इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्ट: एक ही ‘सीनियरिटी’ पर दो बार नौकरी? उत्तराखंड फार्मासिस्ट भर्ती में बड़ा खेल!

​देहरादून। उत्तराखंड के राजकीय मेडिकल कॉलेजों में फार्मासिस्टों की भर्ती प्रक्रिया पर एक गंभीर घोटाला और अदालती आदेशों की अवमानना का साया मंडरा रहा है। मामला ‘एक बार सीनियरिटी का लाभ’ के नियम को ताक पर रखकर, पहले से सरकारी नौकरी में बैठे लोगों को दोबारा मलाईदार पदों पर नियुक्ति देने से जुड़ा है।

इस पूरे खेल ने प्रदेश के हजारों योग्य और ओवरएज हो रहे बेरोजगार डिप्लोमा फार्मासिस्टों के भविष्य को अंधकार में धकेल दिया है। ​आइए सिलसिलेवार ढंग से समझते हैं कि नियमों को कैसे ठेंगा दिखाया गया और कैसे माननीय उच्च न्यायालय (नैनीताल) के आदेशों की कथित रूप से धज्जियां उड़ाई गईं।

क्या है पूरा विवाद?

​उत्तराखंड चिकित्सा सेवा चयन बोर्ड द्वारा 19 अक्टूबर 2024 को राजकीय मेडिकल कॉलेजों में फार्मासिस्ट के 73 रिक्त पदों पर भर्ती के लिए विज्ञापन जारी किया गया था। इस भर्ती का आधार ‘सीनियरिटी’ (वर्षवार योग्यता) को बनाया गया था।

​नियम क्या था? विज्ञापन के बिंदु संख्या 7 में स्पष्ट शर्त थी कि अभ्यर्थियों को माननीय उच्च न्यायालय नैनीताल द्वारा रिट याचिका संख्या 2129/2016 (रंजन कुमार पाल बनाम उत्तराखंड राज्य) में पारित आदेश (दिनांक 09.12.2016) के तहत एलोपैथ या पशुपालन विभाग में फार्मासिस्ट के पद पर केवल एक ही बार सीनियरिटी का लाभ मिलेगा।

खेल कहाँ हुआ? आरोप है कि 17 जनवरी 2026 को जब अंतिम चयन परिणाम जारी हुआ, तो उसमें पशुपालन विभाग में पहले से (लगभग 5 माह पूर्व) सीनियरिटी के आधार पर नियुक्त और कार्यरत फार्मासिस्टों का नाम दोबारा शामिल कर लिया गया।

कोर्ट के आदेश को किया गया ‘बायपास’

​इस विसंगति के खिलाफ बेरोजगार प्रशिक्षित फार्मासिस्ट संघ के गढ़वाल मंडल उपाध्यक्ष दिनेश कुमार शाह और अन्य अभ्यर्थियों ने पहले विभागीय अधिकारियों को अवगत कराया। कोई कार्रवाई न होने पर उन्होंने माननीय उच्च न्यायालय नैनीताल में अपील दायर की।

​हाईकोर्ट का कड़ा रुख (13 फरवरी 2026): माननीय उच्च न्यायालय ने रिट पिटीशन WPSS No. 403 of 2026 में निर्णय देते हुए प्रार्थी को 10 दिनों के भीतर संबंधित विभाग को प्रत्यावेदन देने और संबंधित विभाग को 4 सप्ताह के भीतर इसका निस्तारण (समाधान) करने का आदेश दिया था।

​विभाग की लापरवाही और वीआईपी आयोजन: विभाग ने कोर्ट की तय समय सीमा में इस गंभीर शिकायत का कोई न्यायसंगत निस्तारण नहीं किया। इसके विपरीत, 14 मई 2026 को मुख्यमंत्री आवास पर आयोजित एक बड़े कार्यक्रम में माननीय मुख्यमंत्री, स्वास्थ्य मंत्री और अन्य दिग्गजों की मौजूदगी में उन्हीं विवादित फार्मासिस्टों को दोबारा नियुक्ति पत्र सौंप दिए गए।

