- पौधे पीले पड़कर सूखने से उत्पादन में भारी गिरावट का खतरा, कृषि विभाग ने किया खेतों का निरीक्षण
पुरोला/उत्तरकाशी, 25 अगस्त 2026।नीरज उत्तराखंडी
रवांई घाटी की रामा और कमल सिरांई घाटी में इस वर्ष पारंपरिक लाल धान की फसल पर बीमारी का संकट गहरा गया है। धान में बालियां निकलने के साथ ही कई खेतों में पौधों के पीले पड़ने और समय से पहले सूखने की समस्या सामने आने से काश्तकारों की चिंता बढ़ गई है। किसानों को आशंका है कि यदि बीमारी पर समय रहते प्रभावी नियंत्रण नहीं पाया गया तो उत्पादन में भारी गिरावट के साथ उन्हें आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।
स्थानीय किसान इस बीमारी को ‘तित्रा’ के नाम से बता रहे हैं। काश्तकारों के अनुसार धान की फसल में इस तरह की समस्या पहले देखने को नहीं मिली। खासकर बाली निकलने के समय पौधों का अचानक पीला पड़ना और सूखना फसल के लिए गंभीर संकेत माना जा रहा है।
रवांई घाटी में अगस्त के चौथे सप्ताह तक लाल धान में बालियां निकलना सामान्यतः अच्छी फसल का संकेत माना जाता है। इस वर्ष भी कई खेतों में समय पर बालियां निकलने लगीं, लेकिन इसके साथ ही पौधों के पीले पड़ने और सूखने की समस्या ने किसानों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। किसानों का कहना है कि बीमारी का प्रकोप बढ़ा तो खेतों में तैयार हो रही फसल प्रभावित हो सकती है।
क्षेत्र के काश्तकार श्यालिक राम नौटियाल, हकूमत सिंह, नवीन गैरोला, उपेन्द्र रावत और ओमप्रकाश गैरोला ने कृषि विभाग से तत्काल हस्तक्षेप करते हुए बीमारी की सही पहचान, प्रभावी उपचार और किसानों को आवश्यक दवाएं उपलब्ध कराने की मांग की है। उनका कहना है कि पहाड़ी क्षेत्रों में पारंपरिक लाल धान न केवल किसानों की आजीविका से जुड़ा है, बल्कि क्षेत्र की कृषि परंपरा और स्थानीय पहचान का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। ऐसे में फसल को बीमारी से बचाने के लिए विभाग को त्वरित कदम उठाने चाहिए।
कृषि विभाग ने किया फसल का निरीक्षण
किसानों की शिकायत के बाद कृषि विभाग के तकनीकी विशेषज्ञ विकेश तोमर ने प्रभावित क्षेत्र का भ्रमण कर धान की फसल का निरीक्षण किया। उन्होंने खेतों में पौधों की स्थिति का जायजा लेने के बाद प्रारंभिक तौर पर समस्या को फफूंदजनित रोग से जुड़ा बताया।
उन्होंने किसानों को अनुशंसित फफूंदनाशकों का निर्धारित मात्रा में छिड़काव करने की सलाह दी है। इसके लिए टाइबुकोनाजोल, हेक्साकोनाजोल और कार्बेन्डाजिम समूह की दवाओं के उपयोग की सलाह दी गई है। साथ ही किसानों को दवाओं का प्रयोग कृषि विशेषज्ञों की सलाह और निर्धारित मात्रा के अनुसार ही करने को कहा गया है।
तकनीकी विशेषज्ञ ने किसानों से खेतों की नियमित निगरानी करने तथा बीमारी के लक्षण बढ़ने पर तत्काल कृषि विभाग को सूचना देने की अपील की है। विभाग की ओर से प्रभावित खेतों की स्थिति पर नजर रखने और आवश्यकता के अनुसार किसानों को तकनीकी मार्गदर्शन देने की बात कही गई है।
उत्पादन प्रभावित होने की आशंका
किसानों का कहना है कि धान की फसल इस समय महत्वपूर्ण अवस्था में है। बाली निकलने के बाद पौधों के पीले पड़ने और सूखने से दाने बनने की प्रक्रिया प्रभावित होने की आशंका है। यदि बीमारी का प्रकोप व्यापक हुआ तो इसका सीधा असर उत्पादन पर पड़ सकता है।
काश्तकारों ने मांग की है कि कृषि विभाग प्रभावित क्षेत्रों में सर्वे कर बीमारी के वास्तविक कारण का वैज्ञानिक परीक्षण कराए और जरूरत पड़ने पर सामूहिक उपचार की व्यवस्था करे। किसानों का कहना है कि केवल दवा की सलाह देने के बजाय विभाग को प्रभावित खेतों की लगातार निगरानी करनी चाहिए, ताकि बीमारी समय रहते नियंत्रित की जा सके।
रवांई घाटी में लाल धान की फसल किसानों के लिए आर्थिक महत्व के साथ-साथ पारंपरिक कृषि विरासत का हिस्सा भी है। ऐसे में इस फसल पर मंडराए बीमारी के संकट ने किसानों के साथ-साथ क्षेत्र के कृषि विशेषज्ञों के लिए भी चिंता बढ़ा दी है।


