- FIR से अदालत तक का हिसाब अधूरा, 2017 के नशे के मामलों से 2025 के विस्फोटक कांड तक कई गंभीर मामले सामने आए; 2018-21 के रिकॉर्ड पर अब भी सवाल
त्यूणी/देहरादून। रिपोर्ट—नीरज उत्तराखंडी
18 दिसंबर 2016 को सीमांत क्षेत्र त्यूणी में नियमित पुलिस थाना अस्तित्व में आया। करीब दस साल बाद थाना त्यूणी के अपराध रिकॉर्ड की पड़ताल कई गंभीर मामलों की तस्वीर सामने लाती है, लेकिन साथ ही एक बड़ा सवाल भी खड़ा करती है—आखिर दर्ज मुकदमों का पूरा हिसाब कहां है?
गहन पड़ताल में 2017 से 2026 तक थाना त्यूणी से जुड़े कई गंभीर आपराधिक मामले पुलिस कार्रवाई और न्यायिक रिकॉर्ड में सामने आए हैं। इनमें एनडीपीएस, दुष्कर्म, पॉक्सो, संदिग्ध नाबालिग मृत्यु, आईटी एक्ट, विस्फोटक अधिनियम, आर्थिक धोखाधड़ी और जुआ अधिनियम के मामले शामिल हैं। मगर दस वर्षों का वर्षवार कुल FIR आंकड़ा, चार्जशीट, लंबित विवेचना, अदालत में लंबित मुकदमे और दोषसिद्धि का समेकित रिकॉर्ड सार्वजनिक स्रोतों में नहीं मिल पाया।
2017 में नशे की बड़ी खेपों से हुई शुरुआत
थाना गठन के कुछ ही महीनों बाद वर्ष 2017 में त्यूणी पुलिस की दो बड़ी एनडीपीएस कार्रवाइयां सामने आईं। जुलाई में दो आरोपियों से करीब सात किलो चरस बरामद होने की सूचना सामने आई। इसके बाद अगस्त में 810 ग्राम चरस के साथ दो आरोपियों की गिरफ्तारी की गई। दोनों मामलों में एनडीपीएस एक्ट के तहत कार्रवाई बताई गई।
पुलिस कार्रवाई तो रिकॉर्ड में है, लेकिन इन दोनों मामलों का अंतिम न्यायिक परिणाम—दोषसिद्धि, बरी या मुकदमे की वर्तमान स्थिति—सार्वजनिक ऑनलाइन रिकॉर्ड से प्रमाणित नहीं हो सकी।
2018 से 2021 तक रिकॉर्ड का सबसे बड़ा अंतराल
पड़ताल में सबसे बड़ा सवाल वर्ष 2018 से 2021 के बीच सामने आया। इन वर्षों की थाना त्यूणी की पूर्ण FIR सूची सार्वजनिक ऑनलाइन स्रोतों से प्राप्त नहीं हो सकी।
इस अवधि में त्यूणी क्षेत्र से जुड़ी कई आपराधिक और दुर्घटनात्मक घटनाओं की खबरें जरूर सामने आती हैं, लेकिन केवल घटना या गिरफ्तारी की खबर को थाना त्यूणी की FIR मानना उचित नहीं है।
कई मामलों में संबंधित व्यक्ति त्यूणी निवासी था, लेकिन मुकदमा दूसरे थाने में दर्ज हुआ। कुछ घटनाएं राजस्व पुलिस क्षेत्र की थीं। इसलिए उन्हें थाना त्यूणी के अपराध आंकड़े में जोड़ना आंकड़ों को गलत दिशा देना होगा।
2022 में हाईकोर्ट तक पहुंचा दुष्कर्म का मामला
FIR संख्या 26/2022 धारा 376 IPC में थाना त्यूणी में दर्ज होने की पुष्टि हाईकोर्ट के रिकॉर्ड से होती है। मामला जमानत याचिका के रूप में हाईकोर्ट पहुंचा।
हालांकि यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि जमानत मिलना बरी होना नहीं है। उपलब्ध रिकॉर्ड से इस मुकदमे का अंतिम फैसला प्रमाणित नहीं हो सका।
2023 में पॉक्सो का गंभीर मुकदमा
FIR संख्या 04/2023 में IPC की धाराएं 363, 366A और 376D तथा पॉक्सो एक्ट की धाराएं 5(g)/6 लगाई गईं।
हाईकोर्ट के न्यायिक रिकॉर्ड से यह प्रमाणित होता है कि आरोपी लंबे समय तक न्यायिक हिरासत में रहा। बाद की कार्यवाही में जांच पूरी होने और अभियोजन के कई गवाहों के बयान दर्ज होने का उल्लेख मिलता है। मामला ट्रायल की प्रक्रिया में था।
अर्थात यह मुकदमा FIR से आगे बढ़कर न्यायिक परीक्षण तक पहुंचा, लेकिन इस पड़ताल में अंतिम फैसला नहीं मिला।
2024: राधिका की मौत और FIR 07/2024
त्यूणी क्षेत्र में 14 वर्षीय राधिका की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत ने गंभीर सवाल खड़े किए। प्रारंभिक पुलिस आकलन में आत्महत्या की बात सामने आई, जबकि परिजनों ने हत्या की आशंका जताई।
मामला न्यायालय तक पहुंचा और बाद में FIR संख्या 07/2024, धारा 103 BNS के तहत मुकदमा दर्ज हुआ।
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने 31 दिसंबर 2024 को FIR निरस्त करने की मांग स्वीकार नहीं की और जांच जारी रखने का रास्ता साफ रखा।
