उत्तराखंड से एक अहम न्यायिक फैसला सामने आया है, जहां उच्च न्यायालय ने वर्ष 1998 के बहुचर्चित डकैती मामले में निचली अदालत के फैसले को निरस्त करते हुए सभी आरोपियों को बरी कर दिया। इस मामले में लंबे समय से सजा काट रहे आरोपियों को राहत देते हुए अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा है।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला उधम सिंह नगर जिले के किच्छा क्षेत्र का है, जहां 22/23 मई 1998 की रात 8–9 लोगों ने एक घर में घुसकर डकैती की वारदात को अंजाम दिया था। आरोपियों ने परिवार को बंधक बनाकर सोने-चांदी के आभूषण लूट लिए थे और इस दौरान एक महिला को भी चोटें आई थीं।
इस घटना के बाद निचली अदालत ने आरोपियों को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 395 (डकैती) और धारा 412 के तहत दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी।
हाईकोर्ट ने क्यों पलटा फैसला?
मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति आशीष नैथानी की एकलपीठ ने पाया कि अभियोजन पक्ष आरोपों को ठोस और विश्वसनीय साक्ष्यों के साथ सिद्ध करने में असफल रहा। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि पहचान प्रक्रिया में गंभीर खामियां थीं, गवाहों के बयानों में कई विरोधाभास सामने आए और प्रस्तुत साक्ष्य इतने मजबूत नहीं थे कि आरोपियों के खिलाफ दोष सिद्ध किया जा सके।
न्यायालय ने यह भी दोहराया कि आपराधिक न्याय प्रणाली का मूल सिद्धांत यही है कि जब तक किसी आरोपी के खिलाफ आरोप संदेह से परे साबित न हो जाएं, तब तक उसे निर्दोष माना जाता है, और इसी सिद्धांत के आधार पर आरोपियों को संदेह का लाभ दिया गया।
हाईकोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि निचली अदालत ने साक्ष्यों का मूल्यांकन अपेक्षित मानकों के अनुसार नहीं किया। ऐसे में आरोपियों को संदेह का लाभ मिलना चाहिए। इन्हीं आधारों पर अदालत ने रजमत खान उर्फ पप्पू, इसरत और कमरुद्दीन समेत सभी आरोपियों को बरी करने का आदेश दिया।




