को अब कितनी आवश्यकता है और वह  भाजपा के रंग में क्यों नहीं रंग पा रहे जैसे सवालों के बीच आज भाजपा के महामंत्री राजेंद्र भंडारी ने रायपुर के विधायक उमेश शर्मा काऊ को एक कारण बताओ नोटिस जारी किया है।
 तीन दिन के भीतर इसका जवाब मांगा गया है। उमेश शर्मा काऊ की एक ऑडियो को आधार बनाकर जिस प्रकार यह नोटिस जारी किया गया है, वह गौर करने लायक है।
  उमेश शर्मा काऊ इससे पहले नगर निगम चुनाव के दौरान भी भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशियों के खिलाफ अपने प्रत्याशी उतारकर भाजपा को हराने का काम कर चुके हैं। रायपुर से 2012 के चुनाव में त्रिवेंद्र सिंह रावत को हराने वाले उमेश शर्मा काऊ अब सीधे त्रिवेंद्र सिंह रावत के निशाने पर हैं।
 यह ताजा नोटिस उमेश शर्मा काऊ के लिए घातक भी साबित हो सकता है और उनकी 2022 से पहले दावेदारी के साथ-साथ पार्टी से निष्कासन भी हो सकता है।
गौरतलब है कि निकाय चुनाव में भी उमेश शर्मा काऊ की समर्थकों के आधा दर्जन से अधिक टिकट काटे गए थे उमेश शर्मा काऊ के यह सभी समर्थक निर्दलीय लड़े और जीत कर भी आ गए थे। तब भी पार्टी ने भाजपा के अधिकृत प्रत्याशियों को हराने का ठीकरा उमेश शर्मा काऊ पर ही फोड़ा था।
पंचायत चुनाव बीपी उमेश शर्मा की समर्थकों को टिकट न देने के बाद यदि निर्दलीय डरने वाले प्रत्याशी फिर से जी जाते हैं तू यह धारणा भी पुख्ता हो जाएगी कि भाजपा कांग्रेस से बागी होकर भाजपा में आने वाले प्रत्याशियों को धीरे धीरे उनका जनाधार समाप्त करके खत्म करना चाहती है।
 अहम सवाल यह है निकाय चुनाव के वक्त भाजपा ने यह क्यों नहीं समझा कि जब कोई प्रत्याशी जिताऊ है उसे टिकट क्यों नहीं दिया जा रहा ! कमजोर प्रत्याशी टिकट देकर उनकी हार का ठीकरा कब तक विधायकों की सर थोड़ा जाता रहेगा भारतीय जनता पार्टी के प्रति यह धारणा भी पुख्ता होती जा रही है कि यदि त्रिवेंद्र सिंह रावत की एक अलग लाॅबी बनती जा रही है।
 जो त्रिवेंद्र सिंह रावत को पसंद नहीं उन्हें न तो पार्टी में शामिल किया जाएगा और ना उनको टिकट दिया जाएगा और अगर वे निर्दलीय लड़े तो फिर उन्हें एक तो निष्कासित किया जाएगा दूसरा उनसे संबंधित विधायक को भी इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा।
इसलिए ढाई साल में ऐसी कई उदाहरण हैं, जब भाजपा के बागियों को पार्टी में सिर्फ इसलिए नहीं लिया गया, क्योंकि पार्टी के किसी न किसी कद्दावर नेता से उनकी पटरी नहीं बैठती थी।

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