इन्वेस्टिगेशन के मुख्य बिंदु और सुलगते सवाल

​इस मामले में खोजी दृष्टि से देखने पर कई बड़ी कमियां और नियमों का उल्लंघन साफ नजर आता है,जांच का बिंदु जमीनी हकीकत / विसंगति-

01 मूल विभाग से NOC का गायब होना नियमतः सरकारी सेवा में रहते हुए दूसरी सरकारी नौकरी के लिए मूल विभाग से अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) अनिवार्य है। ‘हिंदुस्तान’ अखबार के मुताबिक, इन अभ्यर्थियों ने मूल विभाग (पशुपालन) से NOC ली ही नहीं और नियुक्ति पत्र ले लिए।

02 पदों का ब्लॉक होना (Double Occupancy): पशुपालन विभाग के निदेशक डॉ. उदय शंकर दत्त के अनुसार, ये कर्मचारी अभी भी वहां सेवाएं दे रहे हैं। यानी ये तकनीकी रूप से एक साथ दो विभागों में पद घेरे हुए हैं, जिससे बेरोजगारों के अवसर पूरी तरह खत्म हो गए।

03 ‘वेटिंग लिस्ट’ (प्रतीक्षारत सूची) की अनदेखी: यदि पहले से कार्यरत फार्मासिस्टों को इस सूची से बाहर किया जाता, तो चयन बोर्ड की नियमावली के अनुसार प्रतीक्षारत बेरोजगार फार्मासिस्टों को मौका मिलता, जिनकी उम्र सीमा (Age Limit) अब समाप्त होने की कगार पर है।

जिम्मेदार अधिकारियों के गोलमोल बयान

​इस पूरे मामले पर जब मीडिया और जांच के दबाव में अधिकारियों से बात की गई, तो उनके बयानों में स्पष्ट विरोधाभास दिखा:

​”चयनित पशुपालन विभाग के फार्मासिस्ट एनओसी नहीं लाए हैं। यह मामला कोर्ट में विचाराधीन है। अब कोर्ट के आदेश के अनुसार ही कार्रवाई होगी।”
— डॉ. अजय आर्य, निदेशक-चिकित्सा शिक्षा, उत्तराखंड

​”किसी नियुक्ति प्रक्रिया में शामिल होने से पूर्व एनओसी लेना अनिवार्य है। यदि बिना एनओसी के चयन हुआ है तो कार्रवाई की जाएगी। अभी मामला जांच के अधीन है।”
— डॉ. उदय शंकर दत्त, निदेशक-पशुपालन, उत्तराखंड

बेरोजगारों के हक पर डाका और प्रशासनिक सांठगांठ!

​यह मामला सीधे तौर पर उत्तराखंड के प्रशासनिक अमले की घोर लापरवाही या फिर किसी सोची-समझी ‘धांधली’ की ओर इशारा करता है।​जब विज्ञापन की शर्तों और हाईकोर्ट के पुराने आदेश में साफ लिखा था कि सीनियरिटी का लाभ केवल एक बार मिलेगा, तो चयन बोर्ड ने स्क्रूटनी (दस्तावेज सत्यापन) के वक्त इन 5-6 पहले से कार्यरत फार्मासिस्टों को बाहर क्यों नहीं किया?

​कोर्ट ने जब 4 हफ्ते में निस्तारण का आदेश दिया था, तो बिना विवाद सुलझाए जल्दबाजी में 14 मई को मुख्यमंत्री के हाथों नियुक्ति पत्र क्यों बंटवाए गए?

​बेरोजगारों की मांग: पीड़ित बेरोजगार फार्मासिस्टों की मांग पूरी तरह न्यायसंगत है कि पशुपालन विभाग में कार्यरत फार्मासिस्टों के नाम तत्काल इस सूची से पृथक किए जाएं, उनकी नियुक्तियां रद्द हों और वेटिंग लिस्ट में पड़े योग्य, बेरोजगार युवाओं को रोजगार देकर न्याय किया जाए। यदि ऐसा नहीं होता है, तो यह प्रदेश के युवाओं के साथ एक क्रूर मजाक साबित होगा। ​इस मामले पर आगे की अदालती कार्रवाई और विभागीय जांच रिपोर्ट पर हमारी पैनी नजर बनी रहेगी।

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