लेकिन न्यायिक रिकॉर्ड का अर्थ यह नहीं है कि अदालत ने हत्या साबित कर दी। न तो हत्या सिद्ध हुई और न ही आत्महत्या का अंतिम न्यायिक निष्कर्ष सामने आया। इसलिए मामले की अंतिम विवेचना और उसके बाद की न्यायिक स्थिति अब भी महत्वपूर्ण सवाल है।
2025: विस्फोटक से लेकर साइबर और जुए तक
वर्ष 2025 में थाना त्यूणी से संबंधित कई तरह के मामले सामने आए।
मु0अ0सं0 14/2025 में BNS की धारा 197 और IT Act की धारा 66 के तहत कार्रवाई और गिरफ्तारी की जानकारी सामने आई।
वहीं मु0अ0सं0 19/2025 में पुलिस ने करीब 125 किलो डायनामाइट, डेटोनेटर, तार और बत्ती बरामद करने का दावा किया। तीन आरोपियों को गिरफ्तार कर Explosives Act की धाराओं 3/7 में मुकदमा दर्ज किया गया।
इसी वर्ष कृषि बीमा के नाम पर ₹1.68 लाख से अधिक की कथित धोखाधड़ी के मामले में भी त्यूणी पुलिस ने मुकदमा दर्ज किया।
सितंबर में अटाल क्षेत्र में जुआ खेलते 13 लोगों की गिरफ्तारी और ₹1.17 लाख से अधिक की बरामदगी की कार्रवाई भी सामने आई। हालांकि 13 गिरफ्तारियों को 13 अलग FIR मानना गलत होगा।
2026 में फिर पॉक्सो का मामला
2026 में नाबालिग को बहला-फुसलाकर ले जाने और यौन अपराध से संबंधित मामले में थाना त्यूणी में FIR दर्ज होने तथा पुलिस कार्रवाई की जानकारी सामने आई।
इस मामले का अंतिम न्यायिक परिणाम फिलहाल उपलब्ध सार्वजनिक रिकॉर्ड से प्रमाणित नहीं है।
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FIR से अदालत तक सबसे बड़ा सवाल
पड़ताल का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि त्यूणी थाने की पुलिस कार्रवाई के रिकॉर्ड तो अलग-अलग स्रोतों में मिल जाते हैं, लेकिन दस साल का समेकित न्यायिक रिपोर्ट कार्ड कहीं दिखाई नहीं देता।
कितनी FIR दर्ज हुईं?
कितनी में चार्जशीट दाखिल हुई?
कितनी विवेचनाएं लंबित हैं?
कितने मामले अदालत में लंबित हैं?
कितने मामलों में आरोपी बरी हुए?
और सबसे महत्वपूर्ण—कितने मामलों में अदालत ने दोषसिद्धि की?
इन सवालों का एकीकृत, प्रमाणित और वर्षवार उत्तर सार्वजनिक ऑनलाइन रिकॉर्ड से नहीं निकल पाया।
तहसील का अपराध और थाना का अपराध अलग-अलग
पड़ताल में यह भी स्पष्ट हुआ कि “त्यूणी तहसील में दर्ज मुकदमे” और “थाना त्यूणी में दर्ज मुकदमे” एक ही बात नहीं है।
त्यूणी क्षेत्र में राजस्व पुलिस की व्यवस्था भी रही है। कई मामलों में आरोपी अथवा पीड़ित त्यूणी क्षेत्र से संबंधित मिले, लेकिन मुकदमा किसी दूसरे थाने में दर्ज हुआ। ऐसे मामलों को थाना त्यूणी के खाते में जोड़ना गलत होगा।
इसी तरह दुर्घटना को बिना FIR प्रमाण के आपराधिक मुकदमे की संख्या में जोड़ना भी उचित नहीं।
बहरहाल
करीब दस साल के उपलब्ध रिकॉर्ड से यह स्पष्ट है कि थाना त्यूणी में गंभीर और विविध प्रकृति के आपराधिक मामले दर्ज हुए हैं, लेकिन पूरे दशक का अपराध से अदालत तक का प्रमाणित आंकड़ा अभी सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं है।
सबसे बड़ा रिकॉर्ड अंतराल 2018 से 2021 के बीच दिखाई देता है। वहीं 2017 के दोनों प्रमुख एनडीपीएस मामलों का अंतिम न्यायिक परिणाम भी इस पड़ताल में स्पष्ट नहीं हो सका।
इसलिए अब सवाल सिर्फ अपराध का नहीं, रिकॉर्ड की पारदर्शिता का भी है।
18 दिसंबर 2016 से अक्टूबर 2026 तक थाना त्यूणी की प्रत्येक FIR की वर्षवार सूची, चार्जशीट/अंतिम रिपोर्ट, संबंधित न्यायालय, केस नंबर, वर्तमान स्थिति और अंतिम फैसले का प्रमाणित विवरण सार्वजनिक होना चाहिए।
क्योंकि FIR कार्रवाई की शुरुआत है, गिरफ्तारी अंतिम न्याय नहीं और जमानत बरी होना नहीं। अंतिम सच अदालत के फैसले से सामने आता है।
और त्यूणी थाने की दस साल की पड़ताल का सबसे बड़ा सवाल आज भी यही है—
“FIR से फैसला तक कितने मुकदमे पहुंचे और उनमें न्याय की अंतिम मंजिल तक कितने पहुंचे?”






