उत्तराखंड में सरकार ने 17 जनवरी को बंपर ट्रांसफर किए थे लेकिन लगता है सरकार के आला अधिकारी फाइल पर ट्रांसफर के आदेश जारी करके भूल गए।
ऐसा नहीं लगता कि सरकार ने अपने इन ट्रांसफर आदेशों का कुछ फाॅलो भी किया हो , क्योंकि आखिरकार कौन अधिकारी अपने नये तैनाती पर गया या नहीं गया, इसका शासन को कोई संज्ञान नहीं है।
ना तो इन अधिकारियों का ट्रांसफर निरस्त किया गया है और ना ही यह अधिकारी 21 दिन बाद भी अपने नये तैनाती स्थल पर ज्वाइन किए हैं।
अहम सवाल यह है कि आखिर उनकी पुरानी कुर्सियों पर ऐसा कौन सी मलाई लगी है कि यह अफसर कुर्सी छोड़ने ही नहीं चाहते।
उदाहरण के तौर पर 17 जनवरी को डिप्टी कलेक्टर पौड़ी नूपुर वर्मा का ट्रांसफर डोईवाला शुगर मिल के अधिशासी निदेशक के पद पर किया गया था किंतु अभी तक नूपुर वर्मा ने नई तैनाती स्थल पर ज्वाइन नहीं किया।
पर्वत जन ने जब भी उनका पक्ष जानने के लिए उनके मोबाइल पर फोन किया तो उन्होंने कभी फोन नहीं उठाया और ना ही कॉल बैक किया।
वहीं दूसरी ओर डोईवाला शुगर मिल के अधिशासी निदेशक के पद पर तैनात डीपी सिंह से यह पद 17 जनवरी को ही हटा दिया गया था, किंतु वह भी अभी तक इस पद पर डटे हुए हैं। अहम सवाल इसलिए भी बनता है कि ट्रांसफर के बाद भी वह कई महत्वपूर्ण कार्यों को अंजाम दे रहे हैं और बड़े स्तर पर वह भुगतान भी जारी कर रहे हैं।
इस संबंध में जब सचिव कार्मिक शैलेश बगौली से पर्वत जन ने बात करनी चाहिए तो उन्होंने भी फोन नहीं उठाया।
अहम सवाल यह है कि जब ट्रांसफर हो गया तो ऐसी भी क्या मजबूरी है कि अधिकारी अपने पद से रिलीव नहीं हो रहे !
क्या ट्रांसफर के बावजूद कुर्सी पर जमे हुए अधिकारी उन कुर्सियों के लिए इतने महत्वपूर्ण हो गए हैं कि उनके ट्रांसफर के बाद वह कार्य ही ठप हो जाएगा !
पौड़ी के डिप्टी कलेक्टर नूपुर वर्मा के रिलीव करने के संबंध में जब पर्वत जन ने पौड़ी की डीएम स्वाति भदोरिया से बात करनी चाहिए तो उन्होंने भी फोन नहीं उठाया।
ट्रांसफर के बाद भी भारी भरकम भुगतान पर उठे सवाल
अहम सवाल यह है कि 17 जनवरी को ट्रांसफर आर्डर के बाद डोईवाला शुगर मिल में डीपी सिंह ने 10 करोड रुपए से भी अधिक का भुगतान कर दिया है, जिसमें अधिकांश भुगतान ठेकेदारों और ट्रांसपोर्टरों को किया गया है। डोईवाला शुगर मिल में फैब्रिकेशन के नाम पर मजदूरी के मद में ही ठेकेदार को 70 लाख के लगभग भुगतान किए जाने से भी मिल के कर्मचारियों में काफी आक्रोश है ।
शुगर मिल के कर्मचारियों में इसलिए भी आक्रोश है कि अधिशासी निदेशक डीपी सिंह ने अपने भांजे से लेकर अपने गृह जनपद सीतापुर और सहारनपुर के कई करीबियों को शुगर मिल में विभिन्न पदों पर नौकरी पर रख लिया है।
कर्मचारियों का कहना है कि उनके ओवर टाइम से लेकर अन्य मदों का पैसा अभी तक भुगतान नहीं किया गया है, किंतु इस तरह का अनाप-शनाप भुगतान करके सरकार को राजस्व की चपत लगाई जा रही है।
देखने वाली बात यह होगी कि 17 जनवरी को ट्रांसफर आर्डर के 21 दिन बीतने के बावजूद यदि सचिवालय के ट्रांसफर आर्डर पर अमल नहीं हुआ तो क्या यह ट्रांसफर निरस्त होंगे अथवा अधिकारी कब तक नई तैनाती स्थल पर ज्वाइन करेंगे।
एनएच 74 घोटाले और भ्रष्टाचार से कमाई के लिए चर्चित हैं डी पी सिंह
एनएच-74 (NH-74) घोटाले के संबंध में पीसीएस अधिकारी डीपी सिंह (दिनेश प्रताप सिंह) पर हुई अब तक की मुख्य कार्रवाइयों का विवरण निम्नलिखित है:
निलंबन और गिरफ्तारी: इस घोटाले के सामने आने के बाद उन्हें पद से निलंबित कर दिया गया था। नवंबर 2017 में उन्होंने एसआईटी (SIT) के सामने आत्मसमर्पण किया, जिसके बाद उन्हें जेल भेज दिया गया था। वह इस मामले में लगभग 14 महीने जेल में रहे।
प्रवर्तन निदेशालय (ED) की कार्रवाई:
छापेमारी: जून 2025 में ईडी ने उनके देहरादून, हरिद्वार और उत्तर प्रदेश के ठिकानों सहित कुल 7 से 9 ठिकानों पर छापेमारी की। इस दौरान 24.70 लाख रुपये नकद और कई महत्वपूर्ण दस्तावेज जब्त किए गए।
चार्जशीट: ईडी ने उनके खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग मामले में चार्जशीट (अभियोजन शिकायत) दाखिल की है।
संपत्ति कुर्की: जांच के दौरान ईडी ने उनकी और अन्य आरोपियों की करोड़ों रुपये की अचल और चल संपत्तियां कुर्क की हैं।
आरोप: उन पर आरोप है कि विशेष भूमि अध्याप्ति अधिकारी (SLAO) के पद पर रहते हुए उन्होंने कृषि भूमि को कागजों में बैकडेट (पिछली तारीख) में ‘अकृषि’ (Non-agriculture) घोषित किया, जिससे सरकारी खजाने को लगभग 162.5 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ।
वर्तमान स्थिति: वर्तमान में वह डोईवाला शुगर मिल के अधिशासी निदेशक के पद पर तैनात हैं, लेकिन उनकी पदोन्नति (जैसे आईएएस के लिए प्रमोशन) इन कानूनी मामलों के कारण रुकी हुई है।



