दारू बेचने वाले पर दरियादिली, दूध बेचने वाले को दुत्कार — क्या यही है हमारा सत्कार?

उत्तरकाशी।6 मई 2026

रिपोर्ट -नीरज उत्तराखंडी

हमारे समाज में एक अजीब विडंबना देखने को मिलती है—जहाँ एक ओर रोज़मर्रा की ज़रूरतें पूरी करने वाले मेहनतकश लोगों के साथ उपेक्षा और कठोरता का व्यवहार होता है, वहीं दूसरी ओर हानिकारक आदतों को बढ़ावा देने वाले व्यवसायों के प्रति हम असामान्य उदारता दिखाते हैं।

यह केवल आर्थिक व्यवहार का सवाल नहीं, बल्कि हमारी सामाजिक मानसिकता और प्राथमिकताओं का आईना भी है।

दूधवाला हर सुबह बिना नागा किए, ठंड-गर्मी-बरसात की परवाह किए बिना, घर-घर दूध पहुँचाता है। वह केवल एक उत्पाद नहीं, बल्कि भरोसा और नियमितता भी देता है। महीने भर की मेहनत के बाद जब हिसाब-किताब का समय आता है, तो अक्सर उसे तानों और बहानों का सामना करना पड़ता है—“आज दूध पतला था”, “कल दूध फट गया”, “इतने दिन तो तुम आए ही नहीं”।

कई बार बिना ठोस आधार के उसकी मेहनत का मूल्य काट लिया जाता है। यही स्थिति अख़बार बाँटने वाले हाकर की भी है, जो समाज को रोज़ाना जानकारी और जागरूकता से जोड़ता है, परंतु भुगतान के समय उसे भी अनावश्यक सवालों और कटौतियों का सामना करना पड़ता है।

इसके विपरीत, शराब की दुकान पर ग्राहक स्वयं जाता है। वहाँ न तो मोलभाव होता है, न गुणवत्ता पर सवाल उठाए जाते हैं। कई बार निर्धारित मूल्य से अधिक पैसा भी दे दिया जाता है, और ग्राहक बिना किसी आपत्ति के लौट आता है।

यह व्यवहार केवल खरीद-बिक्री का नहीं, बल्कि हमारी प्राथमिकताओं का संकेत है—जहाँ आवश्यकता से अधिक इच्छा को महत्व मिल रहा है, और सेवा से अधिक लत को सम्मान।

यह असंतुलन केवल आर्थिक नहीं, नैतिक भी है। दूधवाला और अख़बार वाला समाज के निर्माण में सकारात्मक भूमिका निभाते हैं—एक स्वास्थ्य से जुड़ा है, दूसरा ज्ञान से।

इसके बावजूद उन्हें वह सम्मान और उचित पारिश्रमिक नहीं मिलता जिसके वे हकदार हैं। वहीं, शराब जैसे उत्पाद, जो कई सामाजिक और स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बनते हैं, उनके प्रति हमारा रवैया अपेक्षाकृत नरम और उदार होता है।

इस प्रवृत्ति के पीछे कई कारण हो सकते हैं। एक कारण यह है कि हम आवश्यक सेवाओं को ‘स्वाभाविक’ मान लेते हैं, जैसे वे हमारे अधिकार हों, जबकि उनके पीछे की मेहनत को नजरअंदाज कर देते हैं। दूसरी ओर, शराब जैसी चीज़ें ‘विलासिता’ की श्रेणी में आती हैं, जिन पर खर्च करते समय हम कम सवाल करते हैं, क्योंकि वह हमारी इच्छा से जुड़ी होती है, न कि मजबूरी से।

लेकिन यह सोच लंबे समय में समाज के लिए हानिकारक है। यदि हम ईमानदार मेहनत करने वालों का सम्मान नहीं करेंगे, तो यह असमानता और असंतोष को जन्म देगी। हमें अपने व्यवहार में बदलाव लाने की जरूरत है—जो व्यक्ति रोज़ हमारे दरवाजे तक सेवा लेकर आता है, उसे उचित सम्मान और पारिश्रमिक मिलना चाहिए। हिसाब करते समय ईमानदारी और संवेदनशीलता दोनों आवश्यक हैं।

समाज की सच्ची प्रगति तभी संभव है, जब हम अपनी प्राथमिकताओं को सही दिशा दें। हमें यह समझना होगा कि सम्मान केवल पैसे से नहीं, बल्कि व्यवहार से भी झलकता है। दूधवाला, अख़बार वाला, सब्जीवाला—ये सभी हमारे जीवन की आधारशिला हैं। इनके साथ न्यायपूर्ण और सम्मानजनक व्यवहार करना ही सच्चा सत्कार है।

अंततः सवाल यह नहीं है कि हम कहाँ पैसा खर्च करते हैं, बल्कि यह है कि हम किसे कितना सम्मान देते हैं। अगर हम इस असंतुलन को नहीं समझेंगे, तो समाज में मूल्य और नैतिकता का संतुलन बिगड़ता जाएगा। समय आ गया है कि हम अपनी सोच बदलें—और उस मेहनत का सम्मान करें, जो चुपचाप हमारे जीवन को आसान बनाती है।

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