एक्सक्लूसिव : उत्तराखंड में बंदरों और सुअरों के हवाले खेती-बाड़ी। कृषि निदेशक और सचिव जर्मनी के दौरे पर

देहरादून/पौड़ी गढ़वाल।

उत्तराखंड में खेती-बाड़ी यूं ही चौपट नहीं हुई इसके पीछे हमारे नीति नियंताओं और अफसरों की बेरुखी पूरी तरह जिम्मेदार है। वर्तमान में उत्तराखंड में 13 में से लगभग सात जिलों में मुख्य कृषि अधिकारी तक नहीं हैं।
यह जिम्मेदारी प्रभारियों के कंधों पर है।

हालात यह है कि गढ़वाल मंडल के मुख्यालय पौड़ी में अपर निदेशक तक नहीं है। दिसंबर में रिटायर होने के बाद कोई अपर निदेशक नहीं आए। जबकि पौड़ी मे मुख्य कृषि अधिकारी भी तैनात नहीं है।
इन सब के बाद भी हालत यह है कि उत्तराखंड के कृषि सचिव और कृषि निदेशक जर्मनी के दौरे पर हैं। उत्तराखंड में कृषि और किसानों की भले ही सुध ना हो लेकिन अधिकारियों को विदेश दौरों से फुर्सत नहीं है।

तबादला आदेश के बाद चर्चाओं का दौर

कृषि विभाग में हालिया तबादला आदेश के बाद प्रशासनिक हलकों में चर्चाओं का दौर तेज हो गया है। आदेश के तहत डॉ. विकेश कुमार यादव को पौड़ी से सीधे ऊधम सिंह नगर भेजा गया है, जबकि वहाँ पर पहले से कार्यरत मुख्य कृषि अधिकारी वी.के. सक्सेना को मुख्यालय बुला लिया गया। इस फैसले ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। दरअसल , डॉ. विकेश कुमार यादव पिछले कई वर्षों तक हरिद्वार जैसे सुगम जनपद में तैनात रहे। इसके बाद उन्हें कुछ ही महीनों के लिए पौड़ी गढ़वाल भेजा गया, और उसके बाद कुछ ही महीनों में ही उनका स्थानांतरण पुनः ऊधम सिंह नगर जैसे सुगम जिले में कर दिया गया है। प्रशासनिक हलकों में यह चर्चा है कि लंबे समय तक सुगम क्षेत्र में सेवा देने के बाद कठिन जनपद में स्थिरता आने से पहले ही फिर से सुगम क्षेत्र में वापसी किस आधार पर की गई।
ऐसा ही प्रकरण नैनीताल जिले का है जहाँ पर पहले मुख्य कृषि अधिकारी देहरादून लतिका सिंह को भेजा जाता है और उसके बाद उन्हें भी कुछ महीनों बाद वापस देहरादून कर दिया जाता है जो अपने आप मैं अनोखा मामला है।


पौड़ी गढ़वाल जैसे महत्वपूर्ण और प्रशासनिक दृष्टि से संवेदनशील जिले में मुख्य कृषि अधिकारी का पद अल्प अवधि में खाली होना विभागीय कार्यप्रणाली पर भी प्रश्नचिह्न लगा रहा है। ऐसे तबादलों से यह संदेश जा रहा है कि क्या स्थानांतरण नीति का पालन समान रूप से हो रहा है, या फिर व्यक्तिगत पसंद के आधार पर निर्णय लिए जा रहे हैं।

सूत्रों के अनुसार, डॉ. विकेश कुमार यादव लंबे समय से तबादले के प्रयास में थे। ऐसे में अचानक महत्वपूर्ण माने जाने वाले पौड़ी जैसे जिले से उनका स्थानांतरण और दूसरी ओर ऊधम सिंह नगर में बदलाव को लेकर पारदर्शिता पर प्रश्न उठ रहे हैं। विभागीय जानकारों का कहना है कि “जिसे जहाँ पोस्टिंग चाहिए, वहाँ मिल जाती है”यह धारणा अब खुलकर चर्चा का विषय बन रही है।

पौड़ी गढ़वाल को प्रशासनिक दृष्टि से बेहद अहम जिला माना जाता है, क्योंकि गढ़वाल मंडल का आयुक्तालय भी यहीं स्थित है। ऐसे महत्वपूर्ण जिले में मुख्य कृषि अधिकारी का पद कुछ ही महीनों में खाली हो जाना और फिर नई तैनाती की स्थिति स्पष्ट न होना विभागीय कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है।

इतना ही नहीं, 31 दिसंबर से पौड़ी गढ़वाल में अपर निदेशक (कृषि) का पद भी समाचार लिखे जाने तक रिक्त बताया जा रहा है। इससे योजनाओं के क्रियान्वयन और फील्ड मॉनिटरिंग पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।

इस बीच, कृषि सचिव के विदेश दौरे को लेकर भी चर्चाएं हैं। जानकारी के अनुसार, सचिव कृषि अधिकारियों के साथ जर्मनी गए हुए हैं। इससे पहले दुबई दौरे की भी तैयारी थी, लेकिन अनुमति न मिलने की बात सामने आई थी। विपक्षी स्वर यह सवाल उठा रहे हैं कि जब विभाग में महत्वपूर्ण पद खाली हैं, तब प्राथमिकता क्या होनी चाहिए—विदेशी अध्ययन दौरे या प्रशासनिक स्थिरता?

हालांकि विभाग की ओर से आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। यदि इन तबादलों के पीछे प्रशासनिक या नीतिगत कारण हैं, तो पारदर्शिता के हित में उनका सार्वजनिक होना आवश्यक माना जा रहा है।

अब देखना यह है कि विभाग इन सवालों पर क्या स्पष्टीकरण देता है और क्या रिक्त पदों पर शीघ्र नियुक्ति कर व्यवस्था को स्थिर किया जाता है या नहीं।

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