डॉल्फिन इंस्टीट्यूट में राष्ट्रीय कार्यशाला का शुभारंभ। “जोखिम आकलन के बिना स्कूल सुरक्षा अधूरी” — डॉ. डी. के. असवाल

“राष्ट्रीय स्कूल सुरक्षा फ्रेमवर्क (2019) के अनुरूप संवेदनशील हिमालयी क्षेत्रों में स्कूल रेजिलिएंस को सुदृढ़ करना” विषय पर आधारित देश की अपनी तरह की पहली छह दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला (20–25 अप्रैल 2026) का विधिवत शुभारंभ किया गया। यह महत्वपूर्ण आयोजन अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन (ANRF) एवं यूकोस्ट (UCOST) के सहयोग तथा स्टेट काउंसिल ऑफ एजुकेशनल […]

“राष्ट्रीय स्कूल सुरक्षा फ्रेमवर्क (2019) के अनुरूप संवेदनशील हिमालयी क्षेत्रों में स्कूल रेजिलिएंस को सुदृढ़ करना” विषय पर आधारित देश की अपनी तरह की पहली छह दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला (20–25 अप्रैल 2026) का विधिवत शुभारंभ किया गया।

यह महत्वपूर्ण आयोजन अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन (ANRF) एवं यूकोस्ट (UCOST) के सहयोग तथा स्टेट काउंसिल ऑफ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग (SCERT) उत्तराखण्ड के शैक्षणिक मार्गदर्शन में किया जा रहा है।

मानवीय गतिविधियाँ और आपदाओं का जोखिम

कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि और पद्म भूषण से सम्मानित प्रसिद्ध पर्यावरणविद् डॉ. अनिल जोशी (निदेशक, हेस्को) ने अपने संबोधन में एक गंभीर चेतावनी साझा की।

उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि वर्तमान में हम जिन आपदाओं का सामना कर रहे हैं, उनमें से अधिकांश मानवीय गतिविधियों का प्रत्यक्ष परिणाम हैं। डॉ. जोशी ने हिमालयी पारिस्थितिकी के संरक्षण को प्राथमिक आवश्यकता बताया।

वहीं, मुख्य अतिथि डॉ. दिनेश कुमार असवाल ने ‘हैजार्ड (खतरे) और ‘डिजास्टर’ (आपदा) के बीच के सूक्ष्म अंतर को विस्तार से समझाया। उन्होंने बताया कि खतरे प्राकृतिक और मानवजनित दोनों हो सकते हैं, किंतु जनहानि के पीछे सबसे बड़े कारण मानवजनित कारक जैसे सड़क दुर्घटनाएं, आग और अनियोजित गतिविधियों के कारण आई बाढ़ हैं। उन्होंने प्रभावी जोखिम आकलन और न्यूनीकरण रणनीतियों को भविष्य की सबसे बड़ी मांग बताया।

विज्ञान, तकनीक और जनसहभागिता का संगम

यूकोस्ट के महानिदेशक डॉ. दुर्गेश पंत ने आपदा प्रबंधन के आधुनिक दृष्टिकोण पर प्रकाश डाला। उन्होंने जोर देकर कहा कि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की भूमिका महत्वपूर्ण है, लेकिन बिना जनसहभागिता के कोई भी आपदा प्रबंधन प्रणाली प्रभावी रूप से धरातल पर नहीं उतर सकती।

कन्वीनर डॉ. वर्षा पर्चा ने क्षमता निर्माण पर दिया जोरकार्यशाला की कन्वीनर डॉ. वर्षा पर्चा ने उपस्थित अतिथियों और प्रतिभागियों को कार्यशाला के उद्देश्यों एवं इससे अपेक्षित परिणामों की विस्तृत जानकारी दी ।

उन्होंने विशेष रूप से रेखांकित किया कि:हिमालयी क्षेत्रों की विशिष्ट भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए शिक्षकों व हितधारकों का क्षमता निर्माण (Capacity Building) करना इस कार्यशाला का मुख्य लक्ष्य है ।स्कूलों को आपदा के प्रति ‘रेजिलिएंट’ (लचीला) बनाने के लिए जमीनी स्तर पर प्रशिक्षण अनिवार्य है ।

तकनीकी सत्रों में गहन मंथन कार्यशाला के प्रथम दिन महत्वपूर्ण तकनीकी सत्र आयोजित किए गए:
• डॉ. दिनेश कुमार असवाल ने “पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र में आपदाएं, संवेदनशीलता और स्कूल सुरक्षा” विषय पर विस्तृत व्याख्यान दिया।
• डॉ. श्रवण कुमार ने “राष्ट्रीय स्कूल सुरक्षा फ्रेमवर्क (2019): मुख्य सिद्धांत और राष्ट्रीय सर्वोत्तम अभ्यास” पर चर्चा की।
• इन सत्रों की अध्यक्षता वाडिया इंस्टीट्यूट के पूर्व वैज्ञानिक प्रो. एस.के. पर्चा ने की।

संस्थान की निदेशक डॉ. शैलजा पंत ने स्वागत उद्बोधन में कार्यशाला की प्रासंगिकता को रेखांकित करते हुए कहा कि हिमालयी राज्यों के लिए यह मॉडल भविष्य की नीति-निर्माण में मील का पत्थर साबित होगा। इस कार्यशाला में प्रदेश के विभिन्न जनपदों से आए 50 से अधिक शिक्षक सक्रिय रूप से प्रतिभाग कर रहे हैं।
कार्यक्रम का कुशल संचालन डॉ. हिमानी डंगवाल द्वारा किया गया और अंत में डॉ. आशीष रतूड़ी ने सभी अतिथियों का धन्यवाद ज्ञापित किया। इस अवसर पर डॉ. रीमा पंत, श्री प्रह्लाद अधिकारी, डॉ. ज्ञानेंद्र अवस्थी, डॉ. विधित त्यागी और संस्थान के अन्य वरिष्ठ संकाय सदस्य एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे।
त्यागी सहित संस्थान के अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे ।

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