बागेश्वर, 25 अगस्त 2026।नीरज उत्तराखंडी
बागेश्वर जिले में खड़िया खनन अब केवल पर्यावरण का सवाल नहीं रह गया है, बल्कि लोगों के घर, जमीन और जीवन की सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मुद्दा बनता जा रहा है। भूमिगत और खुले खनन वाले क्षेत्रों में जमीन धंसने, दरारें पड़ने और मकानों के प्रभावित होने की घटनाओं ने स्थानीय लोगों की चिंता बढ़ा दी है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि खनन से होने वाले आर्थिक लाभ की कीमत कहीं ग्रामीणों को अपनी जमीन और आशियाने से तो नहीं चुकानी पड़ रही।
कांडा निवासी पूर्व सैनिक प्रेम राम आज अपने घर और जमीन को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। प्रेम राम भारतीय सेना में 1965, 1967 और 1971 के युद्धों में सेवा दे चुके हैं। उनका आरोप है कि उनके घर के ऊपर हो रहे खड़िया खनन के बाद जमीन में हलचल बढ़ी और जगह-जगह दरारें दिखाई देने लगीं। उनके परिवार के कुछ मकानों के क्षतिग्रस्त होने का भी दावा किया गया है। एक पूर्व सैनिक के सामने अपने ही घर को बचाने की यह जद्दोजहद खनन गतिविधियों की निगरानी और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
200 से अधिक मकान प्रभावित होने की रिपोर्ट
बागेश्वर में भू-धंसाव और मकानों में दरारों की समस्या नई नहीं है। वर्ष 2024 में सामने आई रिपोर्टों के मुताबिक जिले में 200 से अधिक मकानों के प्रभावित होने की बात सामने आई थी। उत्तराखंड आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की ओर से करीब 11 संवेदनशील गांवों को चिन्हित किया गया था और लगभग 450 मकानों को जोखिम वाले क्षेत्र में बताया गया था।
ये आंकड़े केवल सरकारी रिकॉर्ड नहीं हैं, बल्कि उन परिवारों की चिंता का प्रतिनिधित्व करते हैं जिनके लिए मकान सिर्फ चार दीवारें नहीं, बल्कि वर्षों की मेहनत और जीवनभर की जमा पूंजी हैं।
61 खदानों के सर्वेक्षण में सामने आईं गंभीर खामियां
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए सरकार द्वारा गठित समिति ने बागेश्वर, कांडा और दुगनाकुरी क्षेत्र की 61 खड़िया खदानों का सर्वेक्षण किया। समिति की रिपोर्ट में खनन गतिविधियों वाले क्षेत्रों में जमीन में दरारें, भू-धंसाव, भूस्खलन और चट्टानों के खिसकने जैसी घटनाओं का उल्लेख किया गया।
रिपोर्ट में खनन के तौर-तरीकों को लेकर भी गंभीर सवाल सामने आए। कई स्थानों पर खदानों में खड़ी अथवा अत्यधिक ढलान वाली खुदाई पाए जाने की बात दर्ज की गई। इतना ही नहीं, खनन से निकलने वाले मलबे को प्राकृतिक जल निकासी वाले रास्तों में डाले जाने की स्थिति भी सामने आई।
यह स्थिति बारिश के दौरान खतरे को और बढ़ा सकती है। यदि प्राकृतिक जल निकासी बाधित होती है तो पानी का दबाव जमीन की स्थिरता को प्रभावित कर सकता है और भूस्खलन अथवा भू-धंसाव का खतरा बढ़ सकता है।
खनन बनाम जीवन की सुरक्षा
बागेश्वर में खड़िया खनन लंबे समय से स्थानीय अर्थव्यवस्था का हिस्सा रहा है। इससे रोजगार और राजस्व मिलता है, लेकिन सवाल यह है कि विकास और आर्थिक गतिविधियों की सीमा आखिर कहां तय होगी?
यदि किसी खदान के कारण आसपास रहने वाले लोगों के मकानों में दरारें पड़ रही हैं, जमीन धंस रही है या प्राकृतिक जल निकासी प्रभावित हो रही है तो महज खनन की अनुमति और राजस्व प्राप्ति को पर्याप्त नहीं माना जा सकता। जरूरी है कि खनन की वैज्ञानिक निगरानी हो और प्रभावित परिवारों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए।
ग्रामीणों को चाहिए जवाब और सुरक्षा
स्थानीय लोगों की मांग अब केवल जांच तक सीमित नहीं है। उन्हें यह स्पष्ट जवाब चाहिए कि जमीन में दरारें और भू-धंसाव किन कारणों से हो रहा है, खनन गतिविधियों की इसमें कितनी भूमिका है और जोखिम वाले मकानों की सुरक्षा के लिए तत्काल क्या कदम उठाए जा रहे हैं।
प्रशासन और संबंधित विभागों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि खनन और मानव सुरक्षा के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। संवेदनशील क्षेत्रों में वैज्ञानिक भू-तकनीकी अध्ययन, खदानों की नियमित निगरानी, प्राकृतिक जल निकासी की सुरक्षा और जोखिम वाले मकानों का तकनीकी आकलन अब जरूरी हो गया है।
बागेश्वर की पहाड़ियों में खड़िया की तलाश जारी रह सकती है, लेकिन इसके साथ यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि खनिज निकालते-निकालते कहीं लोगों के पैरों के नीचे की जमीन ही न खिसक जाए। विकास वही है जिसमें खदान से निकलने वाला खनिज अर्थव्यवस्था को मजबूती दे, लेकिन उसके बदले किसी परिवार का घर, खेत और भविष्य खतरे में न पड़े।


