बिल्लियों के झगड़े में…

शिव प्रसाद सेमवाल

आपको डीएवी कालेज के एक शपथ ग्रहण समारोह का वाकया सुनाता हूं। सहस्त्रधारा रोड देहरादून के एक वेडिंग प्वाइंट में नव निर्वाचित छात्रसंघ पदाधिकारियों ने अपने शपथ ग्रहण समारोह में पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया था। लड़के-लड़कियों की भारी भीड़ थी। उत्साह में कई नेताओं ने जमकर गला साफ किया। श्रोताओं से उन्हें खूब तालियां भी मिली। अब भगत सिंह कोश्यारी के बोलने का नंबर आया तो वह मंच से उठकर डायस तक आए। उन्होंने दाएं हाथ से माइक पकड़ा, बाएं हाथ से नाक पर रखा चश्मा दुरुस्त करते हुए खचाखच भरे हॉल का जायजा लिया और गला खंखारते हुए बोलने की शुरुआत ही कर रहे थे कि उनकी नजर श्रोताओं के पीछे लगे भोजन के काउंटर तक चली गई। इधर कोश्यारी के भाषण की शुरुआत हो रही थी, उधर खाने के बर्तनों से ढक्कन उठने लगे थे। कोश्यारी की पारखी नजरों ने अगले कुछ मिनट बाद होने वाला नजारा पहले ही भांप लिया। उन्होंने सिर्फ दो शब्द कहे,- ”जब राशन सामने हो तो भाषण नहीं देना चाहिए।ÓÓ यह कहते हुए उन्होंने अपना वक्तव्य समाप्त किया और सभी को भोजन ग्रहण करने के लिए कहते हुए माइक छोड़ दिया।
ऐसा ही कुछ वाकया पिछले दिनों रायपुर विधानसभा में होने वाली भाजपा की पर्दाफाश रैली में घटित हुआ। रायपुर के निवर्तमान विधायक उमेश शर्मा काऊ की अगुवाई में होने वाले इस सम्मेलन में पहले तो सब ठीक चल रहा था, लेकिन जैसे ही भुवनचंद्र खंडूड़ी ने माइक संभाला, सारे लोग भाषण छोड़कर राशन की तरफ दौड़ पड़े। दरअसल सम्मेलन में मौजूद कार्यकर्ताओं के पीछे से किसी ने हल्के से कह दिया कि भोजन शुरू हो गया है।
उमेश शर्मा ने मंच से उतरकर झल्लाते हुए कार्यकर्ताओं को भोजन बंद करने के लिए भी कहा, किंतु तब तक रंग में भंग पड़ चुका था। खंडूड़ी माइक छोड़ मौजूदा भीड़ को अनुशासन में रहने की झाड़ पिलाकर बिना किसी से मिले जा चुके थे। खंडूड़ी न तो इस शरारत को भांप पाए, न इस साजिश को संभाल पाए। ये किसने किया, यह अभी भी पार्टी के अंदर चर्चा का विषय बना हुआ है। आखिर कोई तो था, जो या तो उमेश शर्मा की रैली को फ्लॉप करना चाहता था या फिर खंडूड़ी को संबोधन से दूर रखना चाहता था।
सभा सम्मेलनों में परदे के पीछे से होने वाले इशारों पर घटित होने वाली ये शरारतें कोई नई बात नहीं है, किंतु ऐसी घटनाओं से भाजपा के अंदर फूटने वाले बगावत के बुलबुलों की झलक सतह पर दिख जाती है। ६ माह पहले कांग्रेस की सरकार के अस्थिर होने के बाद से भाजपा के पावर सेंटर अपनी धुरी पर काफी अक्षांश तक घूम चुके हैं। शक्तियों के कुछ नए ध्रुव तैयार होने लगे हैं तो कुछ सितारे अपनी ऊर्जा खोकर ब्लैकहोल में तब्दील होने लगे हैं।
आपको याद होगा कि कांग्रेस के विधायकों की बगावत के साथ ही भाजपा आलाकमान ने सतपाल महाराज से लेकर भगत सिंह कोश्यारी को प्रदेश में सरकार बनाने के जुगाड़ भिड़ाने के लिए आगे कर दिया था। भगत सिंह कोश्यारी को तो सरकारी अमले ने भावी मुख्यमंत्री की तरह प्रोटोकॉल देना शुरू कर दिया था, किंतु इस मोर्चे पर असफल होने के बाद प्रदेश में भाजपा की बागडोर उनके हाथों से फिसलकर राष्ट्रीय संगठन मंत्री शिव प्रकाश के हाथों में चली गई है। भाजपा में प्रदेश अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष का पद अल्मोड़ा जिले के भाजपा विधायक अजय भट्ट के हाथों में होने तथा वहीं से सांसद अजय टम्टा के केंद्र में मंत्री बनने के बाद से भगत सिंह कोश्यारी के लिए भविष्य में नेतृत्व संभालने की संभावनाएं क्षीण होती चली गई हैं। इस दौरान उत्तराखंड में तमाम विधानसभाओं की जिलावार होने वाली बैठकों में प्रादेशिक नेताओं को हाशिये पर रख सब कुछ संभाल लेने वाले शिव प्रकाश की सक्रियता बताती है कि वह भाजपा के सत्ता में आने पर मुख्यमंत्री का चेहरा हो सकते हैं।
संभवत: कोश्यारी और कुमाऊं के हाथ में भाजपा की नियंत्रण शक्ति आ जाने और गढ़वाल से खंडूड़ी व निशंक के उपेक्षित हो जाने के कारण भविष्य में भाजपा के अंदर अंतर्कलह बढ़ सकता है। इसी अंतर्कलह को कम करने तथा मैदानी मतदाताओं को रिझाने के नाम पर शिव प्रकाश इस कलह का फायदा उठाने की फिराक में हैं। यदि इस कलह के दूरगामी परिणाम उत्तराखंड के भाजपा नेताओं ने जल्दी नहीं भांपे तो वे भाषण देते रह जाएंगे और राशन कोई और चट कर जाएगा।

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