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गुड न्यूज : प्राइवेट मेडिकल काॅलेज से एमडी एमएस करने वालों के लिए बाॅण्ड जरूरी

प्राइवेट मेडिकल काॅलेज से एमडी एमएस
करने वालों के लिए बाॅण्ड जरूरी
 बाॅण्ड की शर्तों का पालन होने पर उत्तराखण्ड के दूरस्थ पहाड़ी क्षेत्रों को मिल सकते हैं डाॅक्टर
उत्तराखण्ड के हिमालयन इंस्टीट्यूट आॅफ मेडिकल साइंसेज़ जौलीग्रांट व श्री गुरु राम राय इंस्टीट्यूट आॅफ मेडिकल एण्ड हेल्थ साइंसेज़, पटेल नगर देहरादून के स्नातक व परास्नातक मेडिकल छात्र-छात्राओं को कम फीस पर पढ़ने के एवज में अनिवार्य रूप से बाॅड भरना होगा। बाॅण्ड में छात्र-छात्राओं को यह शपथ लेनी होगी कि वे कोर्स पूरा होने के बाद उत्तराखण्ड के दुर्गम व अति दुर्गम क्षेत्रों में तीन साल तक अनिवार्य सेवाएं देंगे, तभी उनको फीस में रियायत दी जाएगी। बाॅण्ड न भरने पर दोनों विश्वविद्यालयों व राज्य सरकार द्वारा तय की गई फीस देनी होगी।
काबिलेगौर है कि पिछले तीन सालों से हिमालयन मेडिकल काॅलेज व श्री गुरु राम राय इंस्टीट्यूट आॅफ मेडिकल एण्ड हेल्थ साइंसेज़ में उचित फीस तय न हो पाने के कारण मेडिकल छात्र-छात्राएं शपथपत्र के आधार पर ही पढ़ाई कर रहे थे। इनमें से कई छात्र-छात्राएं जल्द ही अपने-अपने कोर्स पूरा करने वाले हैं। राज्य सरकार द्वारा सन 2012 की फीस पर ही एडमिशन कराए गए, जबकि 2016 में नीट के बाद देशभर के मेडिकल काॅलेजों की फीस लगभग तीन गुना बढ़ गई, उत्तराखण्ड में अफसरशाही की नाकामी व अराजकता के कारण काउंसलिंग से पहले तीन सालों तक फीस तय ही नहीं की गई, और छात्रों से इस आश्य का शपथपत्र लिया गया कि अगर युनिवर्सिटी फीस तय करती है, तो छात्रों को वो फीस देनी होगी। राज्य सरकार की पूर्व फीस कमेटी व अपीलीय प्राधिकरण अयोग्य करार दिया गया है।

प्रदीप दत्ता व राज्य सरकार के मामले में नैनीताल हाईकोर्ट ने साफ कहा है कि राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट की अवहेलना की है। राज्य सरकार खुद जज नियुक्त नहीं कर सकती है। हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश किसी होईकोर्ट के न्यायाधीश को फीस कमेटी का चेयरमैन नियुक्त करेंगे, इसके अलावा न्याय सचिव, चिकित्सा सचिव, उच्च शिक्षा सचिव, पूर्व कुलपति, दो शिक्षाविद व चार्टेड एकाउंटेंट शामिल होंगे। अब इस कमेटी का गठन हो चुका है। यहां प्रासांगिक होगा कि उत्तराखण्ड में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली व दुर्दशा किसी से छिपी नहीं है।

