उत्तरकाशी, 28 मई 2026। नीरज उत्तराखंडी
उत्तरकाशी जिले के डुंडा ब्लॉक स्थित भराण गांव में गंगा दशहरा के अवसर पर आयोजित पारंपरिक धार्मिक यात्रा इस बार सामाजिक भेदभाव के आरोपों के कारण विवादों में घिर गई है।
गांव के आराध्य देव सोमेश्वर देवता की देव डोली को गंगोत्री धाम ले जाने की सदियों पुरानी परंपरा के दौरान दलित समाज के लोगों ने उनके साथ भेदभाव किए जाने का आरोप लगाया है। मामले ने अब सामाजिक और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर गंभीर रूप ले लिया है।
बताया जा रहा है कि भराण गांव में प्रत्येक वर्ष गंगा दशहरा पर्व पर सोमेश्वर देवता की देव डोली श्रद्धालुओं के साथ गंगोत्री धाम ले जाई जाती है। इस धार्मिक यात्रा में गांव के सभी समुदायों की भागीदारी रही है।
ग्रामीणों के अनुसार आयोजन के लिए प्रत्येक परिवार से लगभग चार सौ रुपये सहयोग राशि ली जा रही थी। आरोप है कि जब दलित समाज के लोग सहयोग राशि देने पहुंचे तो कुछ लोगों ने उनसे राशि लेने से इनकार कर दिया और कहा कि वे मुख्य यात्रा का हिस्सा नहीं बन सकते तथा अपनी डोली अलग से लेकर जाएं।
इस कथित व्यवहार से दलित समाज में भारी आक्रोश फैल गया। नाराज ग्रामीण न्यायिक सहायता लेने के लिए जिला मुख्यालय उत्तरकाशी पहुंचे और अधिवक्ताओं से मुलाकात कर कानूनी कार्रवाई की मांग की। ग्रामीणों का कहना है कि धार्मिक आयोजनों में इस प्रकार का व्यवहार संविधान प्रदत्त समानता के अधिकार और सामाजिक न्याय की भावना के विपरीत है।
न्यायालय परिसर पहुंचे मनोज कुमार, गोरख लाल, चमन लाल, चैत लाल, विशु लाल, जीत लाल, लक्ष्मी लाल, प्यारे लाल, नत्थी लाल और चतर लाल ने कहा कि आधुनिक समाज में भी इस तरह का जातीय भेदभाव बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और चिंताजनक है। उनका कहना था कि देवभूमि उत्तराखंड अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं के लिए जानी जाती है, लेकिन कुछ लोग सामाजिक विभाजन पैदा कर इस विरासत को कमजोर कर रहे हैं।
ग्रामीणों ने बताया कि 25 मई को देव डोली को गंगोत्री यात्रा में शामिल करने को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ, जिसके बाद गांव में तनाव का माहौल बन गया। स्थिति को देखते हुए पंचायत भी बुलाई गई, जिसमें भविष्य में सार्वजनिक और धार्मिक आयोजनों में सभी ग्रामीणों की समान भागीदारी सुनिश्चित करने पर चर्चा हुई।
मामले ने तूल तब और पकड़ लिया जब उत्तराखंड अनुसूचित आयोग ने इस पूरे प्रकरण का स्वतः संज्ञान ले लिया। आयोग की सदस्य सुनीता देवी ने बताया कि आयोग ने उत्तरकाशी के पुलिस अधीक्षक से पूरे घटनाक्रम की विस्तृत रिपोर्ट तलब की है। आयोग यह जानना चाहता है कि घटना किन परिस्थितियों में हुई और प्रशासन ने अब तक क्या कार्रवाई की है।
आयोग ने मामले को गंभीर बताते हुए निष्पक्ष जांच के निर्देश दिए हैं। आयोग की ओर से कहा गया है कि यदि जांच में किसी भी स्तर पर सामाजिक भेदभाव या संविधान प्रदत्त अधिकारों के उल्लंघन की पुष्टि होती है तो आवश्यक कार्रवाई की संस्तुति की जाएगी। साथ ही प्रशासन को भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाने के निर्देश भी दिए गए हैं।
वहीं, स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों ने भी घटना पर नाराजगी जताई है। उनका कहना है कि धार्मिक आयोजनों में सभी समुदायों की समान भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए और परंपराओं के नाम पर किसी भी वर्ग को अलग-थलग करना सामाजिक सौहार्द के लिए उचित नहीं है।
गांव के विशन सिंह राणा ने कहा कि संविधान सभी नागरिकों को समान अधिकार देता है और किसी भी प्रकार का जातीय भेदभाव स्वीकार्य नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि गांव में भाईचारा और सौहार्द बनाए रखने के लिए सभी पक्षों को मिलकर समाधान निकालना होगा।
घटना के बाद क्षेत्र में सामाजिक तनाव का माहौल बन गया था। स्थिति को संभालने के लिए बार एसोसिएशन के कुछ अधिवक्ताओं और स्थानीय लोगों ने हस्तक्षेप कर दोनों पक्षों के बीच वार्ता कराई। बातचीत के बाद तत्काल स्थिति को शांत कराया गया और लोगों को समझाकर वापस भेजा गया।
फिलहाल पूरे मामले को लेकर क्षेत्र में चर्चा का माहौल है और लोग प्रशासनिक कार्रवाई तथा आयोग की जांच रिपोर्ट का इंतजार कर रहे हैं। यह विवाद अब केवल धार्मिक यात्रा तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि सामाजिक समानता, सम्मान और संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा बड़ा सवाल बन गया है।




