हाई कोर्ट से सरकार को तगड़ा झटका : छात्रवृत्ति मामले में शंखधर को जमानत ! एसआईटी को लताड़

कमल जगाती, नैनीताल
 उत्तराखण्ड में हरिद्वार स्थित सिडकुल के बहुचर्चित छात्रवृत्ति घोटाले में आरोपी अनुराग शंखधर की जमानत(बेल) याचिका को सुनते हुए उच्च न्यायालय ने बेल दे दी है । घटना के अध्यन के बाद न्यायालय ने कहा कि आरोपी अनुराग ने एस.सी., एस.टी. छात्रों के लिए लिस्ट बनाई ही नहीं है और उन्होंने हरिद्वार के समाज कल्याण विभाग का मुखिया होने के नाते 15 जुलाई 2006 के शासनादेशानुसार छात्रवृत्ति संबंधित अधिकारियों/विभागों को भेज दी थी ।
          न्यायमूर्ति आर.सी.खुल्बे की एकलपीठ ने आज अनुराग के मामले में जमानत याचिका को सुनते हुए कहा कि अनुराग के खिलाफ प्रथम दृष्टिया कोई साक्ष्य रिकॉर्ड में नहीं आया है । उन्होंने ये भी कहा कि अनुराग के खिलाफ छात्रवृत्ति गबन अथवा उसे अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करने का कोई साक्ष्य न्यायालय में पेश नहीं किया गया है।
न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि अनुराग सरकारी नौकरी में है और उसके भागने या फरार होने की कोई संभावना नहीं है, वो तो 18 मई 2019 से जेल में बन्द है।  नैनीताल हाई कोर्ट ने एसआईटी द्वारा गलत तथ्यों के आधार पर जेल भेजे गए तत्कालीन जिला समाज कल्याण अधिकारी हरिद्वार को जेल से रिहा करने के निर्देश दिए थे। नैनीताल हाईकोर्ट के न्यायधीश आरसी खुल्बे ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि एसआईटी के द्वारा शासनादेशों की गलत व्याख्या कर अनुराग शंखधर को जेल भेजा गया है।
       इससे पहले छात्रवृत्ति घोटाले की जांच कर रहे एस.आई.टी.के दोनों जांच अधिकारी आई.जी.संजय गुंज्याल और टी.सी.मंजूनाथ को 11 अगस्त को व्यक्तिगत रूप से उच्च न्यायालय की खण्डपीठ में पेश होने के आदेश दिए गए थे।
माननीय न्यायधीश द्वारा मुख्य सचिव उत्तराखंड शासन उत्पल कुमार सिंह तथा अपर मुख्य सचिव डॉक्टर रणवीर सिंह के माननीय उच्च न्यायालय में दाखिल किए गए शपथ पत्रों का जिक्र करते हुए स्पष्ट किया है कि शासन आदेशों के अनुसार छात्रवृत्ति की धनराशि संबंधित कॉलेजों के प्रधानाचार्य को ही प्रेषित की जानी थी और अनुराग शंखधर ने यह छात्रवृत्ति नियमानुसार ही प्रेषित की है।
 एसआईटी ने दूसरा आरोप अनुराग शंकर पर यह लगाया था कि उन्होंने एडीओ पर दबाव डालकर सत्यापन कराया।
 माननीय न्यायधीश ने इन आरोपों पर एसआईटी को लताड़ लगाते हुए आदेश दिए कि फील्ड कार्मिकों (एडीओ) का दायित्व सत्यापन करना था इसके लिए तथा तत्कालीन समाज कल्याण अधिकारी को दोषी ठहराया जाना किसी भी दशा में उचित नहीं है।
 इसके अतिरिक्त न्यायालय द्वारा तत्कालीन समाज कल्याण अधिकारी पर एसआईटी के द्वारा इन आरोपों को भी नकार दिया गया कि उनके द्वारा कॉलेजों के साथ सांठगांठ करके छात्रवृत्ति की धनराशि कॉलेजों को भेजी गई थी।
        मामले के अनुसार राज्य आंदोलनकारी रविन्द्र जुगरान ने जनहित याचिका दायर कर कहा था कि समाज कल्याण विभाग द्वारा वर्ष 2003 से अब तक अनुसूचित जाति व जनजाति के छात्रों का छात्रवृत्ति का पैसा नहीं दिया है।
इससे स्पष्ट होता है कि 2003 से अब तक विभाग द्वारा करोड़ों रूपये का घोटाला किया गया है, जबकि 2017 में इसकी जांच के लिए पुर्व मुख्यमन्त्री द्वारा एस.आई.टी.का गठन किया गया था। तीन माह के भीतर जांच पूरी करने को भी कहा था, परन्तु इस पर आगे की कोई कार्यवाही नही हो सकी थी। याचिकाकर्ता का यह भी कहना था कि इस मामले में सी.बी.आई.जांच की जानी चाहिए। जनहित याचिका की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन और न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खण्डपीठ में चल रही है।

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