बागेश्वर से राजकुमार सिंह परिहार रिपोर्ट
‘कागजी विकास’ का सनसनीखेज खेल: एक ही मोटर मार्ग पर दो विभागों ने खोल दी तिजोरी, 2021 से 2026 के बीच ₹452.32 लाख फूंकने के बाद अब फिर ₹704.10 लाख की बंदरबांट की तैयारी; जिला प्रशासन मौन, क्षेत्रीय विधायक लापता!
पहाड़ के दुर्गम इलाकों में सड़कें बनें न बनें, लेकिन सरकारी फाइलों में बजट की ऐसी एक्सप्रेस-वे दौड़ती है कि देखने वाले दंग रह जाएं। कपकोट विधानसभा क्षेत्र से एक ऐसा ही सनसनीखेज और हास्यास्पद मामला सामने आया है, जिसने सूबे की ‘जीरो टॉलरेंस’ सरकार, जिला प्रशासन और स्थानीय जनप्रतिनिधि की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं।
उत्तराखंड में ‘जीरो टॉलरेंस’ और ‘डबल इंजन’ विकास के दावों की धज्जियां उड़ाता हुआ एक ऐसा प्रशासनिक चमत्कार सामने आया है, जिसे सुनकर आम जनता का सिर चकरा जाए।
कपकोट विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत करमी-बघर-ढोक्टीगांव मोटर मार्ग पर एक ऐसा सुनियोजित और गंभीर वित्तीय घालमेल (या कहें तो खुला डाका) प्रकाश में आया है, जिसने जिला प्रशासन की सतर्कता, लोक निर्माण विभाग (PWD) की ईमानदारी और क्षेत्र के राजनीतिक नेतृत्व की नीयत को पूरी तरह कटघरे में खड़ा कर दिया है।
सरकारी धन को पानी की तरह बहाकर बंदरबांट करने का यह अपनी तरह का पहला और सबसे अनोखा मामला है, जहाँ संपत्ति किसी और विभाग की है और उस पर करोड़ों का टेंडर कोई और विभाग छोड़ रहा है।इस सड़क पर नियमों को ताक पर रखकर जो ‘प्रशासनिक जादूगरी’ दिखाई गई है, वह किसी बड़े घोटाले की ओर इशारा कर रही है।
‘माल महाराज का, मिर्जा खेले होली’
दस्तावेजी साक्ष्यों के अनुसार, यह मोटर मार्ग वर्तमान समय में लोक निर्माण विभाग (PWD) कपकोट के पूर्ण स्वामित्व और नियंत्रण में है।
पहला चरण (PWD की मेहरबानी): साल 2021 से लेकर वर्ष 2026 तक PWD कपकोट इस सड़क के निर्माण, सुदृढ़ीकरण और रखरखाव के नाम पर सरकारी खजाने से ₹452.32 लाख (साढ़े चार करोड़ से अधिक) की भारी-भरकम धनराशि खर्च कर चुका है।
दूसरा चरण (PMGSY का अवैध दखल): नियम और कानून की स्थापित व्यवस्था कहती है कि जब तक कोई सड़क PWD से आधिकारिक रूप से हस्तांतरित (Transfer) होकर दूसरे विभाग को नहीं सौंपी जाती, तब तक उस पर एक धेला भी खर्च नहीं किया जा सकता। लेकिन, नियमों को ठेंगे पर रखते हुए 9 जुलाई 2026 को PMGSY (प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना) ने इसी सड़क पर ₹704.10 लाख (सात करोड़ से अधिक) का एक नया टेंडर जारी कर दिया!
बड़ा सवाल: जब इस सड़क का स्वामित्व PWD के पास है, तो PMGSY ने किस कानून, किस वित्तीय अधिकार और किसकी शह पर यह टेंडर जारी किया? क्या यह सीधे तौर पर एक ही सड़क पर दोबारा बजट ठिकाने लगाने का ‘कागजी सिंडिकेट’ है?
जिला प्रशासन की ‘रहस्यमयी आंखमिंचौली’: फाइलों में विकास, धरातल पर विनाश
इस पूरे मामले ने बागेश्वर जिला प्रशासन की कार्यशैली को बेनकाब कर दिया है।
कहाँ सोई थी विजिलेंस और ऑडिट टीम? करोड़ों रुपए के टेंडर बिना किसी कानूनी हस्तांतरण और बिना क्रॉस-वेरिफिकेशन के कैसे स्वीकृत हो गए?
प्रशासनिक शह की बू: क्या जिलाधिकारी और जिले के आला वित्तीय अधिकारियों की नाक के नीचे चल रहे इस खेल को ‘लिपिकीय त्रुटि’ कहकर दबाने की कोशिश की जाएगी? या फिर विभागों के बीच मचे इस ‘लूट खसोट’ के तमाशे को प्रशासन का मूक संरक्षण प्राप्त है? जनता जानना चाहती है कि आखिर जिला प्रशासन की जवाबदेही कब तय होगी?
क्षेत्रीय विधायक का ‘मौन व्रत’: जनता त्रस्त, माननीय मस्त!
इस महा-घपले का सबसे दुर्भाग्यपूर्ण पहलू क्षेत्र के माननीय विधायक की रहस्यमयी चुप्पी है। चुनाव के वक्त गांवों की खाक छानने वाले और हर छोटी सड़क का फीता काटने पहुंचने वाले विधायक जी इस ₹11.56 करोड़ के ‘अदृश्य विकास’ पर पूरी तरह भूमिगत हैं।
जनता का तीखा सवाल: क्या माननीय विधायक जी को अपने ही क्षेत्र में चल रहे इस समानांतर टेंडर घोटाले की भनक तक नहीं है? या फिर इस समूचे खेल के पीछे राजनीतिक शह काम कर रही है?
खोखले वादे: एक तरफ ग्रामीण आज भी बदहाल, उखड़ी और जानलेवा सड़क पर चलने को मजबूर हैं, और दूसरी तरफ माननीय की नाक के नीचे अफसरशाही बजट को डकारने का नया रिकॉर्ड बना रही है।
उच्च स्तरीय जांच या फिर आंदोलन?
यह डबल इंजन सरकार का कैसा ‘ट्रिपल इंजन’ विकास है, जहाँ सड़क एक है, लेकिन उसे खोदने और बजट बांटने वाले दावेदार अनेक हैं?
यह सिर्फ एक तकनीकी खामी नहीं, बल्कि जनता के टैक्स के पैसे पर सरेआम डाका है। एक ही सड़क को सोने की अंडा देने वाली मुर्गी बना दिया गया है, जिसे PWD और PMGSY मिलकर बारी-बारी से दुह रहे हैं।
यदि इस मामले की तुरंत विजिलेंस या उच्च स्तरीय न्यायिक जांच नहीं बैठाई गई, तो यह साफ हो जाएगा कि कपकोट में विकास सिर्फ और सिर्फ कागजों और अफसरों की तिजोरियों तक सीमित रह गया है। जनता अब इस ‘कागजी स्वर्ग’ का हिसाब सड़क पर उतरकर मांगने को तैयार है।
यह सीधे तौर पर जनता के टैक्स के पैसे की बर्बादी और सरेआम प्रशासनिक डकैती है। अगर इस मामले की उच्च स्तरीय जांच नहीं हुई, तो यह साफ हो जाएगा कि कपकोट में विकास के नाम पर सिर्फ ‘टेंडर-टेंडर’ का खेल खेला जा रहा है, जिसमें अफसरशाही और सफेदपोशों की जुगलबंदी साफ नजर आ रही है।