उत्तराखण्ड से बाहर के छात्र फायदा उठाने के लिए प्रवेश के समय कुछ भी शपथपत्र भर लेते हैं कि जो भी फीस तय होगी वो उनको मान्य होगी, लेकिन बाद में काॅलेज व सरकार पर अनावश्यक दबाव डालते हैं यहां के दोनों निजी काॅलेजों हिमालयन इंस्टीट्यूट व श्री गुरु राय राय इंस्टीट्यूट काॅलेज की फीस देशभर के अन्य काॅलेजों से बहुत कम है, सबसे कम है। यहां के संसाधनों का उपयोग करके बिना दुर्गम क्षेत्रों में सेवा दिए कम फीस में पढ़ना यहां के पहाड़ी गरीब लोगों के साथ छलावा है, अन्याय है। लेकिन अब यह निर्णय अच्छा है कि कम फीस में पढ़ने वाले तीन साल का बाॅण्ड भरेंगे, ताकि यहां की स्वास्थ्य सेवाओं को बल मिल सके।
बाॅण्ड भरने के बावजूद बढ़ी फीस का विरोध करने वाले छात्रों के लिए यह एक जबरदस्त झटका होगा। काबिलेगौर है कि काउंसलिंग के समय सभी छात्र देशभर के सभी काॅलेजों की फीस व व्यवस्था देखकर ही यह निर्णय लेते हैं कि उन्हें किस काॅॅलेज में एडमिशन लेना है। राज्य सरकार ने व निजी काॅलेजों ने प्रवेश देते समय साफ कहा था कि ये फीस बहुत कम है और इसका बढ़ना तय है, उस समय छात्र भी सहमत हुए और अपनी सहमति का शपथपत्र भी दे दिया। उत्तराखण्ड के निजी काॅलेजों में फीस बढ़ने के बावजूद अन्य राज्यों के मेडिकल काॅलेजों की तुलना में काफी कम है। कमजोर आर्थिक स्थिति वाले छात्रों को बैंकों से आसानी से ऋण मिल जाता है, क्योंकि पढ़ाई पूरी करने के बाद उनको लाखों का पैकेज मिलना तय होता है, और कोई ऋण नहीं लेना चाहता है तो उनको काॅलेजों ने उत्तराखण्ड की तीन साल का विकल्प देकर बहुत ही सही निर्णय लिया है।

बाॅण्ड भरने वालों का सही डाटा नहीं है
राज्य गठन के बाद से जिन छात्र-छात्राओं ने कम फीस पर उत्तराखण्ड में मेडिकल की पढ़ाई की है, इनकी तादाद तो अच्छी खासी है। बाॅण्ड भरने वालों की संख्या भी काफी है लेकिन बाॅण्ड की शर्तें पूरा न करने वाले डाॅक्टरों की संख्या कितनी है, बाॅण्ड की शर्तों को पूरा न करने पर क्यों उन पर कड़ाई से कार्यवाही नहीं हो पाई। इन सभी बातों से कहीं न कहीं राज्य को भारी क्षति पहुंची।

पहाड़ी क्षेत्रों को डाॅक्टर की आवश्यकता
बाॅण्ड भरने में भी कई बड़े खेल हैं। एडमिशन लेने के समय छात्र-छात्राओं ने पूर्व में भी बाॅण्ड भरे और कोर्स पूरा होने के बाद यह परिस्थिति दिखा दी कि वे दूरस्थ क्षेत्रों मे सेवाएं नहीं दे सकते। हां खानापूर्ति के लिए उन्होंने बाॅण्ड की शर्तों की अवहेलना के एवज में कुछ पैसा जरूर जमा करवा दिया। लेकिन यह पैसा पहाड़ी क्षेत्रों में डाॅक्टरों की कमी को पूरा करने के लिए नाकाफी रहा। जो भी छात्र बाॅण्ड भरे उसे पूरा करने के लिए नियम व कायदे इतने कड़े हों कि या तो वे अनिवार्य रूप से दूरस्थ क्षेत्रों में अपनी सेवाएं दें या उन्हें प्राईवेट सीट के लिए निर्धारित फीस के सापेक्ष पूरी फीस जमा करनी पड़े जिसका लाभ अन्य जरूरतमंद छात्र को दिया जा सके।

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